हिंदू धर्म आधारित संस्कारों की शिक्षा पर न्यायिक मुहर, नजीर बना छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का निर्णय
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हिंदू धर्म आधारित संस्कारों की शिक्षा पर न्यायिक मुहर, नजीर बना छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का निर्णय

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय उन सभी के लिए नजीर है, जो अकसर भारतीय हिन्दू ज्ञान परंपरा और धर्म के मूल नैतिक तत्वों पर भी प्रश्न उठाते रहते हैं।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by Lalit Fulara
Jul 10, 2026, 12:43 pm IST
inविश्लेषण

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय उन सभी के लिए नजीर है, जो अकसर भारतीय हिन्दू ज्ञान परंपरा और धर्म के मूल नैतिक तत्वों पर भी प्रश्न उठाते रहते हैं। इसलिए यह एक सरकारी परिपत्र की वैधानिकता तक सीमित न होकर उस मूल प्रश्न का उत्तर भी है, जिस पर लंबे समय से देश में बहस चल रही है कि क्या भारतीय संस्कृति और उसकी ज्ञान परंपरा को विद्यालयी शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए या नहीं।  वस्तुत: सरकारी विद्यालयों में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और शांति मंत्र के वाचन संबंधी राज्य सरकार के निर्देश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि संविधान किसी भी “सांप्रदायिक सिद्धांतों से असंबद्ध नैतिक शिक्षा” पर रोक नहीं लगाता। यह टिप्पणी भारतीय शिक्षा व्यवस्था, संविधान और सांस्कृतिक विरासत के बीच संतुलन स्थापित करने वाली एक महत्वपूर्ण न्यायिक व्याख्या के रूप में देखी जानी चाहिए।

हिंदू परंपराओं का मूल उद्देश्य मनुष्य के भीतर श्रेष्ठ संस्कारों का विकास करना रहा
कहना होगा कि भारतीय शिक्षा की अवधारणा सदैव “सा विद्या या विमुक्तये” के सिद्धांत पर आधारित रही है। यहां शिक्षा का उद्देश्य रोजगार प्राप्त करने के साथ ही ऐसे नागरिक तैयार करना है, जिनमें ज्ञान के साथ चरित्र, अनुशासन, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व भी हो। इसी कारण गुरुकुल परंपरा से लेकर आधुनिक विद्यालयों तक प्रार्थना, शांति पाठ, गुरु वंदना और नैतिक मूल्यों का विशेष स्थान रहा है। इन परंपराओं का मूल उद्देश्य मनुष्य के भीतर श्रेष्ठ संस्कारों का विकास करना रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी अपने विद्यालयों में जो व्यवस्था लागू की, उसका घोषित उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और नैतिक मूल्यों से जोड़ना था। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी स्पष्ट रूप से भारतीय ज्ञान प्रणालियों, स्थानीय परंपराओं और मूल्य आधारित शिक्षा को विद्यालयी पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण अंग मानती है। ऐसे में राज्य सरकार का यह प्रयास उसी व्यापक नीति का विस्तार माना जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने इस व्यवस्था को संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 25, 28, 29 और 30 का उल्लंघन बताते हुए इसे धार्मिक शिक्षा का स्वरूप देने का प्रयास किया। उनका तर्क था कि सरकारी विद्यालयों में ऐसे मंत्रों का वाचन अल्पसंख्यक समुदाय के विद्यार्थियों को असहज कर सकता है। यह एक संवैधानिक प्रश्न था, जिसका उत्तर सिर्फ भावनाओं के आधार पर देना संभव नहीं था, संविधान की भाषा और उसके उद्देश्य से ही दिया जा सकता था। यहीं पर उच्च न्यायालय का निर्णय महत्वपूर्ण हो जाता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 28(1) का आशय राज्य पोषित संस्थानों में किसी विशेष धर्म के कर्मकांड, पूजा-पद्धति अथवा धार्मिक सिद्धांतों की शिक्षा को रोकना है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि नैतिक शिक्षा, नागरिक कर्तव्यों, सामाजिक समरसता और चरित्र निर्माण से जुड़े सांस्कृतिक मूल्यों को भी प्रतिबंधित मान लिया जाए।

