राजसमंद (हल्दीघाटी) । भारतीय इतिहास में जब भी शौर्य, पराक्रम और स्वामीभक्ति की बात होती है, तो वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के साथ उनके प्रिय और वीर अश्व ‘चेतक’ (Chetak) का नाम अजर-अमर रूप से लिया जाता है। चेतक ने अपने स्वामी की रक्षा के लिए जिस अद्वितीय बलिदान का परिचय दिया, वह आज भी हर भारतीय के लिए एक महान प्रेरणास्रोत है।
मानसिंह के हाथी की सूंड में लगी तलवार से कट गया था पैर
हल्दीघाटी के ऐतिहासिक युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने मुगल सेनापति मानसिंह पर सीधा आक्रमण किया, तो उस भीषण संघर्ष के दौरान मानसिंह के हाथी की सूण्ड में बंधी तलवार से चेतक का एक पाँव कट गया था।
पैर कटने और बुरी तरह घायल होने के बावजूद, स्वामी भक्त चेतक ने महाराणा प्रताप का एक विश्वस्त साथी के समान तब तक साथ नहीं छोड़ा, जब तक कि उसने अपने स्वामी को सुरक्षित स्थान तक नहीं पहुँचा दिया।
25 फीट चौड़े नाले को एक छलांग में किया पार, खोड़ी आमली में त्यागे प्राण
हल्दीघाटी से लगभग दो मील दूर बलीचा गाँव के निकट मुगलों की सेना प्रताप का पीछा कर रही थी। रास्ते में एक 20 से 25 फीट चौड़ा उफनता हुआ बरसाती नाला आ गया।
तीन पैरों पर दौड़ रहे घायल चेतक ने अपनी अंतिम शक्ति बटोरी और उस 20 से 25 फीट चौड़े बहते बरसाती नाले को एक ही छलांग में पार कर लिया। इस अद्भुत छलांग के बाद, नाले के पार खोड़ी आमली के निकट चेतक ने हमेशा के लिए अपने प्राण त्याग दिए।
आज भी उस महान अश्व की स्मृति बलीचा गाँव में चेतक समाधि (Chetak Smarak) के रूप में चिरस्थायी है, जहां लोग श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।
स्मारक की सेवा के लिए महाराणा प्रताप ने दिया था ‘ताम्रपत्र’
चेतक के बलिदान के बाद, महाराणा प्रताप ने उसकी स्मृति को संजोए रखने का विशेष प्रबंध किया। चेतक स्मारक व वहां स्थित शिवालय में नियमित पूजा-अर्चना और सार-संभाल के लिए महाराणा प्रताप ने बलीचा गाँव के श्रीमाली ब्राह्मण श्रीधर जी व्यास को हमेशा के लिए भूमि दान रूप में दे दी थी।
इतिहास की सत्यता और इस दान का प्रमाण आज भी सुरक्षित है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्तमान में कमलनयन जी श्रीमाली के परिवार के पास महाराणा प्रताप द्वारा दिया गया यह ऐतिहासिक ताम्रपत्र (Tamrapatra) आज भी उपलब्ध है।











