देश के संघर्षकाल में अनेक संतों-महापुरुषों को इस्लामिक कट्टरता का शिकार होना पड़ा और असंख्य जनसाधारण को शारीरिक व मानसिक यातनाएं झेलनी पड़ीं। भारतीय इतिहास के पन्नों में मुगलों के क्रूरता के कई उदाहरण छिपे हैं जिनमें से एक है पांचवें सिख गुरु अर्जुन देव जी की बलिदान। सन् सोलह सौ छह में मुगल बादशाह जहांगीर के आदेश पर गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में गिरफ्तार किया गया और कई दिनों तक अमानवीय यातनाएं दी गईं।
जहांगीर की आत्मकथा में गुरु अर्जुनदेव जी के प्रति द्वेष
जहांगीर ने अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-जहांगीरी में स्वयं लिखा है कि गोइंदवाल में एक हिंदू नामक अर्जुन देव था जिसने संत के वेश में हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। उसने खुसरौ नामक विद्रोही राजकुमार को सहायता दी और उसके माथे पर तिलक लगाया। जहांगीर ने इसे राज्य के विरुद्ध कृत्य मानते हुए गुरु की संपत्ति जब्त करने और उन्हें यासा सियासत के अनुसार मृत्युदंड देने का आदेश दिया। यह आदेश मुगल शासन की उस क्रूर नीति का प्रतीक था जिसमें लोकप्रिय संतों को भी राज्य की शक्ति के सामने झुकने के लिए मजबूर किया जाता था।
जहांगीर ने गुरुजी को आदि ग्रंथ में बदलाव करने को कहा
मुगलों के इतिहास में अकबर के विपरीत जहांगीर ने सूफी संतों और अन्य धर्मों के प्रचारकों के प्रति कठोर रुख अपनाया। गुरु अर्जुन देव जी का मामला इसका स्पष्ट उदाहरण है। जहांगीर ने गुरु को इस्लाम स्वीकार करने या आदि ग्रंथ में कुछ अंश हटाने या दो लाख रुपये जुर्माना देने का प्रस्ताव दिया परंतु गुरु ने इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उनकी संपत्ति गरीबों की भलाई के लिए है और ग्रंथ में शामिल वाणी किसी धर्म के विरुद्ध नहीं है। यह इनकार मुगल प्रशासन के लिए असहनीय था क्योंकि गुरु की लोकप्रियता बढ़ रही थी और वे हिंदू मुस्लिम दोनों समुदायों में सम्मानित थे।
गुरुजी को मुरतजाखान को सौंपा
जहांगीर की डायरी के अनुसार उन्होंने मुरतजा खान को गुरु को सौंप दिया और आदेश दिया कि उन्हें राजनीतिक बहाने से यातना देकर मार डाला जाए। यह घटना दर्शाती है कि मुगल शासन में धर्म की आड़ में राजनीतिक विरोधियों को कुचलने की परंपरा थी।
गुरु रामदास जी के पुत्र थे गुरु अर्जुन देव जी
गुरु अर्जुन देव जी का जन्म सन् 1663 में गोइंदवाल में हुआ था। वे गुरु रामदास जी के पुत्र थे और 1681 में गुरुगद्दी पर बैठे। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन किया जो बाद में गुरु ग्रंथ साहिब बना। यह ग्रंथ एकता और मानवता का संदेश देता है जिसमें विभिन्न संतों की वाणी शामिल है। गुरु अर्जुन देव जी ने हरिमंदिर साहिब का निर्माण करवाया और सिख पंथ को संगठित किया। उनकी शिक्षाएं प्रेम करुणा और एक ईश्वर की आराधना पर आधारित थीं। वे मानते थे कि सभी मनुष्य समान हैं और धर्म का आधार सेवा और त्याग है। यह संदेश उस युग में क्रांतिकारी था जब मुगल राज में धार्मिक विभाजन को बढ़ावा दिया जा रहा था।
क्रूर यातनाएं हंसते हंसते झेली
