उत्तराखंड में कैसे समाप्त हुआ मदरसा बोर्ड? जानिए धामी सरकार के नए अल्पसंख्यक शिक्षा कानून की पूरी इनसाइड स्टोरी!
September 3, 2026
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उत्तराखंड में कैसे समाप्त हुआ मदरसा बोर्ड? जानिए धामी सरकार के नए अल्पसंख्यक शिक्षा कानून की पूरी इनसाइड स्टोरी!

उत्तराखंड में 1 जुलाई 2026 से मदरसा शिक्षा बोर्ड समाप्त हो गया है। जानिए 'उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अधिनियम, 2025' के बनने और नया शिक्षा मॉडल लागू होने की पूरी कहानी।

Written byमनु गौड़मनु गौड़ — edited by Shivam Dixit
Jul 2, 2026, 08:50 pm IST
inभारत, विश्लेषण, मत अभिमत, उत्तराखंड, शिक्षा
Uttarakhand Minority Educational Institutions Act 2025 CM Pushkar Singh Dhami Madarsa Board Abolished

जहां हर वर्ग की महिला को समान अधिकार दिलाने के उद्देश्य से 27 जनवरी, 2025 को उत्तराखण्ड समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना, वहीं उत्तराखण्ड सरकार ने शरियत पर आधारित व्यक्तिगत नागरिक मामलों को समाप्त कर बाल-विवाह, बहु-विवाह, तीन तलाक, हलाला, इद्दत जैसे महिला के सम्मान विरोधी कानूनों को समाप्त कर प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू की। समान नागरिक संहिता हेतु गठित विशेषज्ञ समिति का सदस्य के रूप में इस ऐतिहासिक कार्य के द्वारा महिलाओं के समान अधिकारों हेतु कानून बनाकर विभिन्न समुदायों में फैली असमानता को दूर करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।

रणनीतिक सलाहकार समिति का गठन और मदरसों में आधुनिक शिक्षा की आवश्यकता

समान नागरिक संहिता का कार्य पूर्ण होने पर 05 जून, 2025 को उत्तराखण्ड के माननीय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी ने अपनी अध्यक्षता में एक रणनीतिक सलाहकार समिति का गठन किया। समिति की पहली बैठक में ही राज्य हित की अनेकों नीतियों पर चर्चा हुई, जिसमें प्रमुख था प्रदेश की भावी पीढ़ी को गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराने की व्यवस्था करना। उसके लिए मेरे द्वारा दिए गए सुझाव को समिति के द्वारा वरीयता पर रखा गया कि सबसे पहले उस वर्ग के बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए जहां सबसे अधिक शिक्षा का अभाव है और उन्हें गुमराह करके मदरसों में दीनी तालीम के नाम पर गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा से वंचित रखा जाता है। इसकी चर्चा कई बार उत्तराखण्ड के आई.पी.एस. अधिकारी अभिनव कुमार से बी.एस.एफ. जम्मू-कश्मीर में उनकी नियुक्ति के दौरान आए अनुभव के आधार पर भी हुई, कि बिना अल्पसंख्यक शिक्षा में सुधार लाए देश में समरसता स्थापित करना बहुत ही कठिन है।

उत्तराखण्ड के मदरसों की वर्तमान स्थिति का सर्वेक्षण और अध्ययन

समिति की सहमति के पश्चात समिति के सदस्य सचिव शत्रुघ्न सिंह और मैंने उत्तराखण्ड में जारी उत्तराखण्ड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 एवं उत्तराखण्ड गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता विनियम, 2019 का अध्ययन प्रारम्भ किया और साथ ही उत्तराखण्ड राज्य में चल रहे मदरसों की स्थिति के बारे में उत्तराखण्ड मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष मुफ्ती शमूम कासमी एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के विशेष सचिव पराग मधुकर धकाते से जानकारी ली।

मदरसों की स्थिति के अध्ययन में पाया कि अधिकांश मदरसे उत्तराखण्ड मदरसा बोर्ड से मान्यता के बिना भी राज्य में संचालित हो रहे हैं और मान्यता प्राप्त मदरसों में भी शिक्षा की गुणवत्ता नाम मात्र के बराबर ही है। अधिकतर मदरसों में पढ़ा रहे शिक्षक शिक्षा हेतु न्यूनतम योग्यता को भी पूर्ण नहीं करते थे। यही कारण था कि मदरसों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं में से कोई भी छात्र-छात्रा आज तक न तो आई.ए.एस., आई.पी.एस. बन सका और न ही डॉक्टर, इंजीनियर।

अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि कुल विद्यालय जाने वाले मुस्लिम छात्र-छात्राओं में से मात्र लगभग 4 प्रतिशत छात्र-छात्राएं ही मदरसों में पढ़ने के लिए जाते हैं। मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन और उसमें व्याप्त कट्टरवाद का कारण इससे स्पष्ट हो जाता है कि मदरसों में शिक्षा ग्रहण करने वाले मुस्लिम समाज के मात्र 4 प्रतिशत बच्चे ही भविष्य में मुस्लिम समाज के रहनुमा बनते हैं। इसीलिए हमारे लिए यह सोचने का विषय बन गया कि हमें मुस्लिम समाज से भविष्य में कैसे नागरिक चाहिए – आई.ए.एस., आई.पी.एस., डॉक्टर, इंजीनियर या कट्टरवाद और नफरत फैलाने वाले मुल्ला-मौलवी? इसलिए अब यह आवश्यक था कि अल्पसंख्यकों के लिए भारतीय संविधान में उल्लिखित विशेषाधिकारों के दायरे में रहते हुए मदरसों में शिक्षा के स्तर में व्यापक सुधार किया जाए।

भारतीय संविधान में अल्पसंख्यक समुदायों की परिभाषा और विसंगतियां

यूँ तो भारत का संविधान अपने अनुच्छेद 29 और 30 के अन्तर्गत धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पहचान, संस्कृति एवं शैक्षणिक स्वायत्तता के संरक्षण हेतु विशेष अधिकार प्रदान करता है, परन्तु ऐसे कौन से समुदाय हैं जो अल्पसंख्यक की श्रेणी में आएंगे, इस पर मौन रह जाता है। इसीलिए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के द्वारा मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध एवं पारसी समुदायों को 1993 में अल्पसंख्यक की श्रेणी में लाया गया और 2014 में संशोधन करके इसमें जैन समुदाय को भी सम्मिलित कर लिया गया। अतः 2014 के बाद से संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के द्वारा प्रदत्त विशेष अधिकार उपरोक्त छह समुदायों पर लागू होने लगे।

परन्तु जहां अल्पसंख्यक समुदायों में छह समुदाय आते हैं, वहीं वोट बैंक की राजनीति के कारण अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के नाम पर विभिन्न राज्य सरकारों ने सिर्फ मुस्लिम समुदाय के शैक्षणिक संस्थानों (मदरसों) के लिए विशेष प्रावधान करते हुए कानून बनाए और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को ऐसे ही छोड़ दिया। इन्हीं संवैधानिक प्रावधानों के अनुपालन में विभिन्न राज्यों द्वारा अपने राज्य में मदरसा बोर्ड का गठन किया गया। उत्तराखण्ड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 एवं उत्तराखण्ड गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता विनियम, 2019 भी इसी संवैधानिक अधिकार की परिणति था। अब हम एकमत थे कि संवैधानिक व्यवस्था का पालन करते हुए अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान प्रारम्भ करने एवं संचालित करने का अधिकार सभी छह अल्पसंख्यक समुदायों को दिया जाना चाहिए।

माननीय उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के ऐतिहासिक निर्णय और दिशा-निर्देश

इसके लिए आवश्यक था कि माननीय उच्चतम न्यायालयों के ऐसे ऐतिहासिक निर्णयों का भी अध्ययन किया जाए जिसमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनसे संबंधित संविधान के अनुच्छेदों की व्याख्या की गई हो। अध्ययन करने पर हमने पाया कि टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य, 2002 एवं पी.ए. इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2005 के उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित निर्णय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान प्रारम्भ करने एवं संचालित करने के अधिकार एवं अल्पसंख्यक समुदायों के निर्धारण की महत्वपूर्ण व्याख्या करते हैं।

