श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रयासों से पूर्वी पाकिस्तान में जाने से बचा पश्चिम बंगाल (खंड-4)
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श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रयासों से पूर्वी पाकिस्तान में जाने से बचा पश्चिम बंगाल (खंड-4)

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कलकत्ता दंगों के बाद बंगाल विभाजन कर कलकत्ता सहित पश्चिम बंगाल को भारत में बचाया। जानिए कैसे उन्होंने मुस्लिम लीग और सुहरावर्दी की साजिशों को नाकाम किया।

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
Jul 7, 2026, 12:30 pm IST
inविश्लेषण
dr Shyama prasad Mukharjee mystirious death

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी

ब्रिटेन में क्लीमेंट एटली की सरकार बनने के बाद कैबिनेट मिशन भारत भेजा गया, जिसने देश को एकजुट रखने के लिए समूह योजना प्रस्तुत की। प्रारंभ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने इस योजना को स्वीकार किया, लेकिन बाद में जवाहरलाल नेहरू द्वारा इसे अस्वीकार करने के बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने भी अपनी सहमति वापस ले ली। जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे (प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस) घोषित किया, जिसके बाद कलकत्ता में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए। चार दिनों तक चले इन दंगों में लगभग 15,000 लोग मारे गए।

मुखर्जी ने मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक नीतियों का किया था विरोध

हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग सरकार के दौरान डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल विधानसभा में मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक नीतियों और कुप्रशासन का पुरजोर विरोध किया था l 1946 के कलकत्ता दंगों के समय मुखर्जी ने बंगाल की हिंदू विरोधी नीतियों की कड़ी आलोचना की l उस समय बंगाल में हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नेतृत्व में मुस्लिम लीग की सरकार थी। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हुसैन शहीद सुहरावर्दी के भूमिका की कड़ी आलोचना की।

मुख़र्जी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि यदि पूरे बंगाल को पाकिस्तान में शामिल करने की योजना है तो हिंदुओं की रक्षा के लिए बंगाल का विभाजन अनिवार्य है। दंगों के बाद भी कांग्रेस के किसी बड़े नेता ने कलकत्ता का दौरा नहीं किया, जिसकी आलोचना की गई। इसके बाद कांग्रेस ने व्यावहारिक रूप से भारत के विभाजन को स्वीकार कर लिया। लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का वायसराय बनाया गया और उनके नेतृत्व में विभाजन की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

3 जून 1947 को ब्रिटिश सरकार ने भारत की स्वतंत्रता की घोषणा की

3 जून 1947 को ब्रिटिश सरकार ने भारत की स्वतंत्रता की घोषणा की, लेकिन इसके साथ ही भारत के विभाजन तथा बंगाल और पंजाब के विभाजन की योजना भी घोषित की गई। भारत के विभाजन का निर्णय होने के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल के हिंदू-बहुल क्षेत्रों को भारत में बनाए रखने के लिए व्यापक जनसमर्थन जुटाया। उन्होंने बंगाल विभाजन के पक्ष में जनमत तैयार किया और विभिन्न राजनीतिक नेताओं, बुद्धिजीवियों तथा सामाजिक संगठनों का समर्थन प्राप्त किया। मार्च 1947 में केंद्रीय विधान परिषद के बंगाली हिंदू सदस्यों ने हिंदू महासभा के एन.सी. चटर्जी के समर्थन से एक प्रस्ताव पारित किया।

इसे भी पढें: श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कैसे रोका बंगाल में सांप्रदायिक अन्याय ? (खंड-3)

बंगाल विभाजन की पड़ी नीव

इसके बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 4 से 6 अप्रैल 1947 के बीच हुगली जिले के तारकेश्वर में बंगाल के सभी हिस्सों से आए हिंदू प्रतिनिधियों का दो-दिवसीय ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में आर.सी. मजूमदार और हेमेन्द्र प्रसाद घोष जैसे जाने-माने बुद्धिजीवियों सहित 400 से अधिक प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया कि बंगाल के हिंदू-बहुल क्षेत्रों को काटकर एक अलग प्रांत (पश्चिम बंगाल) बनाया जाए और इसे स्वतंत्र भारत में रखा जाए।

इस आंदोलन को जनता का व्यापक समर्थन मिला। अमृत बाजार पत्रिका द्वारा कराए गए जनमत सर्वेक्षण में 98.6% लोगों ने बंगाल विभाजन का समर्थन किया, जबकि केवल 0.6% लोगों ने संयुक्त बंगाल का समर्थन किया। अप्रैल 1947 में डॉ. मुखर्जी ने वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन से मिलकर बंगाल विभाजन की आवश्यकता और उसके कारणों को विस्तार से समझाया। उनके प्रभावशाली नेतृत्व और प्रयासों के परिणामस्वरूप कलकत्ता सहित पश्चिम बंगाल का बड़ा भाग भारत में बना रहा और पाकिस्तान में जाने से बच गया।  इस प्रकार बंगाल के विभाजन में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है और इसे उनके सार्वजनिक जीवन की प्रमुख उपलब्धियों में गिना जाता है।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रय़ासों से पाकिस्तान बनने से बचा बंगाल

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रयासों से कलकत्ता सहित बंगाल का बड़ा भाग भारत में सुरक्षित रहा और पाकिस्तान में शामिल होने से बच गया। मुस्लिम लीग पूरे बंगाल, विशेषकर कलकत्ता को पाकिस्तान में मिलाना चाहती थी और उसने बंगाल विभाजन का कड़ा विरोध किया। मुख़र्जी के अथक प्रयासों के कारण जब यह प्रयास सफल नहीं होने पर कुछ नेताओं ने स्वतंत्र (संप्रभु) बंगाल बनाने का प्रस्ताव रखा जो भारत और पाकिस्तान दोनों से अलग होता। डॉ. मुखर्जी ने इस योजना का दृढ़ता से विरोध किया और इसे विफल कर दिया।

1946 में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय निर्वाचन क्षेत्र से बंगाल विधान परिषद के लिए निर्विरोध चुने गए और बाद में संविधान सभा के सदस्य भी बने। संविधान सभा में उन्होंने संसदीय परंपराओं, तर्कपूर्ण बहसों और प्रभावशाली वक्तृत्व का परिचय दिया तथा कई महत्वपूर्ण विषयों पर सक्रिय हस्तक्षेप किया। उनकी स्पष्टवादिता, साहस और संसदीय दक्षता के कारण वे राष्ट्रीय स्तर पर एक सम्मानित और लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित हुए। इस प्रकार स्वतंत्रता और संविधान निर्माण के दौर में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल की सुरक्षा, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की नीति से भारत पर किया शासन

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ब्रिटिश शासन की कठोर आलोचना करते हुए कहा कि अंग्रेजों ने छल, बल और “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाकर भारत पर शासन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय जनता अब अंग्रेजों के शासन को स्वीकार नहीं करेगी और उन्हें भारत छोड़ देना चाहिए। डॉ. मुखर्जी संसदीय कार्यप्रणाली और प्रभावशाली वाद-विवाद के लिए प्रसिद्ध थे तथा उनकी प्रशासनिक क्षमता की भी व्यापक प्रशंसा हुई। उनके योगदान के कारण वे राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख नेता के रूप में स्थापित हुए और बंगाल में हिंदू महासभा का नेतृत्व संभाला। प्रारंभ में वे कांग्रेस द्वारा विभाजन स्वीकार किए जाने से असहमत और चिंतित थे, क्योंकि उन्हें इसके गंभीर परिणामों की आशंका थी।

Topics: डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जीश्यामा प्रसाद मुखर्जीश्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल विभाजनबंगाल विभाजन 1947
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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