जम्मू-कश्मीर : किताबों के जरिए फैलाए जा रहे आतंकवाद पर सख्‍ती, सभी स्कूलों में पुस्तकों की जांच का आदेश
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जम्मू-कश्मीर : किताबों के जरिए फैलाए जा रहे आतंकवाद पर सख्‍ती, सभी स्कूलों में पुस्तकों की जांच का आदेश

जम्मू-कश्मीर के सभी स्कूलों में पुस्तकों की जांच का आदेश; आतंकवादियों और अलगाववादियों के कथित महिमामंडन वाली पुस्तकों के विवाद के बाद सरकार सख्त, शिक्षा व्यवस्था में वैचारिक घुसपैठ पर उठते गंभीर सवाल

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jul 10, 2026, 04:27 pm IST
in जम्‍मू एवं कश्‍मीर
Jammu kashmir library terrorist

आतंकवाद केवल सीमा पार से भेजे गए हथियारों, बमों और घुसपैठ तक सीमित नहीं रह गया है। बदलते दौर में इसका सबसे खतरनाक चेहरा वैचारिक आतंकवाद बनकर सामने आया है, जिसमें बंदूक की जगह किताबें, प्रचार और मनोवैज्ञानिक प्रभाव हथियार बनते हैं। यही कारण है कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने अब प्रदेश के सभी सरकारी और निजी विद्यालयों के साथ-साथ कोचिंग संस्थानों में उपलब्ध प्रत्येक पुस्तक की व्यापक जांच के आदेश जारी किए हैं। यह कदम उस विवाद के बाद उठाया गया है, जिसमें सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में पहुंची प्रमुख कुछ पुस्तकों में आतंकवाद और अलगाववाद के कथित महिमामंडन के आरोप सामने आए थे। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने इस मामले को बहुत गंभीरता से लिया है।

हर पुस्तक की होगी जांच, सात दिन में देनी होगी रिपोर्ट

जम्मू स्थित विद्यालय शिक्षा निदेशालय (डीएसईजे) ने परिपत्र संख्या 10-डीएसईजे, 2026 जारी कर सभी सरकारी एवं निजी विद्यालयों और कोचिंग संस्थानों के प्रमुखों को निर्देश दिए हैं कि वे कार्यालयों, कक्षाओं, स्टाफ रूम तथा पुस्तकालयों में रखी नई और पुरानी सभी पुस्तकों की विस्तृत जांच करें। जम्‍मू-कश्‍मीर की सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पुस्तक में ऐसी सामग्री नहीं होनी चाहिए जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाती हो, राष्ट्रीय हित के विरुद्ध हो, प्रचलित कानूनों का उल्लंघन करती हो अथवा शैक्षिक मूल्यों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के आयु-उपयुक्त मानकों के विपरीत हो।

यदि किसी पुस्तक में आपत्तिजनक सामग्री मिलती है तो उसके शीर्षक, लेखक, प्रकाशक, उपलब्ध प्रतियों और संबंधित सामग्री का पूरा विवरण सात दिन के भीतर संबंधित अधिकारियों को भेजना होगा। जिला और संभाग स्तर पर भी इसकी निगरानी के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय की गई है तथा निर्देशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। लगभग 10,787 सरकारी और 2,386 निजी विद्यालयों तक पहुंचा यह आदेश बताता है कि सरकार इस मामले को अत्यंत गंभीर विषय के रूप में देख रही है।

सरकार को इतना बड़ा कदम उठाने की जरूरत क्यों पड़ी?

पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि हाल ही में सामने आया वह विवाद है, जिसने शिक्षा व्यवस्था की निगरानी प्रणाली पर बड़े प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। सरकारी विद्यालयों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई दो पुस्तकों में कथित रूप से आतंकवादियों का महिमामंडन किए जाने के आरोप लगे। मामला सामने आते ही सरकार ने उन पुस्तकों पर तत्काल प्रतिबंध लगाया, उनकी प्रतियां वापस मंगवाईं और पुलिस की काउंटर इंटेलिजेंस विंग ने यूएपीए के तहत एफआईआर दर्ज कर जांच प्रारंभ कर दी।

सरकार ने आठ अधिकारियों को निलंबित किया, एक संविदा कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कीं, संबंधित लेखक और प्रकाशक को ब्लैकलिस्ट किया तथा पूरी खरीद और स्वीकृति प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच शुरू कर दी। अब सभी विद्यालयों में पुस्तकों की समीक्षा का आदेश उसी कार्रवाई की अगली कड़ी माना जा रहा है।

किन पुस्तकों पर उठा विवाद ?

