डफली गैंग, चिरकाल के आन्दोलनजीवी कॉकरोच और ‘आज़ादी’ का शोर: बतौर Gen-Z मैंने CJP Protest को भटकते देखा
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होम भारत

डफली गैंग, चिरकाल के आन्दोलनजीवी कॉकरोच और ‘आज़ादी’ का शोर: बतौर Gen-Z मैंने CJP Protest को भटकते देखा

मैं जंतर-मंतर पहुँचा था। एक ऐसे युवा के रूप में, जो वर्षों से पेपर लीक, भर्ती घोटालों, परीक्षा माफियाओं और युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को देखता आया है। मुझे लगा था कि Gen-Z की राजनीति के स्वयंभू ठेकेदार और सोशल मीडिया के क्रांतिकारी नायक कम से कम इस एक मुद्दे को वैचारिक प्रदूषण से दूर रखेंगे।

Written byहिमांशु मिश्राहिमांशु मिश्रा
Jun 8, 2026, 11:45 am IST
in भारत, विश्लेषण, दिल्ली

6 जून 2026 को मैं जंतर-मंतर पहुँचा था। एक ऐसे युवा के रूप में, जो वर्षों से पेपर लीक, भर्ती घोटालों, परीक्षा माफिया और युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को देखता आया है। मुझे लगा था कि Gen-Z की राजनीति के स्वयंभू ठेकेदार और सोशल मीडिया के क्रांतिकारी नायक कम से कम इस एक मुद्दे को वैचारिक प्रदूषण से दूर रखेंगे। मुझे लगा था कि चाहे उन स्वयंभू ठेकेदारों का अतीत किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा से जुड़ा रहा हो, लेकिन करोड़ों छात्रों के भविष्य के नाम पर बुलाए गए इस आंदोलन में कम से कम छात्र हित तो सर्वोपरि होगा। मुझे लगा था कि यहाँ उन लाखों युवाओं की आवाज़ सुनाई देगी जिनके सपने हर साल किसी न किसी घोटाले और पेपर लीक की भेंट चढ़ जाते हैं। लेकिन कुछ ही घंटों में मुझे एहसास हो गया कि मैं छात्रों के आंदोलन में नहीं, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक प्रयोगशाला में खड़ा हूँ जहाँ छात्रों की पीड़ा केवल कच्चा माल थी।

जंतर मंतर के प्रांगण में छात्र थे, भीड़ छात्रों की थी, मुद्दे छात्रों के थे, लेकिन नारे छात्रों के नहीं थे…. पेपर लीक कहाँ गायब हो गया? भर्ती घोटाले कहाँ गायब हो गए? शिक्षा सुधार की चर्चा कहाँ चली गई? और उनकी जगह अचानक “आज़ादी… आज़ादी…”, “मोदी-शाह चोर है” और “RSS मुर्दाबाद…”के वही पुराने विभाजनकारी, घृणा-प्रेरित और राष्ट्रबोध को चुनौती देने वाले नारे क्यों गूंजने लगे?

एक सामान्य भारतीय छात्र यह प्रश्न पूछने का अधिकार रखता है कि जब मुद्दा NEET, CBSE, भर्ती परीक्षाओं और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का था, तब आंदोलन का केंद्र “आज़ादी” जैसे राष्ट्रविरोधी नारों को क्यों बना दिया गया?

यहीं मुझे इतिहासकार Crane Brinton की प्रसिद्ध पुस्तक The Anatomy of Revolution याद आई। ब्रिंटन बताते हैं कि लगभग हर बड़ा जन-आंदोलन शुरुआत में वास्तविक शिकायतों और जनभावनाओं से जन्म लेता है। लेकिन धीरे-धीरे उस पर ऐसे वैचारिक समूहों का कब्ज़ा होने लगता है जिनका उद्देश्य मूल समस्या का समाधान नहीं, बल्कि आंदोलन को अपने राजनीतिक एजेंडे का वाहन बनाना होता है। परिणाम यह होता है कि जनता का मुद्दा पीछे छूट जाता है और कट्टरपंथी राजनीति मंच पर आ बैठती है। जंतर-मंतर पर खड़े होकर मुझे यही दृश्य दिखाई दिया।

