महाराणा प्रताप थे हल्दीघाटी युद्ध के असली विजेता
July 12, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

महाराणा प्रताप थे हल्दीघाटी युद्ध के असली विजेता

भारतीय इतिहास में कुछ युद्ध ऐसे हैं जिनका महत्व केवल उनकी सैन्य सफलता या असफलता से नहीं, बल्कि उनके द्वारा स्थापित आदर्शों और मूल्यों से निर्धारित होता है। 18 जून 1576 को मेवाड़ की धरती पर लड़ा गया हल्दीघाटी का युद्ध ऐसा ही एक ऐतिहासिक संघर्ष था।

Written byवासुदेव देवनानीवासुदेव देवनानी — edited by Mahak Singh
Jun 17, 2026, 10:15 am IST
in भारत
महाराणा प्रताप जयंती

महाराणा प्रताप जयंती

महाराणा प्रताप मेवाड़ के 13वें राणा और भारत के सबसे सम्मानित राजपूत शासकों में से एक थे। उनका जन्म अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 9 मई 1540 को मेवाड़ -मारवाड़ की सीमा पर स्थित राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में महाराणा उदय सिंह द्वितीय के घर हुआ था लेकिन हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार, महाराणा प्रताप का जन्म विक्रम सम्वत 1597 में ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को माना जाता है, इसके अनुसार इस वर्ष 17 जून को महाराणा की 489 वीं जयंती के साथ ही हल्दीघाटी युद्ध की 450 वीं वर्षगांठ भी मनाई जा रही है I

भारतीय इतिहास में कुछ युद्ध ऐसे हैं जिनका महत्व केवल उनकी सैन्य सफलता या असफलता से नहीं, बल्कि उनके द्वारा स्थापित आदर्शों और मूल्यों से निर्धारित होता है। 18 जून 1576 को मेवाड़ की धरती पर लड़ा गया हल्दीघाटी का युद्ध ऐसा ही एक ऐतिहासिक संघर्ष था। कई इतिहासकार इस युद्ध को अनिर्णायक बताते हैं, क्योंकि युद्ध के बाद कोई स्पष्ट राजनीतिक या सैन्य परिणाम सामने नहीं आया। किंतु यदि इस युद्ध के उद्देश्य, उसके परिणाम और उसके दूरगामी प्रभावों का विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हल्दीघाटी युद्ध के वास्तविक विजेता महाराणा प्रताप ही थे। महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर के बीच संघर्ष केवल दो शासकों का युद्ध नहीं था। यह स्वतंत्रता और साम्राज्यवाद, स्वाभिमान और अधीनता, राष्ट्रधर्म और सत्ता विस्तार के बीच का संघर्ष था। अकबर ने राजपूताना के अधिकांश राज्यों को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया था। आमेर सहित अनेक रियासतें मुगल सत्ता के अधीन आ चुकी थीं। केवल मेवाड़ ऐसा राज्य था जिसने अपने गौरव और स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया।

“हल्दीघाटी: स्वाभिमान, वीरता और बलिदान की अमर गाथा”

