
महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में चर्चों और ईसाई मिशनरी संस्थाओं की भूमि, स्वामित्व और हस्तांतरण से जुड़े मामलों की व्यापक जांच कराने का निर्णय लिया है। सरकार ने संबंधित विभागों को निर्देश दिया है कि तीन महीने के भीतर विस्तृत जांच पूरी कर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।
रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। यदि कहीं अवैध हस्तांतरण, फर्जी दस्तावेज या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। राज्य सरकार ने यह फैसला नासिक जिले से सामने आए 300 करोड़ रुपये के भूमि घोटाले के बाद लिया है।
राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने महाराष्ट्र विधानसभा में बुधवार (8 जुलाई) को इसकी घोषणा की। उन्होंने कहा कि जांच के लिए संभागीय आयुक्त की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाएगा। इस कमेटी में मंडलायुक्त, पंजीकरण महानिरीक्षक (आईजीआर) विभाग और पुलिस के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। कमेटी सेटलमेंट कमिश्नर की ओर से रखे गए रिकॉर्ड का सत्यापन करेगी।
यह कमेटी तीन महीने के भीतर यह पता लगाएगी कि आजादी के बाद किन संदिग्ध परिस्थितियों में चर्चों और मिशनरियों को जमीन दी गई। जांच के दौरान ब्रिटिश शासनकाल में चर्चों और मिशनरी संस्थाओं को मिली भूमि, स्वतंत्रता के बाद हुए स्वामित्व परिवर्तन, बिक्री, लीज, दान और अन्य प्रकार के हस्तांतरण की विस्तार से समीक्षा की जाएगी।
साथ ही वर्तमान राजस्व अभिलेखों, पंजीकरण दस्तावेजों और वास्तविक स्वामित्व की भी जांच की जाएगी ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं सरकारी नियमों का उल्लंघन या अवैध तरीके से भूमि का हस्तांतरण तो नहीं हुआ।
सरकार की यह कार्रवाई नासिक जिले में 300 करोड़ रुपये की भूमि धोखाधड़ी से जुड़ी है। आरोप है कि इस भूमि के स्वामित्व और दस्तावेजों में गंभीर अनियमितताएं पाई गई हैं। बताया जाता है कि यह जमीन कई दशकों तक सरकारी विभागों को पट्टे पर दी गई और निजी पार्टियों को बेची गई। खास बात यह है कि यह सारा काम उन लोगों ने किया, जिनका इस जमीन पर कोई हक भी नहीं था। इस मामले के सामने आने के बाद राज्य सरकार ने पूरे महाराष्ट्र में चर्च और मिशनरी संस्थाओं की भूमि की व्यापक जांच कराने का फैसला किया है। इस दौरान किसी भी प्रकार की गड़बड़ी सामने आती है तो उसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
बीजेपी विधायक देवयानी फरांडे ने विधानसभा में यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने जमीन विद्यालय, अस्पताल और कॉलेज बनाने के लिए आवंटित की थी, जिसे चर्च बनाने के लिए हड़प ली गई। जमीन हस्तांतरण के लिए मूल ट्रस्टियों की मौत के बाद रिकॉर्ड में हेरफेर किया गया। उन्होंने दावा किया कि निवासियों को निर्माण और संपत्ति लेनदेन के लिए एक निजी कंपनी से एनओसी हासिल करने के लिए बड़ी रकम का भुगतान करने के लिए मजबूर किया जा रहा था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 1932 से पहले की अवधि के भूमि रिकॉर्ड और फाइलें जिला प्रशासन से गायब हो गई हैं।
जांच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें केवल वर्तमान रिकॉर्ड ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासनकाल से लेकर अब तक के सभी उपलब्ध दस्तावेजों की भी समीक्षा की जाएगी। राजस्व विभाग, पंजीयन विभाग और स्थानीय प्रशासन के रिकॉर्ड का मिलान कर यह देखा जाएगा कि भूमि का मूल स्वामित्व क्या था और समय-समय पर उसमें किस आधार पर परिवर्तन किए गए। विशेष रूप से उन मामलों की जांच होगी, जहां कृषि भूमि, संस्थागत भूमि या सार्वजनिक उपयोग के लिए आवंटित संपत्तियों का उपयोग वर्तमान में किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया जा रहा है या उनके स्वामित्व में परिवर्तन हुआ है।
राज्य सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई किसी विशेष धर्म या समुदाय को निशाना बनाने के उद्देश्य से नहीं की जा रही है, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड को पारदर्शी और अपडेट बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। जिन भी संगठनों के पास कानूनी रूप से वैध जमीनी हक है, उन्हें इस जांच को लेकर चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि किसी भी धार्मिक या सामाजिक संस्था की संपत्तियों से जुड़े दस्तावेजों में अनियमितता पाई जाती है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
महाराष्ट्र सरकार का यह निर्णय फिलहाल राज्य की भूमि व्यवस्था और धार्मिक ट्रस्टों की संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक माना जा रहा है। आने वाले महीनों में जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी, क्योंकि इससे राज्य में धार्मिक संस्थाओं की भूमि से जुड़े कई पुराने मामलों पर भी नई जानकारी सामने आ सकती है।