भारत एक अध्यात्म और धर्म आधारित राष्ट्र है। धर्म का ठीक मार्ग लोगों तक पहुंचता रहे इसलिए एक परम्परा भारत के अस्तित्व के समय से ही चली आ रही है, वह है समय-समय पर नये-नये रूप में अध्यात्म और धर्म सम्बन्धी व्यवस्थाओं के अस्तित्व में आने की परम्परा। जब एक व्यवस्था किसी महान आत्मा के रूप में प्रकट होती है तो इसको महापुरुष परम्परा भी कहा जाता है। सिख पंथ के प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जी को भारतीयता का अदर्श दूत कहा जाना पूर्णत: यथोचित है, भारतीयता अर्थात सर्वेभवन्तु सुखिन: और सरबत्त दा भला मांगने वाली परम्परा।
भारत शब्द के बारे में भी कई तरह के विचार मिलते हैं। कुछ लोग इसको राजा भरत से जोड़ते हैं। कुछ भारत शब्द के तीन वर्णों के तीन अर्थ करते हैं। इस शाब्दिक अर्थ की चर्चा में पड़ना इस लेख का विषय नहीं है। यह अवश्य है कि भारत शब्द कुछ कारणों से इकट्ठे और आपसी सांझ वाले लोगों के बन्धे हुए स्वरूप वाले राष्ट्र की ओर इशारा जरूर करता है, विष्णु पुराण में श्लोक है:-
‘‘उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्तति:।।’’
भारत के बंधे हुए स्वरूप के बारे में चर्चा इसलिए आवश्यक है कि भारत या भारतीयता बोध के विषय के शब्दों से ही स्पष्ट है कि भारत एक संगठित इकाई है। गुरु ग्रन्थ साहिब में भी मिलता है-
खुरासान खसमाना कीआ हिन्दुस्तान डराइया।
आपे दोस न देई करता जम कर मुगल चढ़ाइया।।
उपरोक्त श्लोक और गुरबाणी की पंक्ति वाला भारत और हिन्दुस्तान आखिर है क्या? क्या यह मात्र भौगोलिक परिपेक्ष्य है या कोई वैचारिक पक्ष से सांझी इकाई की बात है। कुछ नकारात्मक विचारधाराएँ यह भी कहती हैं कि भारत कभी भी एक राष्ट्र नहीं रहा, आर्य बाहर से आए, वेद-पुराण गड़रियों के गीत हैं, जब अंग्रेज हमारे यहां आए उस समय हम सभ्य हुए। ऐसी बहुत सी बातें और अंग्रेजों का फैलाया वितण्डावाद है जिनके बारे में चिन्तन करना आम समाज तो क्या बड़े-बड़े शिक्षा शास्त्री भी भूले हुए हैं, यह नहीं कि सारे, पर अधिकतर असावधान ही हैं। भारत और भारतीयता का जो चित्र आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने प्रस्तुत किया है उसका भारत के मूल स्वरूप से बहुत अन्तर है। यदि भारत राष्ट्र नहीं था तो गुरुबाणी में ‘हिन्दुस्तान’ क्या है? वास्को-डि-गामा ने क्या नया राष्ट्र बनाया? कोलम्बस क्या ढूंढ रहा था? विष्णु पुराण में भारतीय शब्द क्या है? हिन्दू नाम किस प्रकार और क्यों आस्तित्व में आया? वास्तव में ऐसे प्रश्नों का उत्तर इस बात में है कि भारतीयता किस प्रकार समग्रता / समूचे रूप में सामने आई। वो कौन लोग थे जो गुरबाणी के उपरोक्त विचारों के अनुसार बाबर से डरे हुए थे। वास्तव में उन लोगों की मानसिकता का सांझा पक्ष ही भारतीयता था।