महाराणा प्रताप ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा कर दी थी कि वे किसी भी परिस्थिति में मेवाड़ की स्वतंत्रता का सौदा नहीं करेंगे। अकबर ने कई बार दूत भेजकर महाराणा प्रताप को समझाने का प्रयास किया। राजनयिक वार्ताएं हुईं, समझौते के प्रस्ताव आए, लेकिन महाराणा प्रताप अपने संकल्प पर अडिग रहे। अंततः अकबर ने सैन्य शक्ति के माध्यम से मेवाड़ को झुकाने का निर्णय लिया। इसी का परिणाम था 18 जून 1576 को हुआ हल्दीघाटी का युद्ध। इस युद्ध में हल्दीघाटी की संकरी घाटी में महाराणा प्रताप की सेना और मुगल सेना आमने-सामने हुईं। मुगल सेना का नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह कर रहे थे। संख्या और संसाधनों की दृष्टि से मुगल सेना कहीं अधिक शक्तिशाली थी, जबकि महाराणा प्रताप के पास सीमित सैनिक और साधन थे। इसके बावजूद मेवाड़ की सेना ने असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया। युद्ध के प्रारंभिक चरण में राजपूतों और भील योद्धाओं ने मुगल सेना को भारी क्षति पहुंचाई। युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप का साहस अद्वितीय था। अपने प्रिय नीले-सफेद अश्व चेतक घोड़े पर सवार होकर उन्होंने सीधे शत्रु सेना के केंद्र पर हाथी पर सवार मुगल सेनापति मानसिंह पर आक्रमण किया। चेतक का वह प्रसिद्ध पराक्रम, जिसमें उसने हाथी पर छलांग लगाकर अपने स्वामी को आक्रमण का अवसर प्रदान किया, आज भी भारतीय वीरता का प्रतीक माना जाता है। यद्यपि युद्ध के दौरान चेतक गंभीर रूप से घायल हो गया और एक 25 फीट चौड़े बरसाती नाले से छलाँग लगा महाराणा प्रताप की जीवन रक्षा के बाद में उसकी मृत्यु हो गई, लेकिन उसने प्रताप का पीछा कर रहें मुगल सैनिकों से अपने स्वामी का जीवन बचाकर निष्ठा और समर्पण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। हल्दीघाटी के युद्ध में अनेक वीर सेना नायकों, राजपूत सरदारों, भील योद्धाओं और सहयोगी राजाओं का सामूहिक पराक्रम महाराणा प्रताप की ताकत बना। विशेष रूप उनके स्वामिभक्ति प्रिय चेतक घोड़े एवं झाला मान सिंह का बलिदान, भामाशाह का त्याग, हकीम खान सूर की वीरता, राणा पुंजा भील का समर्पण भारतीय इतिहास में पराक्रम, स्वामि-भक्ति, त्याग, बलिदान और राष्ट्रनिष्ठा के अमर उदाहरण हैं।

हल्दीघाटी युद्ध के बारे में अक्सर कहा जाता है कि मुगल सेना युद्धभूमि पर बनी रही लेकिन इतिहास का गहन अध्ययन करने वाले इतिहासकारों के अनुसार हकीकत में मुग़ल सम्राट अकबर के सेनापति मानसिंह, महाराणा प्रताप के भीषण हमले से दशहत में आकर मैदान छोड़ भाग गए थे। किसी भी युद्ध की सफलता का मूल्यांकन उसके मूल उद्देश्य की प्राप्ति से किया जाता है। अकबर का उद्देश्य महाराणा प्रताप को बंदी बनाना, मेवाड़ को पूरी तरह अपने अधीन करना और प्रताप को मुगल सत्ता के सामने झुकाना था। इनमें से कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। महाराणा प्रताप न तो बंदी बने, न उन्होंने आत्मसमर्पण किया और न ही मेवाड़ की स्वतंत्रता समाप्त हुई। इसके विपरीत महाराणा प्रताप युद्ध के बाद भी संघर्षरत रहे। यदि हल्दीघाटी में उनकी हार हुई होती तो वे युद्ध के बाद सक्रिय प्रतिरोध करने में सक्षम नहीं होते। उन्होंने अरावली के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में रहकर संघर्ष जारी रखा। घास की रोटियां खाकर, जंगलों में जीवन व्यतीत करके और असंख्य कठिनाइयों का सामना करके भी उन्होंने स्वतंत्रता की ज्योति को बुझने नहीं दिया। महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने युद्ध के बाद अपनी शक्ति को पुनर्गठित किया। भामाशाह जैसे राष्ट्रभक्त सहयोगियों ने उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान की। राणा पुंजा के नेतृत्व में भील समुदाय ने उनका हर कदम पर साथ दिया। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी सेना को पुनः संगठित किया और मुगल चौकियों पर आक्रमण आरंभ कर दिए। 1582 में दिवेर का युद्ध इस संघर्ष का महत्वपूर्ण पड़ाव बना। इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगल सेना को पराजित कर मेवाड़ के अधिकांश भाग को पुनः मुक्त करा लिया। इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने दिवेर के युद्ध को “मेवाड़ का मैराथन” कहा है। हल्दीघाटी के छह वर्ष बाद प्राप्त यह विजय सिद्ध करती है कि महाराणा प्रताप की शक्ति समाप्त नहीं हुई थी, बल्कि वे और अधिक दृढ़ होकर उभरे थे। हल्दीघाटी युद्ध के बाद भी मुगल सम्राट अकबर ने कई वर्षों तक मेवाड़ को पूरी तरह जीतने का प्रयास किया, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। अकबर के जीवनकाल में चित्तौड़गढ़ और मांडलगढ़ को छोड़कर मेवाड़ का अधिकांश क्षेत्र पुनः महाराणा प्रताप के नियंत्रण में आ गया था। यह तथ्य स्वयं सिद्ध करता है कि अंततः सफलता किसे प्राप्त हुई।

