
भारत में कन्वर्जन, यह विषय पिछले कुछ वर्षों में सामने आए अनेक प्रकरणों से कहीं अधिक व्यापक हो गया है। इसमें विदेशी फंडिंग, वैचारिक हस्तक्षेप, जनजातीय क्षेत्रों में बढ़ती सक्रियता और नक्सली नेटवर्क से संभावित संबंधों जैसे गंभीर आयाम भी जुड़ गए हैं। बेंगलुरु में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शिकायत पर दर्ज हालिया एफआईआर ने एकबार फिर इस पूरे मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।
यदि हम भारत का समग्र चिंतन करते हैं तो एक बात तय है कि भारत की पहचान उसकी सांस्कृतिक विविधता, स्थानीय परंपराओं और हजारों वर्षों से विकसित सामाजिक संरचना से बनती है। विशेष रूप से जनजातीय समाज अपनी विशिष्ट आस्था, जीवन शैली और सांस्कृतिक विरासत के कारण भारतीय सभ्यता का अभिन्न अंग है। ऐसे समाजों में यदि बाहरी वैचारिक हस्तक्षेप योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है तो स्वभाविक है कि उसका प्रभाव धार्मिक परिवर्तन तक सीमित नहीं रहता बल्कि सामाजिक संतुलन और सामुदायिक विश्वास पर भी पड़ता है।
वस्तुत: बेंगलुरु में दर्ज एफआईआर ने इसी चिंता को नए सिरे से सामने रखा है। आरोप है कि अमेरिका स्थित संस्था ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ (टीटीआई) ने विदेशी धन के माध्यम से भारत में व्यापक नेटवर्क तैयार किया। जांच एजेंसियों के अनुसार लगभग 92 करोड़ रुपये से अधिक की राशि विदेशी डेबिट कार्डों के जरिए देश में लाई गई और उसका उपयोग धार्मिक प्रचार, प्रशिक्षण तथा संवेदनशील क्षेत्रों में वैचारिक प्रभाव बढ़ाने के लिए किया गया। इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू वह प्रशिक्षण सामग्री है, जिसके बारे में जांच एजेंसियों ने दावा किया है कि उसमें भारतीय धार्मिक परंपराओं और हिंदू देवी-देवताओं को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया। यदि किसी समुदाय की आस्था को कमजोर करके उसके स्थान पर नई वैचारिक पहचान स्थापित करने की रणनीति अपनाई जाती है तो यह स्वभाविक तौर पर सामाजिक मनोविज्ञान को प्रभावित करने का प्रयास है।
अब यदि भारतीय संविधान के संदर्भ में इसे समझें तो हमारे लोकतांत्रिक समाज में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार महत्वपूर्ण है किंतु वह दूसरे समुदाय की आस्था को अपमानित करने या योजनाबद्ध ढंग से सामाजिक विभाजन पैदा करने का माध्यम नहीं बन सकता, इसके लिए पूरी तरह से मनाही है बल्कि कहें कि इसे अपराध तक घोषित कर रखा है। इसके बावजूद देखने में बार-बार यही आ रहा है कि चर्च पोषित संस्थाएं कन्वर्जन के खेल में लगी हुई हैं।
उदाहरण स्वरूप आप इन बड़े मामलों को भी देख सकते हैं- भीमा कोरेगांव प्रकरण, फादर स्टेन स्वामी से जुड़े आरोप, झारखंड का पथलगड़ी आंदोलन और ओडिशा में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्याकांड जैसे मामले वस्तुत: अलग-अलग घटनाएं भले हों किंतु इन सभी ने समय-समय पर यह प्रश्न अवश्य खड़ा किया कि क्या कुछ क्षेत्रों में सामाजिक, धार्मिक और उग्रवादी नेटवर्क किसी स्तर पर एक-दूसरे के संपर्क में रहे हैं, आखिर इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? विदेशी फंडिंग का प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। भारत में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) इसी उद्देश्य से बनाया गया कि विदेश से आने वाले धन का उपयोग पारदर्शी और घोषित उद्देश्यों के अनुरूप हो। यदि किसी संस्था द्वारा प्राप्त धन का उपयोग सामाजिक सेवा, शिक्षा या स्वास्थ्य के बजाय वैचारिक ध्रुवीकरण, अवैध धर्मांतरण या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए किया जाता है तो यह स्थिति कानून का उल्लंघन होने के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय भी है।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था मानने, उसका प्रचार करने और उसका पालन करने का अधिकार देता है। लेकिन यही संविधान सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और कानून के दायरे को भी समान रूप से महत्व देता है। इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता और संगठित कन्वर्जन के बीच की सीमा को समझना आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति का धार्मिक परिवर्तन उसकी स्वतंत्र इच्छा से होता है तो वह संवैधानिक अधिकार है लेकिन यदि उसके पीछे आर्थिक प्रलोभन, सामाजिक दबाव, विदेशी वित्तपोषण या वैचारिक अभियान काम कर रहे हों तो वह निश्चित तौर पर सिर्फ धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं है, यह तो सीधे-सीधे एक देश की संपूर्ण सभ्यता और संस्कृति को ही बदल देना है!
अब इस नजरिए से देखें तो आज बेंगलुरु से शुरू हुई यह नई जांच उस व्यापक बहस का हिस्सा है, जो लंबे समय से भारत में धर्मांतरण, विदेशी फंडिंग, जनजातीय समाज कें धार्मिक, पांथिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक स्वरूप को पूरी तरह बदलने, वैचारिक नेटवर्क और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संबंधों को लेकर चल रही है। हालांकि यह भी तय है कि आने वाले समय में न्यायिक प्रक्रिया और जांच एजेंसियों की कार्रवाई इस मामले की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट करेंगी, किंतु इतना जरूर लगता है कि भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े ऐसे प्रश्नों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। इस मामले में अच्छा यही होगा कि जितना शीघ्र हो सके, राष्ट्रीय स्तर पर कन्वर्जन के विरोध में सख्त कानून बने, ताकि भारत में धर्मांतरण रोकने की दिशा में सार्थक परिणाम सामने आएं।