शरिया-मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर बाल विवाह की इजाजत नहीं, कानून सभी धर्मों पर समान रूप से लागू : इलाहाबाद हाईकोर्ट
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शरिया-मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर बाल विवाह की इजाजत नहीं, कानून सभी धर्मों पर समान रूप से लागू : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश: शरिया कानून के तहत किशोरावस्था में विवाह की अनुमति देना बाल विवाह निषेध कानून का उल्लंघन। बुलंदशहर जिले में 16 वर्षीय मुस्लिम लड़की की होने वाली शादी को रोकने के लिए हस्तक्षेप करने पर बचाव दल पर हमला किया गया था

Written byएजेंसीएजेंसी
Jul 8, 2026, 12:58 pm IST
inभारत, उत्तर प्रदेश
कोर्ट का फैसला (प्रतीकात्मक चित्र)

कोर्ट का फैसला (प्रतीकात्मक चित्र)

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा कि शरिया एवं मुस्लिम पर्सनल लॉ, जो किसी लड़की के विवाह के लिए यौवन अवस्था ( किशोरावस्था ) को उपयुक्त आयु मानता है, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 और पाक्सो अधिनियम का स्पष्ट रूप से उल्लंघन करता है। यह कानून सभी धर्मों पर समान रूप से लागू है।

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने अपने निर्णय में आगे टिप्पणी की कि देश के प्रत्येक नागरिक के लिए, धर्म की परवाह किए बिना, विवाह की आयु समान है, जैसा कि बाल विवाह निषेध कानून द्वारा स्पष्ट किया गया है।

न्यायालय ने यह आदेश 19 व्यक्तियों द्वारा दायर एक रिट याचिका को खारिज करते हुए दिया, जिसमें उन्होंने पुलिस और चाइल्ड लाइन बचाव दल पर कथित रूप से हमला करने और उनके काम में बाधा डालने के आरोप में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। बुलंदशहर जिले में 16 वर्षीय मुस्लिम लड़की की होने वाली शादी को रोकने के लिए हस्तक्षेप करने पर बचाव दल पर हमला किया गया था। इस घटना को लेकर एफआईआर थाना – काकोर, बुलंदशहर में दर्ज कराई गई है।

मामले में राहत की मांग करते हुए याचिकाकर्ताओं रूबी व अन्य ने तर्क दिया कि मुसलमानों पर लागू शरिया कानून के अनुसार, एक लड़की यौवन अवस्था (आमतौर पर 15 वर्ष मानी जाने वाली) प्राप्त करने के बाद विवाह के लिए योग्य हो जाती है।

उन्होंने दावा किया कि पीसीएम (बाल विवाह निषेध अधिनियम ) 2006, याचिकाकर्ताओं के विवाह संबंधी व्यक्तिगत कानून को प्रभावित नहीं करेगा।

कोर्ट ने खारिज किया तर्क

पीठ ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्तिगत कानून पीसीएमए द्वारा लाए गए बाल विवाह के निषेध या पाक्सो अधिनियम के वैधानिक प्रभावों को समाप्त नहीं कर सकता है। यदि 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के विवाह की अनुमति दी जाती है, तो पाक्सो अधिनियम का स्पष्ट उल्लंघन होगा।

उच्च न्यायालय ने कहा ” पीसीएमए और पीओसीएसओ अधिनियम ऐसे कानून हैं जो इस संबंध में सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीति पर आधारित हैं। इनमें वैज्ञानिक समझ निहित है, जिन्हें विधायी रूप से निषेधात्मक कानूनों में रूपांतरित किया गया है और इससे किसी के लिए भी बचना संभव नहीं है”। इस मुद्दे पर विभिन्न उच्च न्यायालयों के बीच मतभेद को स्वीकार करते हुए, पीठ ने कहा कि वह केरल उच्च न्यायालय के इस तर्क से “पूरी तरह सहमत” है कि कोई भी व्यक्तिगत कानून बाल विवाह पर प्रतिबंध को रद्द नहीं कर सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के 2025 के आदेश का भी उल्लेख

पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के 2025 के आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें शीर्ष न्यायालय ने बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक 2021 के पारित होने तक (कि क्या व्यक्तिगत कानून बाल विवाह अधिनियम पर हावी हो सकते हैं) इस मुद्दे पर संदेह व्यक्त किया था, जिसे 21 दिसंबर 2021 को संसद में पेश किया गया था। हालांकि, खंडपीठ ने आगे कहा कि उक्त विधेयक 17वीं लोकसभा के भंग होने पर समाप्त हो गया था, और इस मुद्दे पर आज तक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कोई आधिकारिक फैसला नहीं सुनाया गया है। मामले के विशिष्ट तथ्यों पर गौर करते हुए, न्यायालय ने पाया कि नाबालिग के माता-पिता और समुदाय द्वारा पीसीएमए का उल्लंघन करते हुए उसकी शादी कराने का सुनियोजित प्रयास किया गया था।

तुरंत कार्रवाई के लिए पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम की सराहना

न्यायालय ने पीड़ित को बचाने के लिए तुरंत कार्रवाई करने के लिए पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम की सराहना की, और कहा कि वे पाक्सो एक्ट के संभावित उल्लंघन को रोकने के लिए अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन कर रहे थे। एफआईआर को रद्द करने से इनकार करते हुए, जिसमें विस्तार से बताया गया था कि बचाव दल के साथ किस प्रकार दुर्व्यवहार किया गया, उन्हें धमकाया गया और याचिकाकर्ताओं के हमले से अपनी जान बचाने के लिए मजबूर किया गया।

न्यायालय ने कहा पीड़िता को जबरन उनकी देखरेख और हिरासत से दूर ले जाया गया, जब तक कि उसे अंततः बचाया नहीं गया। यह निश्चित रूप से एक ऐसा मामला है जहां सरकारी कर्मचारी के कर्तव्यों के पालन में बाधा डालना प्रथम दृष्टया सिद्ध होता है। सामने आए अन्य अपराधों की भी गहन जांच की आवश्यकता है।

परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने एफआईआर में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार न मिलने पर याचिका खारिज कर दी।

Topics: इलाहाबाद हाई कोर्टमुस्लिम पर्सनल लॉबाल विवाहशरिया कानूनशरिया बाल विवाह कोर्ट
एजेंसी
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