महाराणा प्रताप की विजय का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष नैतिक और वैचारिक विजय थी। उस समय जब अनेक शासक अपनी सत्ता और सुविधाओं के लिए मुगल दरबार की अधीनता स्वीकार कर चुके थे, तब महाराणा प्रताप ने स्वतंत्रता को सर्वोच्च मूल्य माना। उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्वाभिमान किसी भी साम्राज्य की शक्ति से बड़ा होता है। उनके लिए राज्य का वैभव और सुख -सुविधाएँ भोगना नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का सम्मान महत्वपूर्ण था। महाराणा प्रताप की इसी भावना ने उन्हें भारतीय जन मानस का अमर नायक बना दिया। यदि किसी युद्ध का विजेता केवल वह होता जो युद्धभूमि पर अंतिम क्षण तक खड़ा रहे, तो इतिहास में अनेक आक्रमणकारी महान कहलाते। लेकिन इतिहास उन लोगों को अधिक सम्मान देता है जिन्होंने अपने आदर्शों की रक्षा की। महाराणा प्रताप ने जीवन भर संघर्ष किया, किंतु कभी पराधीनता स्वीकार नहीं की। यही उनकी सबसे बड़ी विजय थी। हल्दीघाटी में मौजूद शिलालेखों में भी यह उल्लेख मिलता है कि हल्दीघाटी युद्ध के असली विजेता महाराणा प्रताप ही थे।

पग पग भम्या पहाड,धरा छोड राख्यो धरम।
महाराणा’र मेवाङ, हिरदे बसिया हिन्द रै॥

महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी युद्ध का वास्तविक विजेता मानने के पक्ष में मौटे रूप से 9 प्रमुख बिंदु गिनाए जा सकते है ।

1. अकबर का मुख्य उद्देश्य पूरा नहीं हुआ

मुगल सम्राट अकबर का लक्ष्य महाराणा प्रताप को बंदी बनाना या उनकी अधीनता स्वीकार करवाना था। युद्ध के बाद भी महाराणा प्रताप स्वतंत्र रहे और मुगलों के हाथ नहीं आए।

2. महाराणा प्रताप ने आत्मसमर्पण नहीं किया

हल्दीघाटी के बाद भी महाराणा प्रताप ने कभी मुगल सत्ता के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। जीवन के अंतिम क्षण तक वे स्वतंत्र शासक बने रहे।

3. मेवाड़ का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ

यदि मुगलों की निर्णायक विजय होती तो मेवाड़ का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मेवाड़ स्वतंत्र रहा और संघर्ष जारी रहा।

4. युद्ध के बाद प्रतिरोध जारी रहा

हारने वाला पक्ष सामान्यतः प्रतिरोध की क्षमता खो देता है, जबकि महाराणा प्रताप ने युद्ध के बाद भी मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा और अपनी शक्ति को पुनर्गठित किया।

5. दिवेर युद्ध में निर्णायक सफलता

1582 के दिवेर युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगल चौकियों को ध्वस्त कर मेवाड़ के बड़े भाग को पुनः मुक्त करा लिया। यह हल्दीघाटी के संघर्ष की दीर्घकालिक सफलता थी।

6. अधिकांश मेवाड़ पर पुनः अधिकार

अपने जीवनकाल में महाराणा प्रताप ने चित्तौड़ और मांडलगढ़ को छोड़कर मेवाड़ के अधिकांश भूभाग पर पुनः नियंत्रण स्थापित कर लिया था।

7. अकबर को बार-बार अभियान चलाने पड़े

यदि हल्दीघाटी में मुगलों की पूर्ण विजय हुई होती तो अकबर को बार-बार मेवाड़ के विरुद्ध अभियान नहीं चलाने पड़ते। लगातार सैन्य प्रयासों के बावजूद वह महाराणा प्रताप को झुका नहीं सका।