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इसको प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक ‘नौम चौमस्की’ के लौंग और पैरोल की अवधारणा से अच्छी तरह समझा जा सकता है। जैसे एक इलाके में सब लोगों की भाषा व लहजा एक दूसरे से पूरी तरह नहीं मिलता, परन्तु भाषा का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा होता है जो समान होता है। इसी तरह राष्ट्र के लोगों की पूजा पद्धतियां, खाने-पीने की आदतें, भाषा, रहन-सहन भिन्न हो सकता है पर सैद्धान्तिक चिन्तन समान होता है। राष्ट्र और नेशन में भी मुख्य अन्तर यही होता है।
सांझे चिंतन से होता है भारत का बोध
भारत का बोध ऐसे ही सांझे चिन्तन से होता है। भारत का विचार (बोध) जो कि भारत के अस्तित्व का आधार है, स्पष्ट है, जब से भारत है उस समय से है। पर समूचे और बन्धे रूप में सामने दृश्यमान पिछले लगभग हजार बारह सौ सालों से हुआ है। भारत में भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग रहते थे। जैन थे, बौद्ध थे, शैव, वैष्णव, नाथ-जोगी, वैदिक, तन्त्रयानी, मन्त्रयानी, नामदेवी, ज्ञानेश्वरी, कबीरपन्थी आदि बहुत थे। कोई भी अपना नया पन्थ चला लेता, पर किसी दूसरे के साथ कोई शत्रुता का भाव नहीं था। बल्कि व्यक्ति एक समय शैव भी होता था और नाथ जोगियों के पास भी चला जाता था। जैन भी था तो वैष्णव भी होता था, भावार्थ कोई कट्टरता वाली प्रवृत्ति नहीं थी। सब घुले-मिले रहते थे। कोई निराकार की पूजा कर रहा है वो मूर्तिपूजा वालों के साथ भी चला जाता था।
इस्लाम का कट्टरता और हठ
फिर अचानक भारत में इस्लाम आया तो समाज के सामने बड़ा संकट आया इसलिए कि वो सबका सांझा शत्रु था क्योंकि वो सबको इस्लाम स्वीकार करवाने के लिये हठ धारण किये हुए था। तो देश में एक महत्त्वपूर्ण घटना घटनी शुरू हुई, एक वैचारिक विभाजन शुरू हुआ जो था हिन्दू और तुर्क का विभाजन। तुर्क लोग अत्याचारी लोग थे, जब इस्लाम तुर्की में आया तो तुर्कों ने इस्लाम स्वीकारा और सेनाएं लेकर आगे बढ़े। वो और भी क्रूर और अत्याचारी व्यवहार वाले बन गए। हमारे लोग एक मंच पर इकट्ठे हुए। ऐसा किसी योजना या किसी घोषणा से नहीं हुआ। सबको लगा कि हम एक ही सोच वाले हैं। थोड़ा समाधान हुआ क्योंकि यह एक बड़ा मंच था। हिन्दू शब्द भी इसी समय प्रचलन में आया। हजार बारह सौ वर्ष पहले कोई हिन्दू शब्द भी अधिक प्रचलन में नहीं था। ये सारे लोग इस्लाम के विरुद्ध जिस समय इकट्ठे हुए तो उन्होंने सोचा कि हम तो सारे एक प्रकार की बातें सोचते हैं। इसी मंच पर खड़े लोगों का वैचारिक धरातल था भारतीयता। भारतीयता के ऐसे मंच से स्पष्ट प्रकट होने पर जो सांझे सिद्धान्त सामने आये वो निम्नलिखित हैं:-
1. सबका भला और कल्याण।
2. कण-कण और प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास है।
3. पूरी सृष्टि के साथ आत्मीयता का भाव।
4. धरती माँ है।
5. सबके विचार/पूजा पद्धतियाँ सम्माननीय हैं।
उपरोक्त पांचों सिद्धान्त सेमेटिक पन्थ स्वीकार नहीं करते। न काफिर का भला हो, न उसकी पूजा पद्धति ठीक है, न धरती माँ है, न सारे जीव या व्यक्तियों में अल्लाह/गॉड हो सकता है। जबकि भारत में पैदा हुए सारे पन्थ इन सिद्धान्तों को मानते हैं।
गुरबाणी