मुगल क्रूरता का सबसे भयावह रूप गुरु अर्जुन देव जी की यातना में देखा गया। सिख परंपरा के अनुसार उन्हें लाहौर में चंदू शाह के घर या दीवान में लाया गया जहां पांच दिनों तक लगातार यातनाएं दी गईं। पहले दिन उन्हें भूखा प्यासा रखा गया और रात भर जागने के लिए मजबूर किया गया। दूसरे दिन उन्हें तांबे के बर्तन में उबलते पानी में बैठाया गया जिससे उनकी त्वचा जल गई। तीसरे दिन उन्हें तपते लोहे के तवे पर बैठाया गया और उनके शरीर पर उबलती रेत डाली गई। चौथे और पांचवें दिन भी इसी तरह की यातनाएं जारी रहीं। गर्मी के मौसम में लाहौर की तपती धूप में यह सब कुछ और भी असहनीय था। जहांगीर के आदेश के अनुसार यासा कानून के तहत ऐसी यातनाएं दी जाती थीं जिनमें खून बहाए बिना पीड़ा पहुंचाई जाए। गुरु जी का शरीर फफोले पड़ गए और जल गया परंतु वे शांत बैठे रहे और वाणी पढ़ते रहे। उन्होंने कहा तेरा कीया मीठा लागे जिसका अर्थ है कि तेरी इच्छा मुझे मीठी लगती है।
गुरुजी को इस्लाम कबूलने को कहा
ऐतिहासिक स्रोतों में भाई गुरदास जी ने समकालीन विवरण दिया है कि गुरु को यातना दी गई और वे शांत रहे। जहांगीर की तुजुक-ए-जहांगीरी में सीधे तौर पर यातना का वर्णन नहीं है परंतु आदेश की क्रूरता स्पष्ट है। अन्य सिख ग्रंथों जैसे दबिस्तान-ए-माजहिब में भी इस घटना का उल्लेख है। मुगल प्रशासन ने गुरु को इस्लाम स्वीकार करने के लिए दबाव डाला परंतु उन्होंने इनकार कर दिया। उनका कहना था कि धर्म हृदय की बात है और जबरदस्ती से नहीं बदला जा सकता। यह रुख मुगलों की उस नीति के विरुद्ध था जिसमें विजित क्षेत्रों में इस्लामीकरण को बढ़ावा दिया जाता था।
बलिदान ने सिख पंथ को नई दिशा दी
गुरु अर्जुन देव जी के बलिदान ने सिख समुदाय को एक नई दिशा दी। उनके पुत्र गुरु हरगोबिंद जी ने सिख पंथ को सैन्य रूप दिया और मीरि पीरि की अवधारणा प्रस्तुत की जिसमें आध्यात्मिक और लौकिक शक्ति का संतुलन है।
ईर्ष्या के शिकार हुए गुरुजी
मुगल दरबार में साजिशें और ईर्ष्या आम थीं। चंदू शाह जैसे अधिकारियों ने गुरु के विरुद्ध षड्यंत्र रचे क्योंकि गुरु ने उनकी पुत्री का विवाह हरगोबिंद जी से इनकार कर दिया था। यह व्यक्तिगत ईर्ष्या भी मुगल प्रशासन की कमजोरी थी जहां व्यक्तिगत द्वेष राज्य नीति को प्रभावित करते थे। गुरु अर्जुन देव जी ने इन सबके बावजूद करुणा का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि सभी प्राणी एक ही ईश्वर की संतान हैं और हिंसा से कुछ नहीं मिलता। उनकी वाणी में भक्ति और सेवा का महत्व है। आदि ग्रंथ में शामिल उनकी रचनाएं आज भी मानवता को प्रेरित करती हैं।
बदला सिख पंथ का स्वरूप
सन् सोलह सौ छह में गुरु अर्जुन देव जी के बलिदान के बाद सिख इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हुआ। गुरु हरगोबिंद जी ने लाहौर किले के सामने अकाल तख्त स्थापित किया और सिखों को आत्मरक्षा के लिए तैयार किया। मुगलों की क्रूरता ने सिख पंथ को और मजबूत किया। जहांगीर के बाद औरंगजेब के शासन में गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान हुआ जो इसी शृंखला का हिस्सा था। मुगल शासन की असहिष्णुता ने अंतत: साम्राज्य की नींव को कमजोर किया क्योंकि लोगों में असंतोष बढ़ा। गुरु अर्जुन देव जी का संदेश था कि सच्ची शक्ति प्रेम और त्याग में है न कि तलवार में। उनकी वाणी आज भी हमें सिखाती है कि मानवता का आधार समानता और करुणा है।