8. नैतिक और वैचारिक विजय

हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की नैतिक और वैचारिक विजय हुई। वे स्वतंत्रता, स्वाभिमान और राष्ट्रगौरव के प्रतीक बनकर उभरे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि दृढ़ संकल्प के साथ सीमित संसाधनों के बावजूद आत्मसम्मान की रक्षा की जा सकती है।

9. इतिहास और जनमानस ने प्रताप को विजेता माना

आज भारत में हल्दीघाटी का स्मरण होते ही वीरता और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में महाराणा प्रताप का नाम लिया जाता है, जबकि मुगलों की और से युद्ध का नेतृत्व करने वालों को वैसी लोक स्वीकृति नहीं मिली। जनमानस की स्मृति में प्रताप ही इस संघर्ष के नायक और विजेता हैं। हल्दीघाटी का युद्ध सैन्य दृष्टि से भले अनिर्णायक माना जाए, लेकिन अकबर का उद्देश्य विफल होना, महाराणा प्रताप का कभी अधीनता स्वीकार न करना, दिवेर की विजय, मेवाड़ की पुनर्प्राप्ति और स्वतंत्रता के आदर्श की रक्षा ये सभी तथ्य सिद्ध करते हैं कि महाराणा प्रताप ही हल्दीघाटी युद्ध के वास्तविक विजेता थे।

महाराणा प्रताप की 489 वीं जयंती और हल्दीघाटी युद्ध की 450 वीं वर्षगांठ पर आज हर भारतीय के मन मानस में महाराणा प्रताप के साहस, त्याग, राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान की भावना जीवंत है और उनके जीवन से यह संदेश मिलता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अपने सिद्धांतों और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना ही सच्चा पुरुषार्थ है। हल्दीघाटी का युद्ध इसी अमर संदेश का प्रतीक है। अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हल्दीघाटी का युद्ध भले ही सैन्य दृष्टि से अनिर्णायक रहा हो, लेकिन उसके वास्तविक विजेता महाराणा प्रताप ही थे। यही कारण है कि चार शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी महाराणा प्रताप भारतीय जनमानस में विजय, स्वतंत्रता और आत्म सम्मान के सबसे उज्ज्वल प्रतीक बने हुए हैं। हल्दीघाटी जाने वाले श्रद्धालु और पर्यटक यहां की पीले रंग की मिट्टी को नमन कर उसे अपने मस्तिक पर लगाते है और साथ ले जाकर अपने पूजा घरों में उसकी पूजा करते है।

हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और ऑपरेशन सिन्दूर के बाद भारतीय सैनिकों को संबोधित अपने भाषण में महाराणा प्रताप के बहादुर घोड़े चेतक की गति और सटीक वार से आधुनिक भारतीय हथियारों से दिलचस्प तुलना की और कहा कि- “कौशल दिखलाया चालों में, उड़ गया भयानक भालों में…राणा प्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था…” ये बात आज के आधुनिक भारतीय हथियारों पर सटीक बैठती हैं।

महाराणा प्रताप” के स्थान पर “अकबर महान” के पाठ होने से होती थी पीड़ा

मुझे प्रारम्भ से ही स्कूली पुस्तकों में “महाराणा प्रताप” के स्थान पर “अकबर महान” के पाठ होने से बहुत पीड़ा होती थी। मुझे जब राजस्थान का शिक्षा मंत्री बनने का सौभाग्य मिला तो मैंने सर्प्रथम राजस्थान के स्कूल पाठ्यक्रम में “अकबर महान” के स्थान पर “महाराणा प्रताप महान” सहित 200 महापुरुषों के अध्याय शामिल कराए। राजस्थान की नई पुस्तकों में “अकबर महान”  शीर्षक को हटाने और “महाराणा प्रताप” को प्रमुख राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत करने का यह निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना था। कई समाचार पत्रों और मीडिया संस्थानों ने उस समय इसे “अकबर नहीं, महाराणा प्रताप महान” के रूप में प्रकाशित और प्रसारित किया था।

महाराणा प्रताप का जीवनकाल भले ही सोलहवीं सदी में सीमित रहा हो, लेकिन उनकी विरासत भारत के जन-मन में जीवित है और वे आज भी हमारी आन, बान और शान के प्रतीक हैं। उनका नाम मात्र सुनते ही शौर्य, स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और राष्ट्रप्रेम की भावना जाग जाती है।

