नई दिल्ली। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना (ABISY) के केन्द्रीय कार्यालय में भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रान्त एवं माधव संस्कृति न्यास के संयुक्त तत्वावधान में “नामूलं लिख्यते किञ्चित” व्याख्यानमाला का भव्य आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में “भारत की विविध योग परंपरा का इतिहास” विषय पर विशिष्ट व्याख्यान प्रस्तुत किया गया, जिसमें देश के जाने-माने विचारकों और इतिहासकारों ने अपने विचार साझा किए।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता से आधुनिक योग दिवस तक का सफर
व्याख्यानमाला के मुख्य वक्ता के रूप में आचार्य (डॉ.) रजनीश कुमार शुक्ल जी (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा) ने भारत में योग के उद्भव और विकास पर विस्तार से प्रकाश डाला।
- उन्होंने बताया कि भारत की योग परंपरा का इतिहास अत्यंत प्राचीन और विविध है। इसकी जड़ें सिंधु-सरस्वती सभ्यता (2700 ईसा पूर्व) तक जाती हैं।
- समय के साथ यह वेदों, उपनिषदों, महाभारत, भगवद्गीता, पतंजलि योगसूत्र, हठयोग और भक्ति योग से होते हुए आधुनिक अंतरराष्ट्रीय योग दिवस तक विकसित हुई है।
- आज योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का एक सशक्त वैश्विक प्रतीक बन चुका है।
“दर्शन विचार है, और योग उसे जीवन में उतारने की साधना”
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. बालमुकुन्द पाण्डेय जी (राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना) ने दर्शन और योग के गहरे संबंध को अत्यंत सहज रूप में समझाया।
“दर्शन का क्रिया रूप ही योग है; योग उस दर्शन का व्यावहारिक रूप है। जहाँ दर्शन विचार देता है, वहीं योग उसे जीवन में उतारने की साधना है। दर्शन कहता है कि आत्मा शुद्ध है और परमात्मा से जुड़ सकती है। योग इस सत्य को अनुभव कराने का साधन है – ध्यान, प्राणायाम, आसन और आत्मनियंत्रण के माध्यम से। इसलिए कहा जाता है कि दर्शन हमें मार्ग दिखाता है, और योग उस मार्ग पर चलने की साधना है।”
योग केवल व्यायाम नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का माध्यम है
व्याख्यान की अध्यक्षता कर रहे पद्मश्री प्रो. बुद्ध रश्मि मणि जी (सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद, इतिहासकार, कला समीक्षक एवं राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, ABISY) ने योग के आध्यात्मिक और सामाजिक पक्ष पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि योग का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की आत्मा को परमात्मा से जोड़ना है। आसन और प्राणायाम के माध्यम से शरीर और मन में एक सटीक संतुलन स्थापित होता है।
“योग केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी माध्यम है। इसलिए योग को केवल व्यायाम या शारीरिक आसन तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसका गहरा अर्थ है – जुड़ाव और एकत्व। योग हमें स्वयं से, समाज से और परम सत्य से जोड़ता है।”
मंगलाचरण और सफल संचालन
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. पीयूष मिश्र के सुमधुर मंगलाचरण के साथ हुआ। इस गरिमामयी व्याख्यानमाला का सफल और सुव्यवस्थित संचालन डॉ. सौरभ कुमार मिश्र (उप निदेशक, ICHR एवं राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख, ABISY) ने किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. संजीव कुमार मिश्र जी (स्नातकोत्तर शिक्षक एवं कार्यकारिणी सदस्य, दिल्ली प्रान्त) ने सभी उपस्थित विद्वानों, वक्ताओं और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।











