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होम मत अभिमत

‘अश्लीलता पर लगे अंकुश’

जब मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता सामान्य बना दी जाए और उसका असर बच्चों से लेकर पूरे समाज तक दिखाई देने लगे, तब केवल बहस नहीं, बल्कि कानून और सामाजिक जिम्मेदारी दोनों की जरूरत होती है

Written byपदम श्री सुरेंद्र शर्मापदम श्री सुरेंद्र शर्मा
Jul 7, 2026, 12:30 pm IST
inमत अभिमत, मनोरंजन

अगर शुरुआत से ही इस तरह की अश्लील और अभद्र सामग्री पर रोक लगा दी जाती, अगर पहले ही दिन किसी ने अश्लील पोस्ट या ऐसी चर्चा की होती और उस पर सख्ती से कार्रवाई होती, तो आज हमें ये हालात नहीं देखने पड़ते।

मैं स्वयं एक समय फिल्म सेंसर बोर्ड का सदस्य रहा हूं। एक फिल्म में केवल दो-तीन गालियां थीं और कुछ बेहद अश्लील द्विअर्थी संवाद थे। मैंने पूरी फिल्म को अस्वीकार कर दिया था। मैंने साफ कहा था कि चाहे उच्च न्यायालय चले जाइए, लेकिन मैं ऐसी फिल्म को अनुमति नहीं दे सकता। बाद में उन्हें उच्च न्यायालय से मंजूरी मिली, लेकिन मेरा सिद्धांत यही था कि यदि किसी को अश्लीलता ही परोसनी है, तो कम से कम उसके बारे में शिकायत करने का अधिकार भी नहीं होना चाहिए।

आज स्थिति यह है कि जिस सामग्री को आप अपने परिवार के साथ बैठकर नहीं देख सकते, वह खुलेआम सोशल मीडिया पर उपलब्ध है। मेरा मानना है कि ऐसी सामग्री पर कानूनी रूप से प्रतिबंध लगना चाहिए। केवल यह तर्क देना कि इसे बहुत लोग देखते हैं, पर्याप्त नहीं है। सवाल यह नहीं है कि लोग क्या देखना चाहते हैं, बल्कि यह है कि समाज को क्या दिखाया जाना चाहिए।

हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अवश्य है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अश्लीलता और अभद्रता को खुलेआम परोसा जाए। आज सोशल मीडिया पर ऐसा बहुत-सा कंटेंट मौजूद है जिसे परिवार के साथ बैठकर देखना संभव नहीं है। यदि इसे लगातार बढ़ावा दिया जाएगा, तो समाज किस दिशा में जाएगा, इसकी कल्पना कीजिए।हम अक्सर कहते हैं कि भारत विश्वगुरु बनेगा, लेकिन यदि हमारी संस्कृति और नैतिक मूल्य लगातार कमजोर होते गए, तो यह लक्ष्य कैसे पूरा होगा? हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमने आधुनिकता (Modernization) और पाश्चात्यीकरण (Westernization) के बीच का अंतर ही मिटा दिया। आधुनिक बनने की जगह हम अंधानुकरण करने लगे हैं।

विडंबना यह है कि विदेशों के लोग भारतीय संस्कृति से सीखना चाहते हैं, जबकि हम स्वयं अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। इसलिए मेरा मानना है कि इस तरह की अश्लील सामग्री पर कठोर कानूनी नियंत्रण होना चाहिए।

आज छोटे-छोटे बच्चों के हाथ में मोबाइल फोन है। 11–12 वर्ष की उम्र में ही वे ऐसी सामग्री तक पहुंच रहे हैं, जो उनके मानसिक विकास के लिए उचित नहीं है। समाज में बढ़ते अपराधों के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर अनियंत्रित अश्लील सामग्री भी एक गंभीर चिंता का विषय है।

सरकार को इस दिशा में प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना चाहिए। यह कहना गलत होगा कि लोग केवल अश्लील सामग्री ही देखना चाहते हैं। यदि ऐसा होता, तो ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे धारावाहिक अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल नहीं करते। उन धारावाहिकों के प्रसारण के समय सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था। इसका अर्थ है कि लोग अच्छा और संस्कारयुक्त कंटेंट भी पसंद करते हैं।

इसलिए यह धारणा कि केवल अश्लीलता ही दर्शकों को आकर्षित करती है, पूरी तरह सही नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज को स्वस्थ, संस्कारयुक्त और सकारात्मक सामग्री उपलब्ध कराई जाए तथा अश्लीलता पर प्रभावी कानूनी अंकुश लगाया जाए।

मर्यादा लांघती मजाक

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