जहां टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य, 2002 के निर्णय में 11-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक संस्थानों का प्रशासनिक अधिकार मौलिक अधिकार है। राज्य केवल उचित विनियमन (Reasonable Regulation) कर सकता है, जिससे शैक्षणिक उत्कृष्टता बनी रहे, परंतु अल्पसंख्यक चरित्र प्रभावित न हो। वहीं पी.ए. इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2005 प्रकरण में न्यायालय ने यह कहा कि निजी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों पर आरक्षण या कोटा लागू नहीं किया जा सकता और प्रवेश प्रक्रिया और शुल्क निर्धारण में उन्हें स्वायत्तता प्राप्त है।

उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अधिनियम, 2025 का प्रारूप और पारित होना

इन्हीं सब अध्ययनों के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि उत्तराखण्ड राज्य में उत्तराखण्ड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 एवं उत्तराखण्ड गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता विनियम, 2019 को समाप्त करते हुए सभी अल्पसंख्यक समुदायों को गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से संवैधानिक वैधता के साथ एक अधिनियम लाने की आवश्यकता है। समुचित अध्ययन और संवैधानिक वैधता का पूर्ण रूप से ध्यान रखते हुए हमारे द्वारा ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान विधेयक, 2025’ तैयार कर समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

समिति के अध्यक्ष माननीय मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड पुष्कर सिंह धामी जी के द्वारा समिति के अन्य सदस्यों मुख्य सचिव आनंद वर्धन, पूर्व मुख्य सचिव इंदु कुमार पाण्डेय, पूर्व आई.ए.एस. डॉ. राकेश कुमार एवं प्रमुख सचिव नियोजन मीनाक्षी सुन्दरम की सहमति पर अल्पसंख्यक विभाग के विशेष सचिव पराग मधुकर धकाते को मंत्रिमंडल की बैठक में लाने का निर्देश दिया गया। सरकार के कुछ अधिकारियों के द्वारा बिना अध्ययन किए इस पर आपत्तियां भी की गईं, परन्तु माननीय मंत्रिमंडल ने उनके सभी निरर्थक तर्कों को दरकिनार करते हुए 17 अगस्त, 2025 को मंत्रिमंडल की बैठक में विधानसभा में पेश करने हेतु पारित कर दिया। तत्पश्चात 20 अगस्त, 2025 को उत्तराखण्ड की विधानसभा द्वारा पारित होकर इस विधेयक ने ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अधिनियम, 2025’ का रूप ले लिया। भारत गणराज्य में अल्पसंख्यक शिक्षा के क्षेत्र में इस प्रकार का कोई अधिनियम लाकर अभूतपूर्व कार्य करने वाला उत्तराखण्ड पहला राज्य बना।

अधिनियम के मुख्य प्रावधान और मदरसा शिक्षा बोर्ड की समाप्ति

उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अधिनियम, 2025 के प्रमुख प्रावधानों में स्पष्ट किया गया है कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान की परिभाषा में वे संस्थान आएंगे जो किसी धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित और संचालित किए गए हों। प्रशासनिक स्वायत्तता, प्रबंधन, नियुक्ति एवं आंतरिक प्रशासन में स्वतंत्रता से इस अधिनियम में कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है एवं सरकारी विनियमन की सीमा केवल शैक्षणिक मानक, पारदर्शिता एवं छात्र-हित तक सीमित रखी गई है। इस अधिनियम के अन्तर्गत मान्यता एवं अनुदान प्राप्त करने में अल्पसंख्यक स्वरूप के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। इस अधिनियम के सही क्रियान्वयन के लिए ‘उत्तराखण्ड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ का गठन करते हुए उत्तराखण्ड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 एवं उत्तराखण्ड गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता विनियम, 2019 को वर्तमान शैक्षणिक सत्र की समाप्ति के उपरान्त 01 जुलाई, 2026 को समाप्त कर दिया जाएगा।

अल्पसंख्यक संस्थानों की मान्यता के लिए निर्धारित कड़े मानक और शर्तें

इस अधिनियम के अन्तर्गत गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा को ध्यान में रखते हुए उत्तराखण्ड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण किसी शैक्षणिक संस्थान को अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान की मान्यता तभी प्रदान करेगा जब:

आवेदक शैक्षणिक संस्थान एक अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा स्थापित और संचालित हो।

शैक्षणिक संस्थान उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद से संबद्ध हो।

