वॉशिंगटन / सिंगापुर। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर पाकिस्तान और अमेरिका के बीच डगमगाते रिश्तों को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और बेबाक बयान सामने आया है। सिंगापुर के पूर्व राजदूत बिलाहारी कौसिकन (Bilahari Kausikan) ने वैश्विक भू-राजनीति का विश्लेषण करते हुए साफ कहा है कि वाशिंगटन द्वारा पाकिस्तान पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों और प्रतिबंधात्मक नीतियों को हटाने की कोई संभावना नहीं है।
पूर्व राजनयिक के अनुसार, पाकिस्तान आज भी ऐसे तत्वों और समूहों को पनाह दे रहा है जो सीधे तौर पर अमेरिकी हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं, जिसके कारण दोनों देशों के बीच भरोसे की खाई को पाटना नामुमकिन हो चुका है।
“पाकिस्तान जो चाहता है, अमेरिका वह कभी नहीं देगा”
सिंगापुर के पूर्व शीर्ष राजनयिक बिलाहारी कौसिकन ने वाशिंगटन की विदेश नीति का बारीकी से हवाला देते हुए इस्लामाबाद की उम्मीदों को करारा झटका दिया है।
उन्होंने दो टूक शब्दों में में कहा-
“अमेरिका किसी भी कीमत पर पाकिस्तान पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने नहीं जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण और कड़वी सच्चाई यह है कि पाकिस्तान आज भी हर तरह के अजीब, अनियंत्रित और खतरनाक समूहों का मुख्य गढ़ (Hotbed) बना हुआ है, जो लगातार परदे के पीछे से अमेरिका के राष्ट्रीय और वैश्विक हितों के खिलाफ सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। ऐसे में सुरक्षा और कूटनीतिक मोर्चे पर रियायत पाने की पाकिस्तान की चाहत अधूरी ही रहेगी।” – बिलाहारी कौसिकन, पूर्व राजदूत, सिंगापुर
Ex-Singapore Ambassador says America will not give Pakistan what it wants
America is not going to lift the restrictions it has on Pakistan. Because the fact is Pakistan is a hotbed of all kinds of strange groups who are working against America’s interest. pic.twitter.com/HE5QEeCmy4
— Shashank Mattoo (@MattooShashank) July 4, 2026
बदलते वैश्विक समीकरणों में हाशिए पर जाता पाकिस्तान
वहीं अगर रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शीत युद्ध (Cold War) और आतंकवाद के खिलाफ युद्ध (War on Terror) के दौर में जो पाकिस्तान कभी अमेरिका का अग्रिम पंक्ति का सहयोगी हुआ करता था, वह अब वाशिंगटन की प्राथमिकता सूची से पूरी तरह बाहर हो चुका है।
अमेरिका-पाक संबंधों में आई गिरावट के मुख्य बिंदु-
- भरोसे का पूर्ण अभाव: ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में मिलने और अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद से वाशिंगटन का इस्लामाबाद पर से विश्वास पूरी तरह उठ चुका है।
- चीन पर बढ़ती निर्भरता: पाकिस्तान का झुकाव बीजिंग (सीपेक परियोजना) की तरफ अत्यधिक बढ़ने के कारण भी अमेरिका उसे तकनीकी और आर्थिक प्रतिबंधों में कोई ढील नहीं देना चाहता।
- वित्तीय और सैन्य पाबंदियां: अमेरिका ने पहले ही पाकिस्तान को दी जाने वाली अरबों डॉलर की सैन्य सहायता और आधुनिक हथियारों की आपूर्ति पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं, जो कौसिकन के अनुसार आगे भी जारी रहने वाले हैं।
बता दें कि सिंगापुर के इस पूर्व राजनयिक का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान अपनी बदहाल अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों और वाशिंगटन से आर्थिक व कूटनीतिक मदद की गुहार लगा रहा है।
कौसिकन के बयान से साफ संकेत है कि जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से संचालित होने वाले अमेरिकी विरोधी नेटवर्क का पूरी तरह खात्मा नहीं करता, तब तक उसे कोई राहत नहीं मिलने वाली है।
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