नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एच-1बी वीजा नीति को लेकर बड़ा झटका लगा है। एक संघीय अदालत ने इसे गैरकानूनी करार देते हुए निरस्त कर दिया है। न्यायाधीश लियो सोरोकिन ने अपने फैसले में कहा कि संघीय सरकार के पास इस प्रकार का शुल्क लगाने का स्पष्ट कानूनी अधिकार नहीं था। यह निर्णय कानून की सीमाओं से बाहर माना जाएगा। यह फैसला बोस्टन की संघीय कोर्ट ने सुनाया है। यह मामला 20 डेमोक्रेटिक राज्यों के अटॉर्नी जनरल द्वारा दायर मुकदमे से जुड़ा था।
इन राज्यों ने ट्रंप प्रशासन के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें सितंबर में नए एच-1बी वीजा पर 1 लाख डॉलर की भारी फीस लगाने की घोषणा की गई थी। ट्रंप के इस फैसले के लागू होने पर अमेरिका में काम करने के इच्छुक उच्च कौशल वाले विदेशी पेशेवरों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों पर बड़ा आर्थिक बोझ पड़ रहा था।
भारतीय पेशेवरों को राहत
H-1B वीजा पर अमेरिकी कोर्ट के इस फैसले से भारतीय पेशेवरों को राहत मिल सकती है। अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर और अन्य तकनीकी विशेषज्ञ H-1B वीजा के जरिए काम करते हैं। कोर्ट के इस फैसले को आईटी कंपनियों और अमेरिका में काम करने वाले भारतीय दोनों के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है।
एच-1बी (H-1B) वीजा अमेरिका का एक प्रमुख कार्य वीजा कार्यक्रम है। इसके तहत अमेरिका में अन्य देशों के विशेषज्ञों को तकनीक, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा और अन्य पेशेवर क्षेत्रों में काम की अनुमति दी जाती है। ट्रंप ने इस पर भारी शुल्क लगा दिया था जिससे अमेरिका में अन्य देशों के काम करने वाले प्रभावित हो रही थी और वहां की आईटी कंपनियां भी इसके खिलाफ थी। ट्रंप के इस फैसले से अमेरिकी कंपनियों के लिए कुशल कर्मचारियों को नियुक्त करना महंगा हो रहा था। अब कोर्ट ने ट्रंप के इस फैसले को निरस्त कर दिया है।