माई एहड़ा पूत जण, जेहड़ा राणा प्रताप।
अकबर सूतो ओझकै, जाण सिराणै साँप॥

महाराणा प्रताप ने जो श्रेष्ठ आदर्श स्थापित किए, वे न केवल इतिहास में अमर हैं, बल्कि आज के समय में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। वर्तमान परिस्थितियों में देश की नई पीढ़ी को महाराणा प्रताप के शौर्य, वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता एवं राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए मर मिटने और उनके आदर्शों को आत्मसात करने की शिक्षा और प्रेरणा लेनी चाहिए। आज जब हम राष्ट्र और समाज के निर्माण और विकास में जुटे हैं, तब महाराणा प्रताप की तरह निडर, आत्म सम्मानी और न्यायप्रिय बनना ही उनके प्रति हम सभी की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

Topics: history of MewarMaharana Pratap JayantiBattle of HaldighatiBattle of Haldighati 1576Rajput braveryChetak horsenational leader Maharana PratapMaharana PratapIndian History
वासुदेव देवनानी
वासुदेव देवनानी
लेखक वासुदेव देवनानी राजस्थान विधानसभा के माननीय अध्यक्ष हैं। [Read more]
ShareTweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

आज का इतिहास

4 जुलाई का इतिहास: टाइगर हिल विजय और स्वामी विवेकानंद स्मृति दिवस, जानें इस दिन की प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं

सम्राट कपिलेंद्र देव के राज्याभिषेक की 591वीं वर्षगांठ पर भव्य आयोजन, इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से पुनः देखने की जरूरत

hitler gandhi: लोकतंत्र की सबसे काली रात! आपातकाल में कैसे जी रहा था भारत?

(AI-generated image)

क्या भारत की कई मस्जिदें पहले मंदिर थीं? विदेशी इतिहासकारों की किताबों में दर्ज दावों ने फिर छेड़ी बहस

छत्रपति शिवाजी महाराज

छत्रपति शिवाजी महाराज की नीतियां क्यों मानी जाती हैं अपने समय से सदियों आगे?

श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज

हिंदवी स्वराज्य की घोषणा: छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का महत्व और इतिहास

Load More

ताज़ा समाचार

मणिपुर में मैतेई समुदाय के घरों में आग लगा दी गई

मणिपुर: कुकी प्रदर्शनकारियों के मार्च के दौरान मैतेई समुदाय के घरों में लगाई गई आग

Uttarakhand Lok Samvardhan Parva Dehradun CM Pushkar Singh Dhami Kiren Rijiju First State Partnership

देहरादून में ‘लोक संवर्धन पर्व’ का शुभारंभ, केंद्रीय मंत्रालय संग साझेदारी करने वाला पहला राज्य बना उत्तराखंड

Mirzapur Gym Jihad Case Gang Leader Imran Property Seized Gangster Act UP Police

मीरजापुर ‘जिम जिहाद’ : गैंग लीडर इमरान की 50 लाख रुपये की संपत्ति कुर्क

शुभेंदु अधिकारी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल

CM शुभेंदु अधिकारी बोले- गुजरात की तर्ज पर बंगाल में भी निवेशकों के लिए जमीन और मंजूरी प्रक्रिया होगी आसान

ओडिशा में एससीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में त्रुटियों पर बड़ा एक्शन: CM मोहन माझी ने दिए क्राइम ब्रांच जांच के आदेश

पश्चिम बंगाल: ऋतब्रत गुट ने घोषित की TMC की नई जिला इकाइयां… देखते रह गईं ममता बनर्जी! 

CM Yogi in Gorakhpur Yogi Adityanath Samajwadi Party Congress Ram Bhakt UP Politics

“रामभक्तों के खून से सना है सपा का इतिहास…” गोरखपुर में गरजे सीएम योगी, कांग्रेस और अखिलेश यादव पर बोला करारा हमला!

Explainer: आर्थिक कूटनीति का नया भारत और प्रधानमंत्री मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा

बांग्लादेश में मानसून का कहर: बाढ़- भूस्खलन से 44 की मौत, 10 लाख से अधिक प्रभावित

US-ईरान तनाव पर पाकिस्तान और सऊदी अरब क्यों चिंतित? बातचीत बहाल पर दिया जोर

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies