वाराणसी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शोध और अनुसंधान के मूल उद्देश्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि कोई भी शोध केवल अकादमिक संतुष्टि के लिए नहीं, बल्कि विकास और लोक कल्याण की भावना से प्रेरित होना चाहिए। शोध का अंतिम उद्देश्य राष्ट्र को मजबूत, सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना होता है।
अपने दो दिवसीय वाराणसी दौरे के अंतिम दिन मुख्यमंत्री काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और वैदिक विज्ञान केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित विज्ञान भारती के सातवें राष्ट्रीय अधिवेशन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर दीप प्रज्वलित कर महाधिवेशन का औपचारिक शुभारंभ किया और विज्ञान भारती की वार्षिक रिपोर्ट का विमोचन भी किया।
ज्ञान-विज्ञान की अविरल धारा है काशी
काशी की ऐतिहासिक महत्ता का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे का मूल उद्देश्य ही इस पावन नगरी को ज्ञान-विज्ञान की एक ऐसी अविरल धारा के रूप में पहचान दिलाना था, जिसके लिए हमारी काशी अनादि काल से जानी जाती रही है। उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान का इतिहास करीब 400-500 साल पुराना है और जिन देशों ने विज्ञान व तकनीक पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया, आज दुनिया के मंचों पर उनका वर्चस्व कायम हो गया।

“ज्ञान जहां से भी मिले, उसका खुले मन से स्वागत होना चाहिए। लेकिन केवल किसी विचार या तकनीक को अपनाना ही पर्याप्त नहीं है; उसके मूल भाव, परिणाम, प्रभाव और सामाजिक उद्देश्य को समझना भी उतना ही जरूरी है। आज पूरी दुनिया में प्रतिस्पर्धा और संघर्ष इसी बात को लेकर है।”
– योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री (UP)
आंकड़ों में समझिए: भारत के आर्थिक और तकनीकी वैभव का इतिहास
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में भारत की ऐतिहासिक समृद्धि के प्रामाणिक आंकड़े प्रस्तुत किए, जो दर्शाते हैं कि कैसे विदेशी आक्रांताओं और औपनिवेशिक काल ने भारत को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाया:
| ऐतिहासिक कालखंड | वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी (%) |
|---|---|
| 2000 वर्ष पहले का भारत | लगभग 45 प्रतिशत |
| 400 वर्ष पहले (विदेशी आक्रांताओं का कठिन दौर) | 24 से 25 प्रतिशत |
| वर्ष 1947 (आजादी के समय) | महज 1.5 से 2 प्रतिशत |
उन्होंने प्रश्न किया कि दो हजार साल पहले भारत की हिस्सेदारी इतनी बड़ी क्यों थी? इसका सीधा कारण यह था कि भारत का समाज और यहां के अन्नदाता किसान लगातार नवाचार (Innovation) करते थे। हमारे पूर्वज प्राकृतिक तरीकों से भूमि की उर्वरता बनाए रखने पर काम करते थे। कृषि हमारे लिए केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि आरोग्यता का माध्यम भी थी। आज हमने रासायनिक खादों पर निर्भर होकर अपनी प्राचीन पशुपालन आधारित समृद्ध कृषि व्यवस्था को भुला दिया है।
देश-विदेश के 1200 वैज्ञानिक इन विषयों पर करेंगे महामंथन
इससे पूर्व, बीएचयू के कुलपति प्रोफेसर अजीत कुमार चतुर्वेदी ने मुख्यमंत्री का अंगवस्त्र पहनाकर आत्मीय स्वागत किया। उद्घाटन सत्र में मुख्यमंत्री के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर व अन्य गणमान्य मनीषी मंच पर मौजूद रहे।
विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. शिवकुमार शर्मा के अनुसार, इस दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन में देश-विदेश से लगभग 1200 प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। इनमें वैज्ञानिक, शोधकर्ता, शिक्षाविद, नीति-निर्माता और उद्योग जगत के प्रतिनिधि शामिल हैं, जो आत्मनिर्भर भारत की कार्ययोजना तैयार करेंगे।
अधिवेशन के मुख्य वैचारिक सत्र:
- वन हेल्थ (One Health): इस महत्वपूर्ण सत्र का नेतृत्व राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के अध्यक्ष डॉ. बी. एन. गंगाधर कर रहे हैं, जिसमें स्वास्थ्य, पर्यावरण और अनुसंधान संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञ साझा स्वास्थ्य चुनौतियों पर विमर्श करेंगे।
- विकसित भारत हेतु नेट ज़ीरो (Net Zero): इस सत्र का नेतृत्व मध्य प्रदेश शासन के ऊर्जा तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव मनु श्रीवास्तव कर रहे हैं। इसमें सतत विकास और ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) के आयामों पर चर्चा होगी।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं नैतिकता (AI & Ethics): समसामयिक तकनीकी चुनौतियों, एआई के नैतिक उपयोग और समाज पर इसके प्रभावों को लेकर भी विशेषज्ञ अपनी शोध योजनाएं प्रस्तुत करेंगे।
यह राष्ट्रीय अधिवेशन भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय के माध्यम से ‘विकसित भारत’ के संकल्प को साकार करने की दिशा में एक प्रभावी मंच सिद्ध होगा।
