विवाद का केंद्र बनी दो पुस्तकें थीं- “पर्सनैलिटीज एंड लीजेंड्स ऑफ जेएंडके” तथा “ग्रेट पर्सनैलिटीज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर”। इन पुस्तकों में अलगाववादी नेताओं तथा आतंकवाद से जुड़े व्यक्तियों को सकारात्मक और प्रेरणादायक रूप में प्रस्तुत किया गया। जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम (जेकेपीएफ) ने दावा किया कि समग्र शिक्षा योजना 2025-26 के अंतर्गत इन पुस्तकों को सरकारी विद्यालयों की लाइब्रेरी तक पहुंचाया गया। सरकारी जांच में सामने आया कि इन पुस्तकों की प्रतियां जम्मू, रामबन, उधमपुर और बारामुला सहित विभिन्न जिलों के विद्यालयों में वितरित की गई थीं। इसके बाद सभी प्रतियां तत्काल वापस मंगाने के आदेश दिए गए।

मकबूल भट और हाफिज सईद को लेकर सबसे अधिक विवाद

विवादित पुस्तकों में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के संस्थापक मकबूल भट को अत्यंत सम्मानजनक विशेषणों के साथ प्रस्तुत किया गया। रिपोर्टों में दावा किया गया कि उन्हें “शहीद”, “आधुनिक कश्मीर का महान क्रांतिकारी” और “कश्मीर का राष्ट्रपिता” जैसे संबोधनों से वर्णित किया गया। यही नहीं, पुस्तक में उनकी फांसी के बाद शुरू हुई “सशस्त्र क्रांति” का उल्लेख भी सकारात्मक संदर्भ में किए जाने का आरोप लगा।

इसी प्रकार मुंबई आतंकवादी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को भी कथित रूप से महान हस्तियों की श्रेणी में शामिल किए जाने की बात सामने आई, जिसने पूरे विवाद को और गंभीर बना दिया। यदि विद्यालय स्तर की पुस्तकों में ऐसे व्यक्तियों का गौरवपूर्ण चित्रण किया जाता है तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि विद्यार्थियों के सामने इतिहास और राष्ट्र की संवैधानिक व्यवस्था की कैसी छवि प्रस्तुत की जा रही है?

पाकिस्तान समर्थित शब्दावली पर भी उठे सवाल

विवाद व्यक्तियों के साथ पुस्तकों में जम्मू-कश्मीर के लिए “इंडियन ऑक्यूपाइड कश्मीर (IOK)” और “इंडियन हेल्ड कश्मीर (IHK)” जैसी शब्दावली का उपयोग करने पर भी उठा, जोकि लंबे समय से पाकिस्तान के आधिकारिक प्रचार का हिस्सा रही है। साथ ही भारत की संवैधानिक स्थिति के विपरीत कुछ कथनों को भी स्थान दिए जाने के आरोप लगे।

क्या शिक्षा बन रही है वैचारिक संघर्ष का नया मैदान?

जम्‍मू-कश्‍मीर में लम्‍बे समय तक सेवा कार्य कर चुके पूर्व सैनिक परिषद के मध्य एवं उत्तर क्षेत्र संगठन मंत्री सुरेंद्र मिश्रा कहते हैं, “आधुनिक समय में आतंकवाद हिंसक गतिविधियों के साथ अन्‍य स्‍तरों पर भी तेजी स पैर फैला रहा है। यदि प्रत्यक्ष हिंसा कठिन हो जाए तो चरमपंथी विचारधाराएं शिक्षा, साहित्य, सोशल मीडिया और सांस्कृतिक विमर्श के माध्यम से समाज की नई पीढ़ी को प्रभावित करने का प्रयास करती हैं। विद्यालयों की लाइब्रेरी इसलिए अत्यंत संवेदनशील मानी जाती हैं क्योंकि वहां उपलब्ध सामग्री को छात्र प्रामाणिक ज्ञान के रूप में ग्रहण करते हैं।”

उन्‍होंनें कहा, “इसी कारण पुस्तक चयन की प्रक्रिया अकेले साहित्यिक गुणवत्ता का विषय होने तक सीमित होना नहीं है, यह तथ्यपरकता, संवैधानिक मूल्यों, राष्ट्रीय शिक्षा नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा मामला है। जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इसकी जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है।”

 

Topics: आतंकियों का महिमामंडनमनोज सिन्हाकिताबों में आतंकवादवैचारिक आतंकवादजम्मू-कश्मीर समाचार
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