शैक्षणिक संस्थान का प्रबंधन किसी ऐसे निकाय द्वारा किया जा रहा हो, जो सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत सोसाइटी के रूप में, भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 के अंतर्गत न्यास के रूप में, या कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के अंतर्गत गैर-लाभकारी कंपनी के रूप में पंजीकृत हो।

  • जिस भूमि पर शैक्षणिक संस्थान स्थापित हो, उसका स्वामित्व/पंजीकृत पट्टा पंजीकृत सोसाइटी/न्यास/कंपनी के नाम पर हो।
  • शैक्षणिक संस्थान के सभी वित्तीय लेन-देन अनिवार्य रूप से किसी वाणिज्यिक बैंक में उस संस्थान के नाम से खोले गए बैंक खाते के माध्यम से होते हों।
  • सोसाइटी/न्यास/कंपनी की प्रबंध समिति/न्यासी/निदेशक, जैसा भी मामला हो, और शैक्षणिक संस्थान का शासी निकाय, पूर्णतः या अधिकांशतः संबंधित अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्तियों से मिलकर बना हो।
  • पंजीकृत सोसाइटी/न्यास/कंपनी के उद्देश्य और लक्ष्य स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट करते हों कि यह मुख्य रूप से अपने अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की सेवा करने के लिए बनी है।
  • अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अपने छात्रों या कर्मचारियों को अपनी किसी भी धार्मिक गतिविधि में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं करेगा।
  • अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान परिषद द्वारा निर्धारित योग्यताओं के अनुसार शिक्षकों की नियुक्ति करेगा।
  • सभी शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय मामलों में, परिषद और प्राधिकरण द्वारा समय-समय पर निर्धारित नियम और विनियम या जारी किए गए निर्देश अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों पर पूर्णतः लागू होंगे।
  • अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान ऐसा कुछ भी नहीं करेगा जो सांप्रदायिक और सामाजिक सद्भाव के मार्ग में बाधा उत्पन्न करे।

अतिरिक्त धार्मिक विषयों के अध्यापन और मूल्यांकन की विशेष व्यवस्था

प्राधिकरण से अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान की मान्यता प्राप्त करने के उपरान्त इस अधिनियम में अंतर्विष्ट उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान, परिषद द्वारा अनुमत और विहित विषयों के अतिरिक्त, अपने धर्म संबंधी विशिष्ट अतिरिक्त विषयों को पढ़ा सकेगा, जो प्राधिकरण द्वारा निर्धारित मानकों, गुणवत्ता और विषय सामग्री के अनुरूप होंगे।

साथ ही अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान द्वारा पढ़ाए जाने वाले अतिरिक्त विषयों के लिए प्रत्येक अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान प्राधिकरण की समग्र देखरेख में परीक्षा आयोजित करने, छात्रों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने और उन्हें आवश्यक प्रमाण पत्र जारी करने की भी व्यवस्था करेगा। अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान द्वारा जारी किया जाने वाला यह प्रमाण पत्र, परिषद द्वारा निर्गत प्रमाण पत्र के अतिरिक्त होगा।

निष्कर्ष: भारतीय संवैधानिक दर्शन और शैक्षणिक उत्कृष्टता का संगम

उपर्युक्त के आलोक में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अधिनियम, 2025 भारतीय संवैधानिक दर्शन के अनुरूप एक महत्वपूर्ण विधायी प्रयास है। यह अधिनियम न केवल अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि टी.एम.ए. पाई और इनामदार जैसे ऐतिहासिक निर्णयों को गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक रूप में लागू करता है। न्यायिक दिशा-निर्देशों के अनुरूप सही क्रियान्वयन करके इस अधिनियम के द्वारा अल्पसंख्यक शिक्षा के क्षेत्र में स्थिरता, स्वायत्तता और गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकेगी।

Topics: मदरसा बोर्ड समाप्त उत्तराखंडसीएम पुष्कर सिंह धामी शिक्षा सुधारUttarakhand Minority Education Act 2025उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अधिनियमउत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरणमुफ्ती शमूम कासमीटीएमए पाई फाउंडेशन केसPanchjanya newsपराग मधुकर धकातेसमान नागरिक संहिता उत्तराखंडUttarakhand education reform
मनु गौड़
मनु गौड़
सदस्य, रणनीतिक सलाहकार समिति, उत्तराखंड [Read more]
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