विकसित भारत के लिए कठोर बालश्रम से मुक्त समाज की अनिवार्यता डॉ. निवेदिता शर्मा
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विकसित भारत के लिए कठोर बालश्रम से मुक्त समाज की अनिवार्यता डॉ. निवेदिता शर्मा

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने वर्ष 2002 में इस दिवस की शुरुआत की थी, ताकि बाल श्रम जैसी वैश्विक समस्या के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके और दुनिया को बाल श्रम मुक्त बनाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जा सकें।

Written byडॉ. निवेदिता शर्माडॉ. निवेदिता शर्मा — edited by Mahak Singh
Jun 12, 2026, 12:47 pm IST
in भारत
विश्व बाल श्रम विरोध दिवस

विश्व बाल श्रम विरोध दिवस

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि उसके बच्चों के वर्तमान और भविष्य से मापी जाती है, इसलिए ही बच्चे राष्ट्र की सबसे मूल्यवान पूंजी होते हैं। यदि उनके हाथों में किताबों के स्थान पर औजार, मशीनें और श्रम का बोझ आ जाए, तब फिर यह देश के भविष्य पर गंभीर आघात है। अत: विकसित भारत का सपना तभी साकार हो सकता है, जब प्रत्येक बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक बचपन का अधिकार मिले। इसी उद्देश्य को लेकर प्रतिवर्ष 12 जून को विश्व बाल श्रम विरोध दिवस मनाया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने वर्ष 2002 में इस दिवस की शुरुआत की थी, ताकि बाल श्रम जैसी वैश्विक समस्या के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके और दुनिया को बाल श्रम मुक्त बनाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जा सकें। वैसे भारत ने पिछले वर्षों में बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है, फिर भी यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। जनगणना 2011 के अनुसार देश में लगभग 1.01 करोड़ बच्चे (5 से 14 वर्ष आयु वर्ग) किसी न किसी प्रकार के श्रम में लगे हुए थे। इनमें लगभग 56 लाख लड़के और 45 लाख लड़कियाँ शामिल थीं।

कोविड-19 महामारी के बाद अनेक परिवारों की आय प्रभावित हुई, जिसके कारण लाखों बच्चों की शिक्षा बाधित हुई और बाल श्रम का जोखिम बढ़ा। वैश्विक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के नवीनतम अनुमानों के अनुसार पिछले वर्ष 2025 में लगभग 13.8 करोड़ बच्चे बाल श्रम में संलग्न हैं, इतने ही लगभग इस वक्‍त होंगे, जिनमें से करीब 5.4 करोड़ बच्चे खतरनाक कार्यों में लगे हुए हैं। यह आँकड़ा स्पष्ट करता है कि समस्या बड़ी है और इसके समाधान के लिए सतत प्रयास आवश्यक हैं।

बच्चों के हाथों में किताबें हों, मजदूरी नहीं

भारत में बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 में वर्ष 2016 के संशोधन के बाद 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी व्यवसाय, उद्योग या सेवा में नियोजित करना प्रतिबंधित है। साथ ही 14 से 18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक उद्योगों और कार्यों में लगाना भी गैरकानूनी है। जैसे कि खनन, पटाखा उद्योग, विस्फोटक पदार्थों का निर्माण, रासायनिक कारखाने तथा भारी मशीनों से जुड़े कार्य खतरनाक श्रेणी में आते हैं। कानून के अनुसार बाल श्रम कराने पर छह माह से दो वर्ष तक कारावास और 20 हजार से 50 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। पुनरावृत्ति की स्थिति में सजा तीन वर्ष तक हो सकती है और दोष सिद्ध होने पर होती भी है, किंतु फिर भी व्‍यवहार में देखा यह जा रहा है कि बाल श्रम में कोई कमी नहीं आ रही। समाज में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि गरीब परिवारों के बच्चे काम करेंगे तो घर की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, परंतु इससे जुड़ा सही तथ्‍य यह है और फिर अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि यह सोच अल्पकालिक लाभ देती है, जबकि दीर्घकाल में गरीबी को और गहरा करती है।

शिक्षा ही गरीबी से मुक्ति का रास्ता

जी. वी. जोशी, बिबेक देबरॉय, अरविंद पनगढ़िया, सुरजीत एस. भल्ला, संजीव सान्याल और वी. अनंत नागेश्वरन जैसे अनेक भारतीय अर्थशास्त्रियों ने इस तरह की सोच को “Poverty Trap” अर्थात् गरीबी का दुष्चक्र कहा है। जब बच्चा शिक्षा से वंचित हो जाता है, तो उसके पास भविष्य में बेहतर रोजगार के अवसर नहीं बचते। वह कम आय वाले कार्यों तक सीमित रह जाता है और अगली पीढ़ी भी उसी गरीबी के चक्र में फँस जाती है, इसलिए सभी को यह जानलेना चाहिए कि शिक्षा ही गरीबी उन्मूलन का सबसे प्रभावी और स्थायी साधन है। फिर यह भी देखा गया है कि बाल श्रम का प्रभाव आर्थिक होने के साथ ही शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास पर भी पड़ता है। शैक्षणिक दृष्टि से बाल श्रमिक बच्चों की स्कूल उपस्थिति प्रभावित होती है, वे पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं और उनकी सीखने की क्षमता कमजोर हो जाती है। परिणामस्वरूप भविष्य के रोजगार अवसर सीमित हो जाते हैं।

