तेलंगाना में सनातन संस्कृति बड़ी खोज! मिलें 16वीं सदी के सनातनी भित्तिचित्र
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सनातन संस्कृति का जीवंत प्रमाण: तेलंगाना में मिले 16वीं सदी के सनातनी भित्तिचित्र, सोमेश्वर मंदिर में खुला रहस्य!

तेलंगाना के ऐतिहासिक कोलनूपाक सोमेश्वर मंदिर (Kolanupaka Someswara Temple) के मण्डप की छत पर 16वीं शताब्दी का एक प्राचीन कन्नड़ शिलालेख मिला है। पढ़ें कल्याणी चालुक्य राजवंश और सोमेश्वर प्रथम से जुड़े इस ऐतिहासिक प्रमाण की पूरी रिपोर्ट

Written byShivam DixitShivam Dixit
Jun 12, 2026, 08:00 pm IST
in भारत, धर्म-संस्कृति, तेलंगाना
Kolanupaka Someswara Temple Mural Paintings Telangana KTCB

(भित्तिचित्रों के चित्र) क्रेडिट द न्यू इंडियन एक्सप्रेस

हैदराबाद। भारत की भूमि का कण-कण इतिहास, अध्यात्म और उत्कृष्ट शिल्पकला की गवाही देता है। इसी गौरवशाली परंपरा का एक और जीवंत उदाहरण तेलंगाना में सामने आया है।

यहां राज्य के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध कोलनुपाक सोमेश्वर मंदिर (Kolanupaka Someswara Temple) के मण्डप की छत पर प्राचीन भित्तिचित्रों (Murals) की पहचान की गई है।

इस अद्भुत खोज ने तेलंगाना की प्राचीन मंदिर कला परंपरा के एक ऐसे अध्याय की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया है, जिसका इतिहास की पुस्तकों में अपेक्षाकृत कम दस्तावेजीकरण हुआ था।

वहीं इस खोज से यह भी सिद्ध होता है कि हमारी प्राचीन मंदिर स्थापत्य कला केवल पत्थरों को गढ़ने तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे भित्तिचित्रों के माध्यम से इतिहास और संस्कृति को संजोने के जीवंत केंद्र थे।

इतिहासवेत्ताओं की टोली ने उजागर किया छत पर छुपा रहस्य

बता दें कि इस अमूल्य धरोहर को सामने लाने का श्रेय इतिहास और संस्कृति के संरक्षण में जुटे संगठन ‘कोथ तेलंगाना चरित्र बृंदम’ (KTCB) को जाता है। इस संगठन के सदस्य सिरीपुरम नरेंद्र ने ही सबसे पहले मण्डप की छत पर बने इन चित्रों को ध्यान से देखा और उनकी ऐतिहासिकता को पहचाना।

इसके तुरंत बाद, संगठन के संयोजक श्रीरामोजी हरगोपाल के नेतृत्व में एक विशेषज्ञ टीम, जिसमें मुल्लाकला रवि कुमार, कुंडे गणेश और पंगा मेघराज शामिल थे, ने मंदिर परिसर का विस्तृत जमीनी अध्ययन (Field Study) किया और इन दुर्लभ भित्तिचित्रों का दस्तावेजीकरण (Documentation) किया।

16वीं शताब्दी का इतिहास: यक्षगान परंपरा और ‘विश्वब्रह्म’ की भव्य झांकी

केटीसीबी (KTCB) के संयोजक श्रीरामोजी हरगोपाल ने इस कलाकृति के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि ये भित्तिचित्र केवल कलात्मक नहीं हैं, बल्कि ये एक पूरी कथा को बयां करते हैं।

उन्होंने कहा-

“ये मूल रूप से विवरणात्मक या कथात्मक चित्र (Narrative Paintings) हैं, जो दक्षिण भारत की समृद्ध ‘यक्षगान प्रदर्शन परंपरा’ के दृश्यों को दर्शाते हैं। इन चित्रों में से एक अत्यंत भव्य दृश्य में ‘विश्वब्रह्म’ को एक पवित्र शोभायात्रा (Procession) में ले जाते हुए दिखाया गया है।

इस चित्र की प्रामाणिकता इस बात से भी सिद्ध होती है कि आकृति के ठीक ऊपर तेलुगु लिपि में स्पष्ट रूप से ‘विश्वब्रह्म’ का नाम अंकित है।”

वहीं विशेषज्ञ टीमकी माने तो- इन भित्तिचित्रों में पाए गए शिलालेखों और भाषा की बनावट ने ही इसकी आयु का सटीक अनुमान लगाने में बड़ी सहायता की है।

हरगोपाल ने बताया कि चित्रों में प्रयुक्त तेलुगु लिपि की शैली और बनावट 16वीं या 17वीं शताब्दी (विजयनगर/उत्तर-विजयनगर काल) की ओर संकेत करती है।

अभी भी अक्षुण्ण हैं प्राचीन नाम: वैज्ञानिक विधि से खुलेंगे और कई राज

सदियों का समय बीत जाने और उचित रखरखाव के अभाव के बावजूद, इन भित्तिचित्रों में कई प्राचीन नाम और लेबल आज भी स्पष्ट रूप से पढ़े जा सकते हैं, जो इस प्रकार हैं-

  • इराया (Eraya): चित्रों के पास अंकित एक प्राचीन नाम।
  • शरभ (Sharabha): सनातन परंपरा के विशिष्ट प्रतीकों से जुड़ा संदर्भ।
  • संगारोलू (Sangarolu): तत्कालीन समाज या पात्रों को रेखांकित करता एक और ऐतिहासिक शब्द।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि इन भित्तिचित्रों का वैज्ञानिक और रासायनिक उपचार (Chemical Treatment) कराया जाए, तो धुंधले पड़ चुके कई अन्य नाम, शिलालेख और छिपे हुए ऐतिहासिक विवरण पूरी स्पष्टता के साथ निखरकर सामने आ सकते हैं।

तेलंगाना के अन्य मंदिरों में भी रहा है भित्तिचित्रों का वैभव

शोधकर्ताओं के अनुसार, प्राचीन काल में मंदिर भित्तिचित्रों की यह कला इस पूरे क्षेत्र में व्यापक रूप से फैली हुई थी, लेकिन समय की मार और उपेक्षा के कारण इनमें से अधिकांश नष्ट हो गए। तेलंगाना के जिन अन्य स्थानों पर ऐसी कला के प्रमाण मिलते हैं, उनका विवरण निम्नलिखित है:

मंदिर / ऐतिहासिक स्थलभित्तिचित्रों की स्थिति और संदर्भ
पिल्लालामर्री और घनपुर (कोटा गुल्लू)यहाँ के मंदिरों की पत्थर की स्लैब वाली छतों पर भी इसी प्रकार के प्राचीन चित्र पहले रिपोर्ट किए जा चुके हैं।
राचाकोंडा रामालयमऐतिहासिक संदर्भों में यहाँ भी प्राचीन भित्तिचित्रों की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है।
भुवनागिरी का ब्राह्मणवाड़ा शिव मंदिरयह मंदिर भी इस क्षेत्र की समृद्ध चित्रकला परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

संरक्षण की उठी मांग

केटीसीबी (KTCB) की टीम ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह अनुमान लगाना कठिन है कि तेलंगाना के मंदिरों में ऐसे कितने भित्तिचित्र मौजूद थे और हम उनमें से कितने हमेशा के लिए खो चुके हैं। अब जो भी बचे हुए उदाहरण हैं, उनका तुरंत प्रलेखन और संरक्षण करना हमारी सांस्कृतिक संप्रभुता के लिए आवश्यक है।

शोधकर्ताओं सहित अन्य प्रबुद्ध जनों ने विरासत विभाग (Department of Heritage) से इस स्थल पर तत्काल प्रभावी और वैज्ञानिक संरक्षण उपाय शुरू करने का पुरजोर आग्रह किया है।

उनका कहना है कि इन अमूल्य चित्रों का वैज्ञानिक संरक्षण न केवल हमारी कलाकृति की रक्षा करेगा, बल्कि यह तेलंगाना के सांस्कृतिक, सामाजिक और कलात्मक इतिहास के गहरे अध्ययन में भी मील का पत्थर साबित होगा।

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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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