डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी: देश की एकता के लिए बलिदान देने वाले महान राष्ट्रवादी (खंड-1)
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डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी: देश की एकता के लिए बलिदान देने वाले महान राष्ट्रवादी (खंड-1)

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन, शिक्षा क्षेत्र में योगदान, बंगाल की सांप्रदायिक राजनीति और जम्मू-कश्मीर में देश की एकता के लिए उनके बलिदान की पूरी कहानी। भारत के महान राष्ट्रवादी नेता जो 52 वर्ष की आयु में अमर हो गए।

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
Jul 6, 2026, 10:49 am IST
in विश्लेषण

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवनकाल महज 52 वर्ष का था। अपने जीवन के अंतिम 14 वर्षों में राजनीति के क्षेत्र में असाधारण योगदान देकर इतिहास में उन्होंने अमर स्थान प्राप्त किया। मुख़र्जी का कोई भी दूसरा उद्धरण खोजना नामुमकिन है। मुख़र्जी का 23 जून 1953 को जम्मू-कश्मीर में संदिग्ध परिस्थितियों में निधन हो गया या यों कहें कि देश की एकता और अखंडता के खातिर उन्होंने अपने को बलिदान कर दिया था।

डॉ. मुखर्जी महान शिक्षाविद् सर आशुतोष मुखर्जी के पुत्र थे। मुख़र्जी ने कम आयु में ही शिक्षा और वकालत के क्षेत्र में उत्कृष्ट सफलता प्राप्त करके मिसाल कायम की थी। कलकत्ता विश्वविद्यालय में उन्होंने शानदार शैक्षणिक उपलब्धियाँ हासिल करने के बाद कानून की पढ़ाई की और इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर बने। उनका मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन की विश्वविद्यालय व्यवस्था का अध्ययन कर उसे भारत में लागू करना था। वे केवल 23 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय की सिंडिकेट के सबसे युवा सदस्य बने, जिससे उनकी प्रतिभा और नेतृत्व क्षमता का परिचय मिलता है।

ब्रिटिश शासन में शिक्षा पर भारतीयों का था सीमित अधिकार

ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा को ‘स्थानांतरित विषय’ माना जाता था, इसलिए भारतीयों का उस पर सीमित अधिकार था। इस स्थिति को बदलने के उद्देश्य से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1929 में विश्वविद्यालय निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में विधान परिषद में प्रवेश किया। बाद में कांग्रेस द्वारा परिषद के बहिष्कार का निर्णय लेने पर उन्होंने असहमति जताते हुए अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि सत्ता मुख़र्जी के लिए कभी भी महत्व का मुद्दा नहीं था। मुख़र्जी ने ऐसा करके दिखा दिया था कि वो शिक्षा को राजनीति से अधिक महत्व देते हैं।

मुख़र्जी ने कम आयु में ही शिक्षा जगत में असाधारण उपलब्धियाँ हासिल करते हुए महज 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने और 1934 से 1938 तक दो कार्यकाल तक इस पद पर बने रहे थे। मुख़र्जी कुलपति पद रहते हुए भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व के अध्ययन को बढ़ावा देते हुए विश्वविद्यालय में पहला संग्रहालय स्थापित कराया तथा भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अध्ययन के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी प्रोत्साहित किया था। मुखर्जी ने भारतीय भाषाओं को भरपूर बढ़ावा दिया और 1937 में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बगला भाषा में संबोधन के लिए आमंत्रित किया था। यह  एक ऐतिहासिक पहल थी।

इसी अवधि में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तिगत जीवन में कई दुखों का सामना करना पड़ा था। उनकी बड़ी बहन कमला का बहुत ही कम समय में दो बार विधवा होने के बाद निधन, पिता सर आशुतोष मुखर्जी का 1924 में देहांत और उनकी पत्नी सुधा का असमय निधन उनके लिए गहरे आघात था। पत्नी की मृत्यु के बाद उन्हें अपने चार बच्चों की जिम्मेदारी अकेले निभानी पड़ी मगर अपने देश और समाज सेवा से मुख़र्जी फिर भी विचलित नहीं हुए थे।

