क्या थी चीन की चेस्टिटी सुसाइड? क्यों लाखों महिलाओं ने की आत्महत्या?
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क्या थी चीन की चेस्टिटी सुसाइड? क्यों लाखों महिलाओं ने की आत्महत्या?

चीन के इतिहास में विधवाओं की आत्महत्या बहुत ही गहरी रूढ़ि रही है। यह मूल रूप से मिंग और चिंग राजवंशों में थी।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jun 17, 2026, 09:10 pm IST
inविश्व
चीन में लाखों महिलाओं को करनी पड़ी आत्महत्या (चित्र - प्रतीकात्मक)

चीन में लाखों महिलाओं को करनी पड़ी आत्महत्या (चित्र - प्रतीकात्मक)

इन दिनों चीन के और पाकिस्तान के कथित इन्फ्लुएंसर भारत के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं। वे सोशल मीडिया पर झूठे तथ्य परोस रहे हैं। उनका जवाब भी दिया जा रहा है। इससे चीन का वह इतिहास भी सामने आ रहा है, जिस पर वह चुप्पी साधता है। चीन को अपना सर्वेसर्वा मानने वाले वामपंथी बहुत ही चतुराई से चीन के इतिहास में घटी हजारों या कहें लाखों विधवाओं की आत्महत्याओं को छिपा ले जाते हैं। उन घटनाओं को विमर्श में नहीं लाते।

मगर सूचनाओं और इतिहास को दबाया नहीं जा सकता है। वे एक न एक दिन सामने जरूर आती हैं। ऐसा ही अब चीन के साथ हो रहा है। जिसे छिपाने में उसने अथाह श्रम किया, वह है “Chastity Suicide” का इतिहास।

क्या होती थी चेस्टिटी सुसाइड?

चीन के इतिहास में विधवाओं की आत्महत्या बहुत ही गहरी रूढ़ि रही है। यह मूल रूप से मिंग और चिंग राजवंशों में थी, जिनका शासनकाल 1368 से 1911 तक रहा। अर्थात 500 सालों से अधिक। इस लंबी अवधि में विधवाओं का जीवन नरक बना रहा। या तो उन्हें आत्महत्या करने पर विवश किया गया या फिर उन्हें उपेक्षित जीवन मिला।

दरअसल कन्फ़्यूशियस विचारधारा में स्त्री की देह की नैतिकता को बहुत उच्च पैमाना दिया गया था। स्त्री की निष्ठा और पवित्रता को ही परिवार और समाज का आधार माना जाता था। और यदि पति की मृत्यु हो जाती थी, तो विधवा को पुनर्विवाह करने से हतोत्साहित किया जाता था।

यदि विधवा अपना जीवन जीने के लिए पुनर्विवाह करती थी तो उसे अपमानित किया जाता था। उसका कहीं न कहीं सामाजिक बहिष्कार होता था। मगर यदि वह आत्महत्या कर लेती थी, तो उसे “जिंगबियाओ” अर्थात राजा की तरह से प्रमाणपत्र से सम्मानित किया जाता था।

क्या थी यह “जिंगबियाओ” व्यवस्था?

इस शब्द का अर्थ होता है, राजा की तरफ से प्रमाणपत्र या सम्मान या फिर पट्टिका! अब राजा या कहें राजवंश की ओर से ऐसा प्रमाणपत्र किसी बहादुरी या समाजसेवा के कार्य के लिए नहीं दिया जाता था। उपरोक्त कालखंड में चीन में जिंगबियाओ एक ऐसी सरकारी व्यवस्था थी, जिसमें विधवाओं को त्याग का पाठ पढ़ाया जाता था और अगर वे त्याग वाला जीवन जीने में सरकार के दिशानिर्देशों का पालन करती थीं, तो उनके परिवारवालों को राजा की तरफ से सम्मानित किया जाता था।

सरकार की तरफ से सामाजिक और नैतिक दबाव डाला जाता था, क्योंकि आत्महत्या करने वाली या फिर पुनर्विवाह न करने वाली विधवाओं के नाम पर शिलापट्ट, स्मारक आदि बनवाए जाते थे और उनका स्थानीय गजेटियर में नाम दर्ज होता था। यह कहा जाता है इस शासनकाल के दौरान लाखों महिलाओं के नाम इस गजेटियर में दर्ज किए गए। विधवाओं की आत्महत्या और फिर से विवाह न करने के लाखों मामले हुए थे। विधवाओं पर सामाजिक और पारिवारिक दबाव होता था कि वे आत्महत्या करें। दूसरा सबसे बड़ा कारण था कि विधवाओं के पास जीवनयापन का कोई भी सहारा नहीं होता था, इसलिए उन्हें विवश होकर आत्महत्या करनी पड़ती थी। यह भी कहा जाता है कि आत्महत्या करने वाली विधवाओं के परिजनों को सम्मान और कभी-कभी आर्थिक लाभ भी प्राप्त होता था।

इन लाखों आत्महत्याओं के पीछे कोई व्यक्तिगत कारण नहीं था, बल्कि यह सरकारी और सामाजिक दबाव था। इंटरनेट पर और खंगालते हैं तो फुजियान प्रांत, जिआंगसू प्रांत, आनहुई समेत कई प्रांत हैं, जहां पर स्थानीय गजेटियर में और स्मारकों में, या फिर स्तंभों में, ऐसी विधवाओं के नाम सार्वजनिक रूप से लिखवाए जाते थे जिससे लोगों को ऐसे त्याग से प्रेरणा मिले।

सवाल यह है कि तमाम ऐतिहासिक शोषणों से महिलाओं को न्याय दिलवाने का दावा करने वालीं भारत की फेमिनिस्ट चीन के इस इतिहास पर बात क्यों नहीं करती हैं?

 

Topics: चीनमहिला विमर्शचीन में महिलाएं
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