भारतीय परंपरा में गायत्री मंत्र को सद्बुद्धि की प्रार्थनाका प्रतीक माना गया
न्यायालय ने यह भी पाया कि सरकारी आदेश में ऐसा कोई बाध्यकारी प्रावधान नहीं है, जिससे किसी छात्र को उसकी धार्मिक मान्यता के विरुद्ध कार्य करने के लिए विवश किया जा रहा हो। महत्वपूर्ण यह भी है कि आदेश में किसी छात्र के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं था, इसलिए यह निर्णय भारतीय संस्कृति और भारतीय संविधान के बीच कृत्रिम टकराव पैदा करने वाली सोच पर भी अप्रत्यक्ष प्रश्नचिह्न लगाता है।

भारतीय परंपरा में गायत्री मंत्र को सद्बुद्धि की प्रार्थना, शांति मंत्र को समस्त विश्व के कल्याण की कामना और सरस्वती वंदना को ज्ञान के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इनका मूल भाव नैतिक और मानवीय है। इन्हें सिर्फ संकीर्ण धार्मिक दृष्टि से देखना भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता को सीमित कर देना होगा। इस निर्णय का एक और महत्वपूर्ण पक्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से जुड़ा है। नई शिक्षा नीति तकनीकी दक्षता से आगे समग्र व्यक्तित्व निर्माण पर बल देती है। उसमें भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत, नैतिक मूल्यों और संवैधानिक कर्तव्यों को शिक्षा का अभिन्न अंग बताया गया है। यदि विद्यालय बच्चों को केवल परीक्षा पास करने की मशीन बना दें और उनके भीतर अनुशासन, करुणा, कृतज्ञता, राष्ट्रबोध तथा सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास न हो, तो शिक्षा अधूरी रह जाएगी।

आज जब समाज अनेक सामाजिक चुनौतियों, बढ़ती हिंसा, नशे की प्रवृत्ति, डिजिटल व्यसन और नैतिक संकट का सामना कर रहा है, तब विद्यालयों में मूल्य आधारित शिक्षा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। यह मूल्य किसी एक धर्म (हिन्दू) तक सीमित कर उन्हें संकीर्ण मान लेना उचित नहीं है, क्योंकि किसी भी धर्म के श्रेष्ठ सिद्धान्त सभ्य समाज की साझा आवश्यकता हैं। यदि भारतीय संस्कृति की सकारात्मक परंपराएं विद्यार्थियों में आत्मानुशासन, एकाग्रता, कर्तव्यबोध और श्रेष्ठ नागरिकता की भावना विकसित करने में सहायक बनती हैं, तो उन्हें पूर्वाग्रह के बजाय विवेकपूर्ण दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह निर्णय इसी संतुलित सोच का प्रतिनिधित्व करता है। अदालत ने न तो संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना से समझौता किया और न ही भारतीय सांस्कृतिक विरासत को संदेह की दृष्टि से देखा। उसने स्पष्ट किया कि नैतिक शिक्षा और सांप्रदायिक शिक्षा में मूलभूत अंतर है तथा दोनों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जा सकता। वास्तव में यह निर्णय आगे छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहेगा। यह भविष्य में शिक्षा, संस्कृति और संविधान से जुड़े अनेक विमर्शों के लिए संदर्भ बिंदु बनेगा। इससे यह संदेश भी जाता है कि भारतीय लोकतंत्र में संविधान और संस्कृति परस्पर विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं। उनका उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए समाज में सद्भाव, नैतिकता और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना है। इसके साथ ही यहां यह भी स्पष्ट हो गया है कि जो लोग भारतीय हिन्दू धर्म एवं संस्कृति को संकुचित आइने से देखते हैं, वे अपने दृष्टिकोण में विस्तार करें, हिन्दू धर्म के नैतिक मूल्य सर्वकल्याणकारी हैं, यानी वे प्रत्येक मनुष्य के जीवन को उत्तरोत्तर आगे श्रेष्ठ दिशा में बढ़ाने वाले हैं। यह किसी संप्रदाय, मत, पंथ, रिलीजन के सीमित दायरे से परे हैं। इसलिए हिन्दू धर्म के सभी सिद्धांत मनुष्य मात्र के हित के लिए हैं, वह सभी के लिए समान हितकारक हैं।

Topics: हिंदू धर्महिंदू धर्म आधारित संस्कारों की शिक्षान्यायिक मुहरछत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का निर्णयहिंदू ज्ञान परंपराHindu tradition of knowledgeRecent judgment of the Chhattisgarh High Court
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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