करोड़ों छात्रों की पीड़ा से जन्मे आंदोलन में कुछ परिचित चेहरे दिखाई देने लगे। वही स्थायी आन्दोलनजीवी। वही पेशेवर विरोधकर्ता। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि 2.2 करोड़ फॉलोअर्स का दम्भ भरने वाले स्वयंभू क्रांतिकारी आखिर जंतर-मंतर की धरती पर कुछ हजार लोगों की भीड़ भी क्यों नहीं जुटा पाए? क्या सोशल मीडिया की क्रांति का गुब्बारा वास्तविक भारत की ज़मीन पर आते ही फुस्स हो गया? बतौर Gen-Z, उस दिन मेरी सबसे बड़ी निराशा यह नहीं थी कि भीड़ कम थी।

मेरी निराशा यह थी कि छात्रों का आंदोलन छात्रों के हाथों में नहीं रहा। जिस मंच पर शिक्षा सुधार की बात होनी चाहिए थी, वहाँ वैचारिक प्रतीकों की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। जिस आंदोलन को परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की लड़ाई बनना चाहिए था, वह कुछ घंटों में सामान्य सत्ता-विरोधी नारों का अखाड़ा बनता दिखाई दिया। प्रदर्शन से पहले और प्रदर्शन के दौरान मैं लगातार एक बात देख रहा था। कथित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग, कुछ वैचारिक कार्यकर्ता और विदेशी मीडिया के अनेक मंच इस आंदोलन को भारत की ‘युवा क्रांति’ सिद्ध करने में जुटे थे। कोई इसकी तुलना बांग्लादेश की छात्र क्रांति से कर रहा था, तो कोई नेपाल के राजनीतिक परिवर्तन में युवाओं की भूमिका से समानताएँ खोज रहा था। ऐसा वातावरण बनाया जा रहा था मानो जंतर-मंतर पर कोई ऐतिहासिक क्रांति जन्म लेने वाली हो।

लेकिन जंतर-मंतर पर जो मैंने अपनी आँखों से देखा, वह इन दावों और प्रचारित आख्यानों से बिल्कुल भिन्न था। मुझे बार-बार इतिहासकार Crane Brinton की बात याद आ रही थी। Brinton ने लिखा था कि किसी भी क्रांतिकारी आंदोलन की सबसे बड़ी त्रासदी तब शुरू होती है, जब उसके मूल उद्देश्य पर ऐसे वैचारिक समूहों का प्रभाव बढ़ने लगता है जिनकी प्राथमिकताएँ आंदोलन के घोषित लक्ष्य से अलग होती हैं। मेरे लिए जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन किसी क्रांति का प्रारंभ नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया की एक झलक था जिसमें वास्तविक शिकायतों से जन्मा आंदोलन धीरे-धीरे अपने मूल उद्देश्य से दूर जाने लगता है।

यही कारण है कि जब मैं उस पूरे घटनाक्रम को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मेरे मन में सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि आखिर एक छात्र आंदोलन छात्रों के मुद्दों से भटककर उस दिशा में कैसे पहुँच गया, जहाँ नारे मुद्दों पर भारी पड़ने लगे? आइए, अब परत-दर-परत समझते हैं कि 6 जून को जंतर-मंतर पर वास्तव में क्या हुआ और क्यों इस पूरे घटनाक्रम ने मुझे Crane Brinton की The Anatomy of Revolution में वर्णित क्रांतिकारी प्रक्रिया की याद दिला दी।

