डॉ हेडगेवार, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बंगाल: ऐतिहासिक जुड़ाव
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डॉ हेडगेवार, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बंगाल: ऐतिहासिक जुड़ाव

पश्चिम बंगाल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) व BJP का रिश्ता सदियों पुराना है। डॉ. हेडगेवार के कलकत्ता प्रवास, अनुशीलन समिति और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा जनसंघ की स्थापना के ऐतिहासिक जुड़ाव का पूरा विश्लेषण पढ़ें।

Written byडॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वालडॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल — edited by Shivam Dixit
Jun 21, 2026, 05:25 pm IST
inभारत, विश्लेषण, संघ @100, पश्चिम बंगाल
RSS BJP and West Bengal History Dr Hedgewar Dr Shama Prasad Mukherjee

हाल ही में हुए बंगाल विधानसभा चुनाव न केवल बीजेपी की एक और जीत थे, बल्कि आंतरिक और बाहरी विरोधियों के लिए एक बड़ी हार भी थे। यह चुनाव न केवल पश्चिम बंगाल के लिए, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए भी बहुत अहम था। विदेशी विरोधियों के साथ-साथ कुछ स्थानीय राजनीतिक गुट भी भारत को फिर से अस्थिर करने की कोशिश कर रहे थे। बंगाल के लोग, खासकर हिंदू, उन राजनीतिक दलों के खिलाफ अपनी एकता के लिए तारीफ के हकदार हैं, जिन्होंने राज्य की अखंडता से समझौता किया है। यह बदलाव जनसंघ के समय से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) की कोशिशों का नतीजा है। दशकों से किए गए बड़े काम को पहचानना ज़रूरी है।

पश्चिम बंगाल, RSS और BJP का ऐतिहासिक संबंध

पश्चिम बंगाल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) तथा भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच का रिश्ता आज के राजनीतिक माहौल तक ही सीमित नहीं है। यह रिश्ता सीधे तौर पर संघ के बनने और जनसंघ की नींव रखे जाने से पहले के समय से जुड़ा है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी की वैचारिक सोच और बाद में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की राजनीतिक भूमिका, दोनों ही पश्चिम बंगाल से जुड़ी रही हैं।

कलकत्ता में डॉ. हेडगेवार और क्रांतिकारी आंदोलन

1910 में, जब युवा केशव बलिराम हेडगेवार मेडिकल की पढ़ाई के लिए कलकत्ता (अब कोलकाता) गए, तो बंगाल भारत में क्रांतिकारी आंदोलनों का मुख्य गढ़ था। डॉ. हेडगेवार देशभक्ति की भावना से भरे हुए थे, इसलिए कलकत्ता जाने के बाद वे वहाँ के मशहूर क्रांतिकारी संगठन ‘अनुशीलन समिति’ के सीधे संपर्क में आए। कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उन्होंने न केवल मेडिकल की पढ़ाई की, बल्कि उस समय के प्रमुख क्रांतिकारियों के साथ देश-सेवा के कार्यों में भी शामिल हुए। वे बिपिन चंद्र पाल, पुलिन बिहारी दास और रास बिहारी बोस जैसे नेताओं के विचारों से प्रभावित थे। उस दौरान उन्होंने क्रांति की कई गुप्त गतिविधियों में सीधे और परोक्ष रूप से हिस्सा लिया।

बंगाल से मिली प्रेरणा और जनसंघ की वैचारिक नींव

कलकत्ता की धरती से डॉ. हेडगेवार को मिली संगठनात्मक प्रेरणा और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा लगाए गए जनसंघ के बीज इस इतिहास का पहला हिस्सा हैं। हालाँकि, बाद के समय में इन वैचारिक विचारों ने बंगाल की धरती पर अपनी पकड़ कैसे मजबूत की और लेफ्ट तथा तृणमूल की कड़ी चुनौतियों के बावजूद बीजेपी ने वहाँ जो राजनीतिक जीत हासिल की, वह आधुनिक भारत के इतिहास का एक बहुत महत्वपूर्ण चरण है।

कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति और संघ की स्थापना

कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति: खिलाफत आंदोलन के दौरान कांग्रेस की भूमिका और मुस्लिम तुष्टिकरण की शुरुआत ने डॉ. हेडगेवार को परेशान किया। उनका मानना था कि समाज की अंदरूनी कमियों, जैसे जाति-भेदभाव और कमज़ोरी, को दूर किए बिना राष्ट्र मज़बूती से खड़ा नहीं हो सकता।

संघ की स्थापना (1925): यह सोचते हुए कि “आज़ादी पाना जितना ज़रूरी है, उसे बनाए रखने के लिए समाज में अनुशासन, चरित्र और संगठन भी उतने ही ज़रूरी हैं,” वे क्रांतिकारी रास्तों और राजनीतिक आंदोलनों से आगे बढ़े और 25 सितंबर 1925 (विजयादशमी) को नागपुर में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की। यह बंगाल में मिले अनुभवों और वैचारिक मंथन का नतीजा था।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और जनसंघ का उदय

संघ के बनने के कुछ दशकों बाद बंगाल एक बार फिर इस विचारधारा से मज़बूती से जुड़ा और वह नाम था डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा वाइस-चांसलर और कट्टर राष्ट्रवादी नेता डॉ. मुखर्जी ने बंगाल के बंटवारे के समय हिंदुओं की रक्षा में अहम भूमिका निभाई। आज़ादी के बाद वे नेहरू की पहली कैबिनेट में उद्योग मंत्री थे, लेकिन नेहरू-लियाकत समझौते और अनुच्छेद 370 (जिसने कश्मीर को विशेष दर्जा दिया था) के विरोध में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया।

उस समय उन्हें एक ऐसे राजनीतिक विकल्प की ज़रूरत थी, जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वकालत करे। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) से बात की। संघ ने डॉ. मुखर्जी की मदद के लिए अपने कुछ प्रमुख स्वयंसेवकों, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी शामिल थे, को भेजा।

कश्मीर आंदोलन और राष्ट्रवाद की नई दिशा

कश्मीर के पूरी तरह विलय के लिए डॉ. मुखर्जी के इस ऐलान ने — “एक देश में दो प्रधान, दो विधान और दो निशान नहीं होंगे” — भारतीय राजनीति को एक नई दिशा दी। कश्मीर में आंदोलन के दौरान उनकी रहस्यमयी मौत ने पूरे देश में राष्ट्रवाद की एक ज़बरदस्त लहर पैदा कर दी।

1947 के बंटवारे के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से लाखों हिंदू शरणार्थी पश्चिम बंगाल आए। उस बेहद मुश्किल समय में RSS स्वयंसेवकों ने सीमा पर और कलकत्ता के कैंपों में राहत शिविर शुरू किए।

बंगाल में संघ का सांस्कृतिक जुड़ाव

हालाँकि वामपंथ के बढ़ते प्रभाव के कारण बंगाल में खुलकर काम करना मुश्किल था, फिर भी संघ ने शिक्षा और सेवा के ज़रिए ग्रामीण इलाकों में संबंध बनाए। संघ ने बंगाल को ‘वास्तु पूजक’ से ‘भारत माता पूजक’ बनाने का कार्य जारी रखा। बंगाल में पूजी जाने वाली ‘शक्ति’ (दुर्गा पूजा) और संघ की ‘राष्ट्र शक्ति’ के बीच संबंध को लोगों के मन में स्थापित किया गया।

भारतीय जनसंघ की स्थापना और बंगाल की भूमिका

21 अक्टूबर 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की, जो आज की ‘भारतीय जनता पार्टी’ (BJP) का पूर्ववर्ती संगठन है। जनसंघ के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष एक बंगाली व्यक्ति थे; इस इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता।

