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होम भारत जम्‍मू एवं कश्‍मीर

सीमा पर संकल्प की सुरंग

भारतीय सेना ने 1948 में जोजिला दर्रे पर अदम्य साहस और सैन्य कौशल का परिचय देते हुए दुश्मन को परास्त किया था। 2026 में जोजिला पर मिली नई सफलता ने भारत की सामरिक शक्ति, इंजीनियरिंग क्षमता और राष्ट्रीय संकल्प को फिर से स्थापित किया।

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)
Jun 30, 2026, 08:39 pm IST
in जम्‍मू एवं कश्‍मीर

 

गत 9 जून को जोजिला सुरंग परियोजना ने एक ऐतिहासिक पड़ाव हासिल किया। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुला की उपस्थिति में सुरंग के अंतिम शेष हिस्से को सफलतापूर्वक जोड़ दिया गया। लद्दाख के उपराज्यपाल भी इस अवसर पर वर्चुअल रूप से जुड़े। इसके साथ ही मुख्य सुरंग की खुदाई का कार्य पूरा हो गया और परियोजना अपने अंतिम चरण में पहुंच गई।

लगभग 11,578 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस महत्वाकांक्षी परियोजना की यह सफलता केवल एक इंजीनियरिंग उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारत की सामरिक सोच, सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े एक लंबे अभियान की बड़ी उपलब्धि भी है। 13.153 किलोमीटर लंबी यह द्वि-दिशात्मक सिंगल ट्यूब रोड सुरंग जम्मू-कश्मीर के बालटाल को लद्दाख के मिनामार्ग से जोड़ेगी। लगभग 6800 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित यह परियोजना वर्ष 2028 में पूरी तरह चालू होने के बाद लद्दाख को वर्षभर सड़क संपर्क उपलब्ध कराएगी। अभी तक भारी बर्फबारी और हिमस्खलन के कारण जोजिला दर्रा लगभग छह महीने बंद रहता है। सुरंग के चालू होने के बाद यह बाधा समाप्त हो जाएगी।

लेकिन जोजिला की कहानी केवल एक सुरंग की कहानी नहीं है। यह उस दर्रे की कहानी है जिसने भारत के इतिहास में कई निर्णायक क्षण देखे हैं। आज जिस जोजिला सुरंग को नए भारत की क्षमता और आत्मविश्वास का प्रतीक माना जा रहा है, उसी जोजिला दर्रे ने 1948 में भारतीय सेना के अद्भुत शौर्य का साक्षी बनकर लद्दाख को भारत के साथ सुरक्षित बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाई थी।

1948 में जोजिला पर सैन्य पराक्रम

अक्टूबर 1948 का अंतिम सप्ताह था। आजादी के बाद पहला भारत-पाकिस्तान युद्ध जम्मू-कश्मीर में चल रहा था। भारतीय सेना लगातार बढ़त बना रही थी और दुश्मन के कब्जे वाले क्षेत्रों को मुक्त करा रही थी, लेकिन जोजिला दर्रे पर जीत हासिल करना आसान नहीं था। ग्रेट हिमालयन रेंज में स्थित यह दर्रा कश्मीर घाटी को लद्दाख से जोड़ने वाला प्रमुख प्रवेश द्वार था।

उस समय पाकिस्तानी सेना और कबायली मिलिशिया ने जोजिला दर्रे और आसपास की ऊंची चोटियों पर मजबूत मोर्चे बना रखे थे। भारी मशीनगनों और एंटी-एयरक्राफ्ट गनों से लैस दुश्मन को हटाना कठिन था। दूसरी ओर सर्दियां निकट थीं और आशंका थी कि भारी बर्फबारी के बाद लद्दाख का संपर्क कट सकता है। भारतीय सेना के शुरुआती पैदल सेना हमले भी अपेक्षित सफलता नहीं दिला सके।
ऐसे में तत्कालीन मेजर जनरल के.एस. थिमैया ने एक साहसिक योजना बनाई। दुश्मन को चौंकाने के लिए स्टुअर्ट लाइट टैंकों को युद्धक्षेत्र तक पहुंचाने का निर्णय लिया गया। उस समय तक इतनी ऊंचाई पर टैंकों की तैनाती का कोई उदाहरण नहीं था। सड़कें और ट्रैक भी इसके लिए उपयुक्त नहीं थे। फिर भी टैंकों को छोटे-छोटे हिस्सों में खोलकर ट्रकों के माध्यम से गुप्त रूप से पहुंचाया गया और बाद में दोबारा जोड़ा गया।

