विश्लेषण

अमेरिका ने बदला ‘इंडो-पैसिफिक कमांड’ का नाम: क्या चीन के आगे झुका पेंटागन या भारत के लिए है कोई नया दांव?

ट्रंप 2.0 प्रशासन के तहत अमेरिका ने ‘इंडो-पैसिफिक कमान’ का नाम बदलकर फिर से ‘यूएस पैसिफिक कमान’ कर दिया है। जानिए चीन के विरोध और भारत के दृष्टिकोण से इस बड़े फैसले के क्या मायने हैं।

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लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिका ने ‘इंडो-पैसिफिक कमांड’ का नाम बदलकर ‘यूएस पैसिफिक कमांड’ कर दिया है। अमेरिकी सशस्त्र बलों के पास दुनिया भर में जिम्मेदारी के विशिष्ट क्षेत्र के अनुसार सात भौगोलिक कमांड हैं।

यूएस पैसिफिक कमांड अमेरिकी सशस्त्र बलों की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी एकीकृत लड़ाकू कमान है। इस कमान की जिम्मेदारी का क्षेत्र अमेरिका के पश्चिमी तट से लेकर भारत के पूर्वी तट की समुद्री सीमा तक फैला हुआ है।

1947 में यूएस पैसिफिक कमांड के रूप में इसकी स्थापना हुई थी। इसे वर्ष 2018 में राष्ट्रपति ट्रंप 1.0 प्रशासन के तहत ‘इंडो’ शब्द जोड़कर यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड के रूप में नामित किया गया था।

राष्ट्रपति ट्रंप 2.0 प्रशासन के तहत यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर सिर्फ यूएस पैसिफिक कमांड किए जाने पर भारतीय दृष्टिकोण से नजर रखने की जरूरत है।

यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलने का उद्देश्य क्या था?

वर्ष 2018 में ‘इंडो’ शब्द लगाकर यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड के रूप में नाम बदलने का उद्देश्य हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच बढ़ते रणनीतिक जुड़ाव को दर्शाना था। हिंद-प्रशांत क्षेत्र हिंद महासागर और पश्चिमी एवं मध्य प्रशांत महासागर को कवर करता है। आर्थिक दृष्टि से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र दुनिया का सबसे तेजी से समृद्ध होता क्षेत्र है और जाहिर तौर पर इसमें अमेरिका और चीन की अधिकतम रुचि है। इस क्षेत्र में दुनिया की लगभग 55% आबादी बसती है और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 60% हिस्सा यहीं से आता है।

भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, वियतनाम, जापान, न्यूजीलैंड, मालदीव और बांग्लादेश कुछ प्रमुख हिंद-प्रशांत देश हैं।

चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच अमेरिका के लिए भारत क्यों है महत्वपूर्ण?

अमेरिकी सुरक्षा गणना में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए भारत की रणनीतिक भूमिका सर्वोपरि है। एकमात्र महाशक्ति के रूप में अमेरिका ने लंबे समय तक हिंद-प्रशांत क्षेत्र के मामलों पर अपना दबदबा बनाए रखा। इस क्षेत्र में अमेरिका के सैन्य ठिकानों, विमानवाहक पोतों की तैनाती तथा द्विपक्षीय एवं क्षेत्रीय सुरक्षा समूहों के माध्यम से बड़ी संख्या में सैन्य उपस्थिति है।

अमेरिकी आधिपत्य को अब चीन ने चुनौती दी है, जिसकी शुरुआत दक्षिण चीन सागर में उसके जुझारूपन से हुई है। दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस जैसे देशों के साथ चीन का लगातार टकराव हो रहा है और नौसैनिक जहाज अक्सर हमले के करीब आ जाते हैं। आर्थिक रूप से चीन आसियान ब्लॉक पर हावी है और उनके माध्यम से इंडो-पैसिफिक पर प्रभुत्व स्थापित करने की इच्छा रखता है।

इस क्षेत्र में चीनी वर्चस्व का मुकाबला करने के लिए अमेरिका पिछले आठ वर्षों से भारत का अधिक सक्रिय रूप से समर्थन कर रहा है। भारत और अमेरिका ने भारत-प्रशांत समुद्री डोमेन जागरूकता (Indo-Pacific Maritime Domain Awareness – IPMDA) के संचालन में महत्वपूर्ण प्रगति की है, जो भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान की एक क्वाड पहल है।

इंडो-पैसिफिक अवधारणा का चीन क्यों करता है विरोध?

चीन ‘इंडो-पैसिफिक’ शब्द का लगातार विरोध करता रहा है। वह इस अवधारणा को अमेरिका के नेतृत्व वाली रोकथाम रणनीति के रूप में देखता है, जिसका उद्देश्य एक आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में चीन के उदय को दबाना है।

चीन क्वाड और त्रिपक्षीय सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी AUKUS (ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका) जैसे समूहों का भी विरोध करता रहा है। इन दोनों समूहों का गठन एक सुरक्षित हिंद-प्रशांत क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए किया गया है।

अब बीजिंग कमान के नाम से ‘इंडो’ शब्द को हटाने को इस तरह के बहुपक्षीय घेरे के संभावित रोलबैक के रूप में देखता है। आधिकारिक तौर पर चीन ने मिश्रित संकेत दिए हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भविष्य में अमेरिकी कार्रवाइयों पर नजर रखने की बात कही है।

अमेरिका के लिए ऐसा नाम परिवर्तन ट्रंप 2.0 प्रशासन के तहत पेंटागन के व्यापक रीब्रांडिंग अभ्यास के अनुरूप है, जिसकी अगुवाई अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ कर रहे हैं।

भारत के लिए इस बदलाव का क्या अर्थ है?

जहाँ तक भारत का सवाल है, यह पता चला है कि कमान की जिम्मेदारी और संचालन का क्षेत्र पहले जैसा ही है। अल्पावधि में यह नाम परिवर्तन चीन को आश्वस्त करने के लिए सिर्फ एक रीब्रांडिंग अभ्यास हो सकता है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने 13 से 15 मई तक चीन का दौरा किया था। व्यावहारिक रूप से इस यात्रा से बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ, हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी ताइवान नीति की दिशा में बदलाव का संकेत दिया। यह संभव है कि ‘इंडो’ शब्द को हटाने की समझ अमेरिका और चीन के बीच किसी अलिखित समझौते का हिस्सा हो।

लेकिन अमेरिका इंडो-पैसिफिक में चीन के विस्तारवादी एजेंडे से भली-भांति वाकिफ है। इसलिए, जब तक दुनिया को ‘इंडो-पैसिफिक’ शब्द की व्यापक और समान समझ है, तब तक भारत को यूएस पैसिफिक कमांड के नाम बदलने के बारे में ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है।

भारत को किन बातों पर रखनी होगी नजर?

भारत को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या इंडो-पैसिफिक के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता में कोई बदलाव आता है, चाहे वह संयुक्त सैन्य अभ्यास हो, साझा सैन्य प्रोटोकॉल हो या क्षेत्र की समुद्री निगरानी।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने वैश्विक मामलों में भारत के महत्व की आधिकारिक तौर पर सराहना की है और भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की है।

दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया जा रहा है और राष्ट्रपति ट्रंप के अगले वर्ष की शुरुआत में भारत आने की संभावना है। मार्को रुबियो ने जल्द ही क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक की संभावना की भी पुष्टि की है।

इस प्रकार, यूएस पैसिफिक कमांड का नाम परिवर्तन सिर्फ एक रीब्रांडिंग अभ्यास है, जिसमें हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत का प्रमुख महत्व बरकरार है।

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