इन पांचों सिद्धान्तों को गुरबाणी में ढूंढने की कोशिश भी करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के हर एक अंग में ऐसे सन्दर्भ मिलते हैं। गुरबाणी में भारत राष्ट्र का स्वरूप कल्पित करने के लिये प्राय: एक वाक्य का उच्चारण किया जाता है। खुरासान खसमाना कीआ हिन्दुस्तान डराइया, पर गौर करने वाली बात है कि इससे भोगौलिक बोध तो होता है परन्तु भारतीयता का बोध इससे अगली पंक्तियों में होता है। ऐती मार पई कुरलाणे तै की दर्द न आया।
यह वाक्य गुरु साहिब की समूची मानवता के साथ आत्मीयता को प्रकट करता है। यह कोई ईश्वर को कटाक्ष नहीं है बल्कि गुरु साहिब को लोगों की पीड़ा अपनी लग रही है। बलशाली व्यक्ति दुर्बल को तंग करे ऐसा गुरबाणी की न•ार में अपराध है। सेमेटिक पन्थों की तरह गुरुग्रन्थ साहिब कभी भी किसी विचारधारा के मात्र विरोध में नहीं खड़े होते बल्कि एक प्रकार के तर्क-वितर्क के साथ समन्वय स्थापित करने की दिशा में बढ़ते हैं। सिद्धगोष्ठ रचना में नाथ मत के साथ संवाद रचाते हुए गुरु साहिब की ये पंक्तियां ध्यान की मांग करती हैं :-
जैसे जल महि कमल निरालम
मुरगाई नैसाणे।।
सुरत सबद भवसागर तरीऐ।
नानक नाम वखाणे।।
जगबीर सिंह के अनुसार इसकी विलक्षणता का मूल निचोड़ यह भी है कि सिद्धवाणी निरीश्वरवादी (अवैदिक) है वहीं नानकवाणी वैदिक सभ्यता के ईश्वर संकल्प के साथ भी अपना नाता जोड़ लेती है। चाहे यहां ईश्वर का संकल्प निर्गुण है।
गुरबाणी कई संकल्पों पर कटाक्ष करती है जिनको कई बार भारतीयता का विरोधी मान लिया जाता है, जबकि यहां भारतीयता की नहीं मात्र कुछ पाखण्डी पुजारियों की बात है। उदाहरण के लिये –
काद कूड़ बोली मल खाई।
ब्राहमण नावे जीया घाई।
जोगी जुगत ना जाणे अंध।
तीनै उजाड़े का बंध।
पर गुरबाणी को यदि समग्रता में देखा जाए तो काजी, ब्राह्मण, योगी की केवल निन्दा नहीं बल्कि इन संकल्पों को पुनर्जीवित करने की भी बात है। यह भी है कि उपरोक्त सिद्धान्त जो भारतीयता में समग्र रूप में सिद्धान्त हैं तो भी उन बातों के विरुद्ध है जिनका गुरबाणी खण्डन करती है। गुरबाणी में कुछ बातों की केवल निन्दा ही नहीं की गई बल्कि भावात्मक मार्ग भी दर्शाया गया है, यह नीचे लिखी बाणी स्पष्ट करती है-
सो जोगी जो जुगत पछाणे।
सो ब्राह्मण जो ब्रह्म विचारे।
इस प्रकार जोगी और ब्राह्मण को समाप्त करने के स्थान पर पुन:सृजन और उनको अपने आदर्श रूप में रहने की शिक्षा देने का गुरबाणी का सन्देश भारतीयता द्वारा सबको स्वीकार करने वाले स्वभाव जैसा ही है। गुरबाणी में जनेऊ, नमाज, हिन्दू आदि अनेक शब्दों को भिन्न-भिन्न श्लोकों /सबदों में सार्थकता से भरपूर रूपान्तरित करके सर्वसांझी सभ्याचारक चेतना का दार्शनिक भाव प्रस्तुत हुआ है। इस प्रकार गुरबाणी भिन्न-भिन्न मतों की भिन्नता में साझे धरातल ढूंढने के लिये कार्यशील है। इसका अर्थ है कि गुरबाणी एक मार्ग के भिन्न-भिन्न रास्तों में ऊंचाईयां तलाशती साझी मंजिल की तलाश के लिये तत्पर है।
अनेकता में एकता ही भारतीयता का सिद्धान्त