1935 में ब्रिटिश संसद ने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पारित किया, जिसके तहत प्रांतों में चुनी हुई सरकारों की व्यवस्था की गई, लेकिन वास्तविक सत्ता ब्रिटिश गवर्नर और प्रशासन के हाथों में ही थी। इस व्यवस्था ने पृथक निर्वाचन क्षेत्रों और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को बढ़ावा दिया। जिससे सांप्रदायिक राजनीति मजबूत हुई। इसी दौर में मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग का प्रभाव बढ़ने लगा। विशेषकर बंगाल में मुस्लिम किसानों और जमींदारों के हितों के कारण अलग राजनीतिक नेतृत्व की मांग तेज हुई जिसने आगे चलकर भारतीय राजनीति की दिशा को भी प्रभावित करते हुए देश के विभाजन का नीव डाला था।

हिन्दू हितों के लिए राजनीति में आए श्यामा प्रसाद मुखर्जी

बंगाल में हिंदू समाज के हितों पर बढ़ते संकट को देखते हुए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने शिक्षा जगत का प्रतिष्ठित जीवन छोड़कर सार्वजनिक जीवन और राजनीति में प्रवेश करना पड़ा था। उनका उद्देश्य बंगाल के हिंदुओं के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करना था क्योंकि उस समय अंग्रेजों की नीतियों और सांप्रदायिक राजनीति के कारण हिंदुओं के साथ काफी अन्याय हो रहा था। मुख़र्जी के राजनितिक में सक्रिय होने का एक प्रमुख कारण उस समय बंगाल की राजनीति में कांग्रेस हिंदुओं के अधिकारों के मुद्दों पर प्रभावी ढंग से आवाज़ नहीं उठा पा रही थी। वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम लीग का प्रभाव लगातार तेजी से बढ़ रहा था। कम्युनिस्ट पार्टी भी मुस्लिम लीग का समर्थन कर रही थी और हिंदू महासभा जैसी संस्थाओं को सांप्रदायिक ठहराकर उसकी आलोचना की जा रही थी।

डॉ. मुखर्जी को राजनीति में आने के लिए कई प्रमुख व्यक्तियों ने प्रेरित किया, जिनमें एन. सी. चटर्जी, सर आशुतोष लाहिड़ी, जस्टिस मनोरंजन नाथ मुखर्जी और भारत सेवाश्रम संघ के संस्थापक स्वामी प्रणवानंद महाराज प्रमुख थे। इनकी प्रेरणा से उन्होंने राष्ट्रहित और समाज सेवा के उद्देश्य से राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई।

30 के दशक के अंत और 40 के दशक के शुरुआत में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी फज़लुल हक़ के नेतृत्व वाली कृषक प्रजा पार्टी का समर्थन कर रहे थे। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की इस रणनीति के पीछे लम्बी और गहरी राजनीतिक चाल थी। मुख़र्जी मुस्लिम लीग के प्रभाव को कम करने के लिए ऐसा कर रहे थे। बंगाल की राजनीति में कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कृषक प्रजा पार्टी तीन प्रमुख दल थे, लेकिन चुनावों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। ऐसी स्थिति में कांग्रेस और कृषक प्रजा पार्टी का गठबंधन बन सकता था, परंतु कांग्रेस नेतृत्व ने इसकी अनुमति नहीं दी। परिणामस्वरूप, कृषक प्रजा पार्टी ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार बना ली। यह  निर्णय बंगाल की राजनीति के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था। मुख़र्जी के रणनीति के खिलाफ भी मुस्लिम लीग का प्रभाव लगातार बढ़ा रहा था और वह अपनी नीतियों को लागू करवा रहा था। इन नीतियों का लाभ मुख्यतः मुसलमानों को मिला और हिंदुओं के हित प्रभावित हुए। इस सरकार में हिंदुओं के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अवसर सीमित होता जा रहा था।

Topics: डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जीश्यामा प्रसाद मुखर्जी जीवनश्यामा प्रसाद मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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