क्यों चीन के राजवंशों में जिंदा दफनाई जाती थीं पत्नियां, दास और सैनिक? 'चीन के काले इतिहास' पर वामपंथी इतिहासकार चुप
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क्यों चीन के राजवंशों में जिंदा दफनाई जाती थीं पत्नियां, दास और सैनिक? ‘चीन के काले इतिहास’ पर वामपंथी इतिहासकार चुप

चीन को प्राचीन काल से ही सभ्यता और संस्कृति का केंद्र घोषित करने वाले वामपंथियों ने कभी भी उस काले इतिहास को नहीं बताया, जिसे बताए जाने की आवश्यकता थी।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jun 19, 2026, 09:15 pm IST
in विश्व
चीन के राजवंशों में जिंदा दफना दी जाती थीं पत्नियां, सैनिक और दास-दासियां (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

चीन के राजवंशों में जिंदा दफना दी जाती थीं पत्नियां, सैनिक और दास-दासियां (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

चीन के इशारे पर सोशल मीडिया पर भारत को बदनाम करने का अभियान चल रहा है। वामपंथी और औपनिवेशिक मीडिया का यह बहुत पुराना शगल है कि भारत को किसी तरह से बदनाम किया जाए। भारत के इतिहास को विकृत किया जाए। चर्च और जिहादी कुरीतियों को हिंदुओं पर थोपा जाए।

क्या आपको पता है कि चीन में राजवंशों में पत्नियों और दासियों, सैनिकों और दासों को राजा की मौत पर उनके साथ जिंदा दफना दिया जाता था? प्राचीन चीन में यह प्रथा प्रचलित थी। परंतु चीन को सभ्यता का केंद्र बताने वाले वामपंथियों ने कभी भी चीन की इन तमाम घटनाओं का उल्लेख शायद ही किया हो।

चीन को प्राचीन काल से ही सभ्यता और संस्कृति का केंद्र घोषित करने वाले वामपंथियों ने कभी भी उस काले इतिहास को नहीं बताया, जिसे बताए जाने की आवश्यकता थी। विधवाओं को लेकर भी चीन के समाज की सोच अच्छी नहीं थी।

क्या था क्रूर इतिहास?

चीन में क्रूरता अभी तक किसी न किसी रूप मे जारी है, परंतु ईसापूर्व 1600 से लेकर 17वीं शताब्दी तक बहुत ही भयावह दौर था। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि राजा की प्रिय दासी या दास होने का क्या पुरुस्कार हो सकता था? राजा या रईसों की मौत के बाद इस मान्यता के अंतर्गत कि जीवन तो मृत्यु के बाद भी होता है, तो दूसरे लोक मे भी राजा या अमीरों को वही सुविधाएं मिलती रहें, राजा की पत्नियों, दासों, सैनिकों को जिंदा ही उनके साथ दफना दिया जाता था।

इसे ‘शुनझांग’ (Xunzang) या ‘शेंगशुन’ कहा जाता था। चीन में दूसरी शताब्दी ईसापूर्व के किन राजवंश के संस्थापक किन सही हुआंग की कब्रों के पास टेराकोटा सेना की 9000 प्रख्यात प्रतिमाओं के साथ और भी बहुत कुछ है। वहां पर हजारों लोगों के अवशेष हैं, जिन्हें जिंदा ही राजा के साथ दफनाया दिया गया था।

theworldofchinese.com के अनुसार चीन में यह कुप्रथा अधिकतर राजवंशों में रही। यहां तक कि यह हालिया राजवंश ‘किंग’ (1616 – 1911) में भी, जबकि इसे रोकने की बार-बार कोशिशें की गईं। सैकड़ों वर्षों तक चली इस कुप्रथा के कारण हजारों लोगों की मौत हुई।

कब्रों में हजारों लोग जिंदा दफन

जरा कल्पना करें, सैकड़ों साल तक राजा की कब्रों में हजारों लोग जिंदा दफन होते रहे और विश्व इतिहास में भी इसे नहीं पढ़ाया जाता है। यह मान्यता थी कि इंसान का जीवन मृत्यु के बाद भी रहता है, तो दूसरे लोक में व्यक्ति को किसी भी चीज का अभाव न हो तो उसके साथ पर्याप्त धन भी गाड़ा जाता था। अब जो भी इन विशालकाय कब्रों का निर्माण करते थे, वे बेचारे मजदूर केवल इस कारण मार दिए जाते थे, क्योंकि लोगों को इस बात का डर होता था कि वे लोग खजाने से भरी कब्र के विषय में और लोगों को बता देंगे और कब्रों के लुटेरे कब्र लूट लेंगे।