1 नवंबर 1948 को भारतीय सेना ने हल्के टैंकों के साथ हमला किया। टैंकों की अप्रत्याशित मौजूदगी से पाकिस्तानी सेना में अफरा-तफरी मच गई और उसे पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। ऑपरेशन बाइसन के नाम से प्रसिद्ध यह अभियान 1 नवंबर से 24 नवंबर 1948 तक चला। इस विजय ने भारतीय सेना को आगे बढ़ने का अवसर दिया और द्रास तथा कारगिल को मुक्त कराने का मार्ग प्रशस्त किया। इसी के साथ लेह को दुश्मन के कब्जे में जाने से बचाया जा सका। भारतीय सेना की यह विजय केवल एक युद्ध जीत नहीं थी। इसने यह सुनिश्चित किया कि लद्दाख जम्मू-कश्मीर और भारत का अभिन्न हिस्सा बना रहे। जोजिला की लड़ाई भारतीय सैन्य इतिहास में साहस, रणनीति और नवाचार का एक अद्वितीय उदाहरण मानी जाती है।

दशकों पुरानी चुनौती का समाधान

1948 में जोजिला की लड़ाई जीत ली गई थी, लेकिन इसके बाद भी एक बड़ी चुनौती बनी रही। लद्दाख और कश्मीर घाटी के बीच संपर्क मौसम पर निर्भर था। भारी बर्फबारी के कारण जोजिला दर्रा हर वर्ष लंबे समय के लिए बंद हो जाता था। इससे नागरिक जीवन, पर्यटन, व्यापार और सैन्य गतिविधियां सभी प्रभावित होती थीं।

इसी चुनौती को समाप्त करने के लिए जोजिला सुरंग परियोजना को आकार दिया गया। परियोजना का पूर्ण पैमाने पर उत्खनन कार्य अप्रैल 2021 में शुरू हुआ। कोविड-19 महामारी के दौरान भी निर्माण कार्य जारी रखा गया। भारी बर्फबारी, कठोर मौसम और जटिल भूगर्भीय परिस्थितियों के बावजूद परियोजना लगातार आगे बढ़ती रही।

मुख्य सुरंग की अंतिम खुदाई की सफलता ड्रिलिंग चरण की समाप्ति का प्रतीक है। अब कंक्रीटीकरण, संपर्क सड़कों और अन्य आवश्यक कार्यों को पूरा किया जा रहा है। योजना के अनुसार फरवरी 2028 तक परियोजना को पूरी तरह चालू कर दिया जाएगा।
यह परियोजना राष्ट्रीय राजमार्ग और अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (एनएचआईडीसीएल) के तत्वावधान में निर्मित की जा रही है। लेख के अनुसार यह पूरी तरह स्वदेशी परियोजना है। कठिन परिस्थितियों के बीच इसे पूरा करना भारतीय इंजीनियरिंग क्षमता और संकल्प का परिचायक है। परियोजना के पूरा होने के बाद सोनमर्ग और मिनामार्ग के बीच यात्रा का समय लगभग दो घंटे से घटकर 30 मिनट से भी कम रह जाएगा। इससे क्षेत्र में पर्यटन, जनसंपर्क और आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी।

बदलती रणनीतिक सोच और नया भारत

जोजिला सुरंग परियोजना का महत्व केवल परिवहन तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास से है। लेख के अनुसार वर्ष 2014 से पहले सीमावर्ती क्षेत्रों में अवसंरचना विकास को लेकर सोच अपेक्षाकृत रक्षात्मक थी। आशंका रहती थी कि बेहतर सड़कें दुश्मन को भी लाभ पहुंचा सकती हैं।

