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पश्चिम बंगाल : सत्ता गई, पार्टी टूटी

जब दंभ बढ़ जाए, सत्ता अपनी बपौती लगने लगे, व्यक्ति यह मान बैठे कि उसे कोई हिला नहीं सकता, तब समझ लेना चाहिए कि आप पतन की ओर बढ़ रहे हैं। यही नियम है। तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल की सत्ता से तो गई ही, साथ ही दो फाड़ भी हो गई। ममता बनर्जी अब तृणमूल की नेता नहीं रहीं

Written byआदित्य भारद्वाजआदित्य भारद्वाज
Jun 10, 2026, 03:46 pm IST
in पश्चिम बंगाल
अपने साथी विधायकों के साथ कोलकाता में प्रेस कांफ्रेंस करते हुए ऋतब्रत बनर्जी (मध्य में)

अपने साथी विधायकों के साथ कोलकाता में प्रेस कांफ्रेंस करते हुए ऋतब्रत बनर्जी (मध्य में)

सत्ता का मद अक्सर विवेक को निगल जाता है। सलाहकार चापलूस बन जाते हैं, आलोचना दुश्मनी लगने लगती है और जनता का संदेश सुनाई देना बंद हो जाता है। फिर वही होता है, जो हर अहंकारी के साथ होता आया है। किले बाहर से नहीं, भीतर से दरकने लगते हैं। साथी साथ छोड़ने लगते हैं, भरोसे की दीवारों में दरारें पड़ने लगती हैं और कभी अजेय दिखने वाला कुनबा बिखरने लगता है। राजनीति में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है, जब जनविश्वास डगमगाता है, तब सबसे मजबूत सिंहासन भी टिक नहीं पाता। सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन अहंकार अक्सर यह भूल करवा देता है। यह भूल ममता बनर्जी से भी हुई। लगातार तीन बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री रहीं ममता बनर्जी की बनाई तृणमूल कांग्रेस भी उनके हाथ से निकल गई है।

पहले बहुमत गया, अब नेतृत्व

दरअसल विधानसभा चुनावों में पराजय के बाद ममता बनर्जी ने सोवनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाया था। चुनावों में तृणमूल के 80 विधायक निर्वाचित हुए थे। चट्टोपाध्याय को लेकर विधायक एकमत नहीं थे। गत 1 जून को ऋ तब्रत बनर्जी पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। इसके बाद बागी खेमे के 60 तृणमूल विधायकों ने
ऋ तब्रत बनर्जी के नेतृत्व में विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस को समर्थन पत्र सौंप दिया। अब ऋ तब्रत बनर्जी नेता प्रतिपक्ष के रूप में कितने समय तक टिकेंगे, यह आने वाला समय बताएगा।

उनकी राजनीतिक यात्रा भी दल-बदल और विवादों से भरी रही है। वे कभी सीपीआई(एम) के युवा चेहरे और राज्यसभा सांसद थे, लेकिन 2017 में अनुशासनहीनता, कथित पार्टी-विरोधी गतिविधियों और नेतृत्व से टकराव के आरोपों के बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। बाद में वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए और अब उसी दल में बगावत के केंद्र में खड़े हैं। पश्चिम बंगाल के इतिहास पर नजर डालें तो वहां पहले वामपंथी शासन रहा और फिर तृणमूल कांग्रेस का दौर आया। सत्ता बदली, लेकिन हालात लगातार बिगड़ते गए। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष के रूप में ऋ तब्रत बनर्जी कितने प्रभावी साबित होते हैं, इसका जवाब भविष्य ही देगा।

इस मामले में ममता बनर्जी कानूनी विकल्प अपनाने की बात तो कह रही हैं, लेकिन इससे कुछ फायदा नहीं होने वाला। दरअसल, दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के तहत यदि किसी राजनीतिक दल के विधायक या सांसदों में से दो-तिहाई (2/3) या उससे अधिक सदस्य अलग होकर किसी अन्य दल में विलय का फैसला करते हैं, तो उन्हें सामान्यतः दलबदल के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाता। यहां तो विलय जैसी कोई बात भी नहीं है, यहां सिर्फ विधायकों ने अपना नेता पार्टी के ही एक विधायक को चुना है। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे प्रकरण में भी शिंदे गुट ने यही तर्क दिया था कि उनके साथ शिवसेना के दो-तिहाई से अधिक विधायक हैं। इसी आधार पर उनकी कानूनी स्थिति मजबूत हुई और बाद की राजनीतिक एवं चुनावी प्रक्रियाओं में उन्हें इसका लाभ मिला।