भारतीयता का एक सिद्धान्त यह भी है जिसे भ्रम से हम अनेकता में एकता कहने लगते हैं। जबकि भारतीयता में एकता में अनेकता है। बस यह एकता अनेकता में से प्रकट होती है। उदाहरण के लिये किस प्रकार अलग-अलग भाषाओं, पूजा-पद्धतियों और आदतों वाले लोग साझे तौर से कुम्भ के मेले में इकट्ठे हो जाते हैं। किस प्रकार राम का नाम इन भिन्नता वाले सब लोगों में उपस्थित है। यह भावना गुरमति में उपरोक्त श्लोक / सबद सहज ही स्पष्ट करते हैं। जैसे उपरोक्त चर्चा की है कि दूसरों की पूजा पद्धति या विचारों का सम्मान भारत में पैदा हुए सारे पन्थों का गुण रहा है। सबकी बात सुनने, समझने और स्वस्थ संवाद की परम्परा भारत में रही है, इस बारे में गुरबाणी में बहुत स्पष्ट है कि
जब लग दुनिया रहीये नानक किछ सुणिये किछ कहीये
भाल रहे हम रहन ना पाया जीवतया मर रहीये
इस प्रकार केवल दूसरे मतों के साथ ही स्वस्थ संवाद नहीं बल्कि संवाद ऐसा जिसमें पूरी सृष्टि के साथ गुरबाणी में आत्मीयता भाव प्रकट होता है। जब हम पढ़ते हैं कि –
पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु ॥
दिवसु राति दुइ दाई दाइआ खेलै सगल जगतु ॥ चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरमु हदूरि ॥
करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूरि॥
जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि ॥
नानक ते मुख उजले केती छुटी नालि ॥ 1 ॥
यह पंक्तियां अपने आप में भारतीयता का बड़ा दर्शन समाहित किये बैठी हैं। भारत में पूजा पद्धतियों की भिन्नता एक सामान्य सी बात है बल्कि यह भारतीयता की सुन्दरता है। इस दर्शन को अपने में समाहित किये हुये यह पंक्ति संदेश देती है कि परमात्मा के निकट होना कर्मकाण्डों या विशेष पूजा पद्धतियों के साथ सम्भव नहीं है बल्कि अच्छे कर्मों द्वारा सम्भव है।
गुरबाणी के सन्देश और भारतीयता वैचारिक पक्ष से समानता वाले हैं। यह अवश्य है कि भारतीय लोगों के जो सांझे सिद्धान्त सामने आये उन पांचों सिद्धान्तों को गुरबाणी ने पुष्ट किया है। बल्कि महान बात यह है कि जब भी इन सिद्धान्तों को किसी ने भी हानि पहुंचाने के प्रयत्न किये तो गुरबाणी ने उसका खण्डन अवश्य किया। तात्कालिक शासकों की भाषा न चुन कर गुरमुखी चुनना, अनेक पूजा पद्धतियों वाले भक्तों, भटों को गुरुग्रन्थ साहिब में स्थान देना, सृष्टि के साथ आत्मीयता, कण-कण में ईश्वर का अस्तित्व मानना, पवन, पानी, धरती, आकाश और अग्नि को आदर पूर्ण शब्दों से सुशोभित करना, निश्चय ही यह प्रमाणित करता है कि भारत और भारतीयता का शुद्ध बोध गुरबाणी में से होता है। गुरु साहिबान, भक्तों, भटों आदि के पवित्र विचारों के रूप में गुरबाणी का प्रकट होना विश्व की एक अद्भुत और महान घटना है। सब इकट्ठे बैठकर लंगर के रूप में भोजन करें। जात-पात भूलकर एक सी पगड़ी बान्धें, जात-पात को छोडक़र सिंह लिखने लग जायें। यह एक महान सामाजिक क्रान्ति है। विश्व को आज कल्याणकारी नेतृत्व की आवश्यकता और प्रतीक्षा है। गुरुबाणी का ओट आसरा और सही समझ समूचे विश्व के कल्याण का उत्तम मार्ग है।
नानक नाम चढ़दी कला,
तेरे भाणे सरबत दा भला।

