वामपंथ, तृणमूल और राजनीतिक संघर्ष

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान के बाद भी बंगाल में जनसंघ का अस्तित्व बना रहा। हरिभाऊ गोडबोले और प्रो. हरिपाद भारती जैसे नेताओं ने मुश्किल हालात में भी अपनी विचारधारा को बनाए रखा। हालांकि, 1977 के बाद बंगाल में 34 साल तक वाम मोर्चा और बाद में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में रही। इस दौरान संघ और बीजेपी के कार्यकर्ताओं को बेहद हिंसक राजनीतिक दमन का सामना करना पड़ा। कई कार्यकर्ताओं ने अपनी जान गंवाई, लेकिन उन्होंने अपनी विचारधारा नहीं छोड़ी।

2011 के बाद बंगाल की राजनीति में बदलाव

2011 में ममता बनर्जी ने वामपंथियों को सत्ता से बाहर कर दिया। हालांकि, इसके बाद बंगाल में शुरू हुई ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ और बीजेपी-संघ के सांस्कृतिक कार्यक्रमों (जैसे रामनवमी जुलूस) पर लगाई गई पाबंदियों ने बंगाल के मूल ‘भद्रलोक’ (शिक्षित मध्यम वर्ग) और ग्रामीण लोगों को नाराज़ करना शुरू कर दिया।

सर्वांगीण विकास और सनातन संस्कृति की वापसी

सर्वांगीण विकास और सनातन संस्कृति को वापस लाने के लिए बदलाव की एक दबी हुई लहर।

जिस बंगाल ने ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन-गण-मन’ दिया, वहाँ यह भावना घर कर गई थी कि राष्ट्रीय पहचान को कमजोर किया जा रहा है। इसी आधार पर बीजेपी ने बंगाल की जनता को देश भर में और NDA शासित राज्यों में अपने वैचारिक ढाँचे और विकास कार्यों को दिखाकर अपने आप को मज़बूती से स्थापित किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का बंगाल पर विशेष फोकस

2014 के बाद बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह — ने बंगाल पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने गर्व के साथ बंगाल की पहचान, यानी रवींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत को दोहराया।

आज जब हम पश्चिम बंगाल में बीजेपी और संघ परिवार का विस्तार देखते हैं, तो यह केवल एक अस्थायी राजनीतिक लाभ नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक मजबूत ऐतिहासिक आधार है। पश्चिम बंगाल ही वह धरती है, जहाँ युवावस्था में डॉ. हेडगेवार की वैचारिक सोच विकसित हुई और यहीं से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के रूप में जनसंघ का जन्म हुआ। इसलिए, संघ और बीजेपी के इतिहास के तार बंगाल की मिट्टी से हमेशा के लिए जुड़े हुए हैं।

बंगाल में राष्ट्रवाद का सफर

1910 में बंगाल की धरती से नागपुर लाए गए राष्ट्रवाद के जिस बीज को युवा डॉ. हेडगेवार ने बोया था, वह आज एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है। आज वही विचार एक बार फिर बंगाल के कोने-कोने में गूंज रहा है।

‘जय श्री राम’ और ‘वंदे मातरम्’ के नारों का ऐतिहासिक महत्व

जब बंगाल में ‘जय श्री राम’ और ‘वंदे मातरम्’ जैसे नारे लगते हैं, तो यह केवल एक राजनीतिक जीत नहीं होती, बल्कि बंगाल की जनता द्वारा डॉ. हेडगेवार और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के वैचारिक संघर्ष को दी गई ऐतिहासिक मान्यता होती है। यह सफर दिखाता है कि यदि कोई विचार अपनी मूल मिट्टी से जुड़ा हो, तो उसे चाहे कितना भी दबाया जाए, वह नए जोश के साथ फिर से अंकुरित हो उठता है।

Topics: RSS BJP and West Bengal Historyअनुशीलन समिति कलकत्ताभारतीय जनसंघ 1951बंगाल विभाजन इतिहासममता बनर्जी तुष्टिकरणनरेंद्र मोदी अमित शाह बंगालPanchjanya newsडॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जीडॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
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