बता दें कि उद्धव ठाकरे ने 2022 में वही गलती की थी, जो ममता बनर्जी ने की। वह खुद को सबसे ऊपर समझने लगे थे। उस समय शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे ने लगभग 40 विधायकों के साथ विद्रोह कर दिया। शिंदे गुट का दावा था कि वे बालासाहेब ठाकरे की मूल विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं और शिवसेना के अधिकांश विधायक उनके साथ हैं। नतीजतन उद्धव को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद लड़ाई केवल सरकार की नहीं, बल्कि ‘असली शिवसेना’ की पहचान की बन गई। दोनों गुटों ने पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा किया। बाद में चुनाव आयोग ने विधायकों और संगठन में बहुमत के आधार पर एकनाथ शिंदे गुट को ही वास्तविक शिवसेना माना और पार्टी का मूल नाम तथा ‘तीर-कमान’ चुनाव चिह्न उसे सौंप दिया।

ममता बनर्जी अपनी हार को पचा नहीं पा रहीं। वह लगातार विवादास्पद बयान दे रही हैं। चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने हार स्वीकार करने के बजाय चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए और परिणामों को साजिश का नतीजा बताया। यहां तक कि 5 मई 2026 को उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि उनकी पार्टी जनता के जनादेश से नहीं, बल्कि साजिश के कारण हारी है और इसलिए उनके इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता।

उन्होंने मतगणना में गड़बड़ी, निर्वाचन आयोग की भूमिका और कई सीटों पर जनादेश लूटे जाने के आरोप भी लगाए। परिणामों के बाद उन्होंने अपना रुख नहीं बदला और तृणमूल विधायकों की बैठक में कथित तौर पर कहा कि चुनाव को लूटा गया है, पार्टी इस मामले को न्यायालय में ले जाएगी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वह इस्तीफा नहीं देंगी। चुनाव संपन्न हो चुके थे और नई विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू होनी थी। ममता बनर्जी ने इस्तीफा नहीं दिया, तो राज्यपाल आर.एन. रवि ने संविधान के अनुच्छेद 174(2)(बी) के तहत विधानसभा भंग करने का आदेश जारी कर दिया और नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हो गया।

ममता बनर्जी की इसी मानसिकता की झलक चुनाव प्रचार के दौरान भी दिखाई दी थी, जब तृणमूल नेतृत्व आत्मविश्वास और आक्रामकता के चरम पर था। उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी विपक्ष को खुली चुनौतियां दे रहे थे। चुनाव परिणामों से पहले उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का वह बयान याद कीजिए, जब उन्होंने कहा था कि चुनावों के बाद अमित शाह एक महीना पश्चिम बंगाल में रहकर दिखाएं। यह घमंड नहीं तो और क्या था?

घर से उठी चुनौती

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक कंचन गुप्ता कहते हैं, “तृणमूल कांग्रेस का न संरचनात्मक नेतृत्व था और न ही कोई विचारधारा थी। लोग तृणमूल में धंधा करने के लिए आते थे। हर धंधे का हिस्सा ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी तक जाता था। सिंडिकेट राज था, ऐसे लोगों को शीर्ष नेतृत्व का प्रश्रय मिलता था। अब तृणमूल की सर्वेसर्वा रहीं ममता बनर्जी ही चुनाव हार गईं, तो पार्टी का टूटना लगभग तय ही था। अभिषेक बनर्जी को लेकर पहले से ही पार्टी में असंतोष था। पार्टी के कई नेता उन्हें ही पसंद नहीं करते थे।”

चुनाव परिणामों के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस में असंतोष पनपने लगा था। उसके नेता ही पार्टी पर सवाल उठाने लगे थे। यहां तक कि ममता बनर्जी के छोटे भाई ने भी उन पर आरोप लगाया है कि वे पिछले 31 साल से पार्टी का झंडा उठाए हुए हैं, मगर बीते 13 साल से उन्हें किसी भी तरह की बड़ी जिम्मेदारी से दूर रखा गया। मई में राज्य भर की विभिन्न नगरपालिकाओं में 100 से अधिक तृणमूल पार्षदों ने पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए इस्तीफा दे दिया था। हाल ही में पार्टी के बड़े नेताओं ने भी तृणमूल कांग्रेस में नेतृत्व, भ्रष्टाचार आदि का आरोप लगाकर इस्तीफे दिए हैं। उदाहरण के तौर पर गत 27 मई 2026 को तृणमूल सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने अपने सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा देते हुए पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे।

उन्होंने हार के लिए भ्रष्टाचार को प्रमुख कारण बताया था। इसके अगले दिन 28 मई 2026 को पूर्व राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. शंतनु सेन ने पद छोड़ दिया। अपने इस्तीफे में उन्होंने आरजी कर मामले, कथित भ्रष्टाचार, नौकरी घोटाले और अन्य विवादों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह अब पार्टी के अनैतिक कृत्यों का बचाव नहीं कर सकते। सत्ता का भ्रम नहीं पालना चाहिए। लोकतंत्र में यह स्थायी नहीं होती। कोई भी नेता, कोई भी दल जनादेश से बड़ा नहीं होता। तृणमूल की सबसे बड़ी चुनौती अपने ही घर में पैदा हुआ अविश्वास बन गया। जब कोई स्वयं को संगठन और जनता से बड़ा समझने लगता है, तब पतन की शुरुआत हो चुकी होती है। यही तृणमूल की मौजूदा स्थिति है।

 

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