वर्ष 2014 के बाद इस दृष्टिकोण में बदलाव आया। सीमावर्ती क्षेत्रों को विकास और संपर्क के गलियारों के रूप में देखा जाने लगा। यह विचार सामने आया कि सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास स्वयं राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करता है। इसी सोच के तहत सीमावर्ती गांवों को प्राथमिकता दी गई और वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के अंतर्गत 662 गांवों के विकास को प्राथमिकता प्रदान की गई।

जून 2020 में पूर्वी लद्दाख में गलवान क्षेत्र की घटनाओं के बाद हर मौसम में संपर्क उपलब्ध कराने वाली परियोजनाओं का महत्व और अधिक बढ़ गया। भारतीय सेना को बड़ी संख्या में सैनिकों और संसाधनों को आगे तैनात करना पड़ा। ऐसे क्षेत्रों में सैनिकों, हथियारों और उपकरणों का रखरखाव अत्यंत कठिन और महंगा होता है। ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिकों को नियमित रूप से बदलना पड़ता है तथा रसद आपूर्ति के लिए बड़े संसाधनों की आवश्यकता होती है।

ऐसी परिस्थितियों में सुरक्षित और निर्बाध सड़क संपर्क सैन्य तैयारियों को अधिक प्रभावी बनाता है। जोजिला सुरंग के चालू होने के बाद लद्दाख तक वर्षभर पहुंच संभव होगी। इससे सैनिकों और सैन्य उपकरणों की आवाजाही अधिक सुगम होगी तथा आपात परिस्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया की क्षमता बढ़ेगी। साथ ही हवाई आपूर्ति पर निर्भरता कम होने से रसद लागत में भी कमी आएगी।

सैन्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए परियोजना में आठ कट एंड कवर सेक्शन, चार पुल, 40 पुलिया, बर्फ दीर्घाएं, कैच डैम, हिमस्खलन सुरक्षा संरचनाएं, पहुंच मार्ग और आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था शामिल की गई है। इस दृष्टि से यह केवल एक सुरंग नहीं, बल्कि सामरिक अवसंरचना का एक व्यापक नेटवर्क है।

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पूर्ण एकीकरण की दिशा में विकास और संपर्क परियोजनाओं को नई गति मिली। सुरक्षा परिदृश्य में आए बदलावों के साथ क्षेत्र में पर्यटन और जन-केंद्रित विकास में भी वृद्धि दर्ज की गई है।

आज जोजिला सुरंग परियोजना केवल एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि भारत की बदलती रणनीतिक सोच का प्रतीक बन चुकी है। यह उस आत्मविश्वास का प्रतिनिधित्व करती है जिसके बल पर भारत अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास, संपर्क और सुरक्षा को एक साथ आगे बढ़ा रहा है।

वर्ष 1948 में भारतीय सैनिकों ने साहस और सैन्य कौशल के बल पर जोजिला को विजय का प्रतीक बनाया था। वर्ष 2026 में इंजीनियरों, श्रमिकों और योजनाकारों ने उसी जोजिला को आधुनिक भारत की क्षमता, आत्मनिर्भरता और संकल्प का प्रतीक बना दिया है। यही कारण है कि जोजिला सुरंग परियोजना की यह उपलब्धि 1948 की ऐतिहासिक विजय की तरह ही महत्वपूर्ण दिखाई देती है। एक ने लद्दाख को सुरक्षित रखा था, दूसरी आने वाले दशकों के लिए उसे भारत से और अधिक मजबूती से जोड़ने जा रही है।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषआक्रामक विकासगलवान घाटी घटनासुरंग निर्माणZojila Passबालटाल‘आत्मनिर्भर भारत’ऑपरेशन बाइसनलद्दाखसैन्य पराक्रमकश्मीर घाटीयुद्ध कौशलभारत-पाकिस्तान युद्धइंजीनियरिंग क्षमताराष्ट्रीय सुरक्षास्वदेशी परियोजनाइंजीनियरिंगसुरंग की सुरक्षा
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