ब्रिंटन का सिद्धांत और जंतर-मंतर का वह दिन

6 जून की घटनाओं पर आगे बढ़ने से पहले यह समझना आवश्यक है कि आखिर इतिहासकार Crane Brinton क्रांतियों को किस दृष्टि से देखते थे। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक  The Anatomy of Revolution में Brinton लिखते हैं, “The revolution is like a fever; it reaches a crisis, then the fever subsides and the patient recovers, but is never quite the same again.” अर्थात क्रांति किसी बुखार की तरह होती है। पहले समाज में असंतोष जमा होता है, फिर वह उबाल पर पहुँचता है, उसके बाद प्रतिक्रिया का दौर आता है और अंततः समाज एक नई अवस्था में पहुँच जाता है। वह सामान्य तो दिखता है, लेकिन पहले जैसा कभी नहीं रहता।

Brinton के अनुसार लगभग हर क्रांति एक निश्चित जीवनचक्र से गुजरती है- Old Order → Moderate Phase → Radical Phase → Thermidorian Reaction जब मैं 6 जून को जंतर-मंतर पर घटित घटनाओं को देख रहा था, तब बार-बार मुझे यही ढाँचा याद आ रहा था। जितना मैं उस आंदोलन को देखता गया, उतना ही मुझे लगा कि यह केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि Brinton के सिद्धांत का एक छोटा राजनीतिक नमूना बनता जा रहा है।

Old Regime : असंतोष की वह जमीन जिस पर आंदोलन खड़ा हुआ

Crane Brinton अपनी किताब The Anatomy of Revolution में सबसे पहले “Old Regime” की चर्चा करते हैं यानी वह सड़ांध, असंतोष और व्यवस्था के प्रति अविश्वास जो किसी भी क्रांति या बड़े जन-आंदोलन को जन्म देता है। CJP protest के मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। आज़ाद भारत में वर्षों से पेपर लीक, भर्ती घोटाले और परीक्षा प्रणाली की खामियाँ राष्ट्रीय चर्चा का विषय रहे हैं। और स्वाभाविक रूप से, हर दौर की तरह इस बार भी सबसे अधिक प्रभावित और आक्रोशित युवा पीढ़ी ही थी। NEET पेपर लीक, CBSE से जुड़े विवाद, फर्जी विश्वविद्यालयों के आरोप और बेरोजगारी ने युवाओं के भीतर गहरा असंतोष पैदा कर दिया था। शिक्षा व्यवस्था पर लाखों युवाओं का विश्वास डगमगा चुका था। अभिजीत दीपके और उनके स्वयंभू ठेकेदार साथियों ने इसी असंतोष को आधार बनाकर “कॉकरोच जनता पार्टी” के नाम से इस आंदोलन का आह्वान किया। शुरुआती दौर में छात्रों की भावनाओं, उनके दर्द और उनके भविष्य को केंद्र में रखकर समर्थन जुटाया गया। स्वयं को व्यवस्था का पीड़ित बताने वाला आख्यान भी लगातार आगे बढ़ाया गया।

लेकिन कहते हैं न, कॉकरोच जितना चलता है, अपने पीछे उतनी ही बीमारियाँ छोड़ता जाता है। जैसे-जैसे यह अभियान आगे बढ़ा, मुझे महसूस होने लगा कि पेपर लीक और शिक्षा सुधार का मूल मुद्दा धीरे-धीरे पीछे छूटता जा रहा है और उसकी जगह व्यापक राजनीतिक नारों तथा राष्ट्रविरोधी आवाजों ने लेनी शुरू कर दी है।

Rule of the Moderates : उम्मीदों का दौर

Brinton के अनुसार किसी भी आंदोलन का दूसरा चरण वह होता है जहाँ अपेक्षाकृत संयमित नेतृत्व सामने आता है। जनता को लगता है कि परिवर्तन संभव है और आंदोलन अपने घोषित उद्देश्यों की दिशा में आगे बढ़ रहा है। 6 जून की सुबह जंतर-मंतर पर वातावरण कुछ ऐसा ही था। मंच से छात्रों की समस्याओं की बात हो रही थी। शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न उठाए जा रहे थे। युवा नारे लगा रहे थे और साथ ही मीडिया कवरेज बढ़ रही थी। कई युवाओं को लग रहा था कि शायद इस बार उनकी आवाज़ राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनेगी। Brinton इसी चरण को क्रांति का “हनीमून पीरियड” भी कहते हैं उनके अनुसार यह वह समय होता है  जब लोगों को विश्वास होता है कि बदलाव अब दूर नहीं है।