कई बार लोगों से शराब के नशे में साथ मरने के वादे ले लिए जाते थे, मगर अधिकतर लोगों के साथ ऐसा नहीं होता था। एक बहुत ही हैरान करने वाला किस्सा है, जिसमें एक राजा ने अपनी बेटी की आत्महत्या के बाद सैकड़ों लोगों को अजीब तरीके से मरने के लिए छोड़ दिया।

राजा ने अपने कर्मचारियों को यह आदेश दिया

514 से 496 ईसापूर्व तक वू राज्य के राजा रहे हेलू ने अपनी बेटी राजकुमारी तेंग्यु की आत्महत्या के बाद हजारों आम लोगों को उसके साथ दफनाए जाने पर मजबूर कर दिया। उसके अंतिम संस्कार वाले दिन राजा ने अपने कर्मचारियों को यह आदेश दिया कि वे लोग दर्जनों सफेद सारसों को उसकी बेटी के लिए बने शानदार मकबरे में लेकर जाएं। इस अजीब दृश्य को देखने के लिए हजारों लोग उस जुलूस के पीछे-पीछे जाने लगे। जैसे ही वे लोग मकबरे के भीतर पहुंचे वैसे ही राजा ने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया कि सारसों सहित सभी लोगों के लिए दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दें!

राजाओं के लिए आम लोगों की कोई अहमियत नहीं

इतिहास की उस क्रूरता के विषय में अनुमान ही लगाया जा सकता है कि राजाओं के लिए आम लोगों का जीवन कुछ नहीं था, उन्हें जिंदा दफन कर दिया जाता था और इतिहास में कोई सुनवाई ही नहीं उनकी?

हालांकि इसे रोके जाने के लिए भी आवाज़ें उठती रहीं, मगर उनपर कभी सुनवाई हुई तो कभी नहीं भी हुई। ये स्थितियां मिंग वंश (1368 – 1644) तक जारी रही थीं। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि शुरुआती पांच मिंग सम्राटों के लिए ‘शुन्ज़ांग’ (xunzang) के तौर पर लगभग 100 शाही रखेलों की जान ले ली गई थी।

हालांकि, उसके बाद सम्राट यिंग ने इस कुप्रथा पर रोक लगा दी थी। फिर भी बाद के किंग राजवंश के शुरुआती सालों में मांचू रईस भी ‘शुआनज़ांग’ (xuanzang) का पालन करते थे, मगर कांग्सी सम्राट (Kangxi Emperor) ने 1673 में इस काम पर साफ़ तौर पर रोक लगा दी थी।

हालांकि व्यक्तिगत रूप से ऐसी घटनाएं छुटपुट होती रहीं कि पति की मृत्यु के बाद पत्नी ने भी आत्महत्या कर ली। जैसे कि वर्ष 1935 में झेजियांग के पूर्व गवर्नर लू दी पिंग की मृत्यु के कुछ ही घंटों बाद, उनकी 27 वर्षीय दूसरी पत्नी शा फूरेन (गर्भवती) ने नानजिंग स्थित आवास की तीसरी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। उनकी पहली पत्नी ने भी आत्महत्या करने की कोशिश की थी, मगर उन्हें रोक लिया गया था।

इस घटना के बाद चीन में अधिकारियों ने यह अभियान चलाया कि उन्हें मरणोपरांत सम्मानित किया जाए। उन दोनों का एक ही साथ अंतिम संस्कार किया गया।

मुंह सिले बैठे हैं वामपंथी इतिहासकार

विधवाओं को लेकर चीन के समाज की सोच कैसी रही थी। जो भी पत्नी अपने पति के साथ मरती थी या आत्महत्या करती थी, उसे सम्मानित दृष्टि से देखा जाता था और कहा जाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों मे यह अभी भी जारी हो, मगर इससे परे यदि मिंग वंश तक देखें तो लाखों लोगों को केवल राजाओं की सेवा के लिए दफनाया जाता रहा और वामपंथी इतिहास इन लाखों हत्याओं पर मुंह सिले बैठा है।

 

 

 

 

 

Topics: महिला विमर्शचीन में महिलाएंचीन की कुप्रथाचीन के राजवंशचीन का इतिहास
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