बचपन पर भारी मजदूरी

शारीरिक रूप से ऐसे बच्चों को कुपोषण, दुर्घटनाओं, फेफड़ों और आँखों की बीमारियों, हड्डियों की कमजोरी तथा स्थायी विकलांगता का खतरा बना रहता है। मानसिक स्तर पर तनाव, अवसाद, भय, आत्मविश्वास की कमी तथा शोषण का जोखिम बढ़ जाता है। कई बच्चे हिंसा और दुर्व्यवहार का भी शिकार बनते हैं। इस प्रकार बाल श्रम बच्चों के समग्र व्यक्तित्व विकास को बाधित करता है। अब यहां एक बात ओर ध्‍यान देने की है, वह यह कि बाल श्रम की चर्चा में अक्सर बालिकाओं की स्थिति छिपी रह जाती है। बालिकाएँ प्रायः घरेलू नौकरानी, छोटे बच्चों की देखभाल, खाना बनाने और सफाई जैसे कार्यों में लगी रहती हैं। यह श्रम अक्सर आँकड़ों में दर्ज नहीं हो पाता, इसलिए इसे “अदृश्य श्रम” कहा जाता है। इसके कारण उनकी शिक्षा जल्दी छूट जाती है, शोषण और हिंसा का खतरा बढ़ता है तथा बाल विवाह की संभावना भी अधिक हो जाती है, इसलिए बालिका श्रम की पहचान और रोकथाम को विशेष प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।

बाल श्रम रोकना सबकी जिम्मेदारी

यहां ध्‍यान देने योग्‍य यह भी है कि बाल श्रम सिर्फ सरकारी कार्रवाई से समाप्त नहीं होगा। इसमें समाज, शिक्षकों, अभिभावकों और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। शिक्षक विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की पहचान कर सकते हैं और अभिभावकों को जागरूक बना सकते हैं। समाज स्थानीय निगरानी समितियाँ बनाकर बाल श्रम को सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बना सकता है। आम नागरिक बाल श्रमिकों को रोजगार देने वाले प्रतिष्ठानों का बहिष्कार कर सकते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर शिकायत दर्ज करा सकते हैं। यदि कहीं बाल श्रम दिखाई दे, तो तुरंत चाइल्ड हेल्पलाइन 1098, स्थानीय पुलिस, श्रम विभाग या जिला बाल संरक्षण इकाई को सूचना देनी चाहिए। स्वयं हस्तक्षेप करने के बजाय संबंधित एजेंसियों को कार्रवाई का अवसर देना अधिक प्रभावी और सुरक्षित होता है। देश के कई राज्यों में “बाल मित्र गाँव” अथवा “चाइल्ड लेबर फ्री जोन” की अवधारणा सफल रही है। इस मॉडल के अंतर्गत सभी बच्चों का विद्यालयों में नामांकन सुनिश्चित किया जाता है, ग्राम स्तर पर निगरानी समितियाँ बनाई जाती हैं, बाल पंचायतों का गठन किया जाता है तथा बाल विवाह और बाल श्रम पर सामुदायिक स्तर पर रोक लगाई जाती है।

एक तरह से यदि देखें तो इन सभी प्रयासों से विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ी है और अनेक क्षेत्रों में बाल श्रम में उल्लेखनीय कमी आई है। यह मॉडल बताता है कि समुदाय की भागीदारी से स्थायी परिवर्तन संभव है। दूसरी ओर बाल श्रम समाप्त करने में उपभोक्ताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। हमें ऐसे उत्पादों और कंपनियों को प्राथमिकता देनी चाहिए जो बाल श्रम मुक्त उत्पादन का दावा करती हैं। सस्ते उत्पादों के पीछे छिपे संभावित शोषण पर प्रश्न उठाना चाहिए और जिम्मेदार कंपनियों का समर्थन करना चाहिए। जब बाजार बाल श्रम से बने उत्पादों को अस्वीकार करेगा, तब उद्योगों पर भी सकारात्मक दबाव बनेगा। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन  भी मानता है कि जिम्मेदार उपभोक्ता बाल श्रम उन्मूलन के महत्वपूर्ण साझेदार हैं। इस तरह से समग्र रूप से कहें तो बाल श्रम कानून का विषय होने के साथ ही बच्चों के अधिकार, मानव गरिमा और राष्ट्रीय विकास का प्रश्न है। ऐसे में विकसित भारत की कल्पना तब तक अधूरी रहेगी, जब तक देश का प्रत्येक बच्चा विद्यालय में नहीं होगा और सुरक्षित बचपन नहीं जी पाएगा। इसलिए वर्तमान की आवश्यकता इस दिशा में सामूहिक सामाजिक संकल्प लेने की है।

शिक्षा से बनेगा विकसित भारत

आइए, विश्व बाल श्रम विरोध दिवस के अवसर पर हम यह संकल्प लें कि किसी भी बच्चे के हाथ में किताब की जगह औजार नहीं होने देंगे। क्योंकि जब हर बच्चा शिक्षित होगा, तभी भारत वास्तविक अर्थों में विकसित, समृद्ध और मानवीय राष्ट्र बन सकेगा। अत: “बचपन बचाइए, बाल श्रम मिटाइए; शिक्षा बढ़ाइए, विकसित भारत बनाइए।”

Topics: child educationchild labourerchild labour lawsChild and Adolescent Labour ActChild Rightschild labourWorld Day Against Child Labourविश्व बाल श्रम विरोध दिवसabolition of child labour
डॉ. निवेदिता शर्मा
डॉ. निवेदिता शर्मा
(लेखिका मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्‍य रही हैं) [Read more]
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