लेकिन इतिहास हमें यह भी बताता है कि यहीं से दिशा बदलने का खतरा शुरू होता है। और मेरे लिए जंतर-मंतर का सबसे दिलचस्प अनुभव भी यहीं से शुरू हुआ। मैं भीड़ के बीच खड़ा था कि अचानक कहीं से डफली की आवाज़ सुनाई देने लगी। मेरे जैसे Gen Z राजनीतिक आंदोलनों को लंबे समय से देखने वालों के लिए यह दृश्य नया नहीं था। लेकिन मेरे लिए अधिक दिलचस्प वह था जो उसके बाद हुआ।

धीरे-धीरे मुझे भीड़ में कुछ ऐसे चेहरे दिखाई देने लगे जो छात्र आंदोलनों से अधिक स्थायी विरोध-राजनीति के परिचित पात्र प्रतीत हो रहे थे। ऐसे आंदोलनजीवी काक्रोच  जिन्हें देश ने विभिन्न आंदोलनों, धरनों और अभियानों में वर्षों से सक्रिय देखा है। यहीं मेरे मन में पहला गंभीर प्रश्न उठा कि क्या यह आंदोलन अब भी केवल छात्रों का आंदोलन था? या फिर इसके इर्द-गिर्द ऐसे वैचारिक समूह सक्रिय होने लगे थे जिनकी प्राथमिकताएँ शिक्षा सुधार से कहीं व्यापक राजनीतिक उद्देश्यों से जुड़ी थीं? यहीं से मुझे Brinton के अगले चरण  Radicalisation की आहट सुनाई देने लगी।

Radicalisation: वामपंथ का हावी होना

Honeymoon Period ज्यादा देर नहीं चला। Protest शुरू होने के कुछ घंटों बाद ही मुझे लगने लगा कि मंच और भीड़ का चरित्र बदल रहा है। मैं भीड़ के बीच खड़ा था कि अचानक डफलियों की आवाज़ें तेज होने लगीं। मेरे लिए यह केवल एक वाद्ययंत्र की आवाज़ नहीं थी, बल्कि उस पुराने आन्दोलनजीवी इकोसिस्टम की दस्तक जैसी थी जिसे देश पिछले कई वर्षों से अलग-अलग आंदोलनों में देखता आया है। और फिर वही हुआ जिसकी मुझे आशंका थी।

धीरे-धीरे मुझे भीड़ में कुछ परिचित चेहरे दिखाई देने लगे। मैंने वहाँ सुदेश गोयत जैसे कॉकरोच को देखा जो सिर्फ इसमें जो कभी इस देश की किसान  बनकर किसान प्रोटेस्ट में लेती हैं तो कभी पहलवानों के कथित प्रोटेस्ट में उनके साथ मंच साँझा करती दिखाई देती हैं।  यही नहीं इस दौरान मुझे सबसे अधिक जिसने हैरान किया वह बात मार्क्सवादी नेता नेहा की उपस्थिति थी। नेहा फ्रेंच सरकार द्वारा वित्तपोषित मीडिया हाउस France 24 के लिए काम करती हैं। यह वही मीडिया संस्थान है जो कश्मीर को “Indian Occupied Kashmir” के तरह से लिखता आया है और समय-समय पर भारत विरोधी नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है।

यही नहीं, मुझे वहाँ CPI(M) से संबद्ध छात्र संगठन SFI का एक समूह भी दिखाई दिया। मेरे अवलोकन में यही वह समूह था जो बार-बार भीड़ के बीच सक्रिय होकर “आज़ादी-आज़ादी”, “RSS मुर्दाबाद” जैसे नारे लगा रहा था। इतना ही नहीं, प्रदर्शन के दौरान रिकॉर्ड हुए वीडियो में भी कुछ लोग लगातार यह नारा लगाते हुए दिखाई देते हैं, “हम क्या चाहते आजादी, BJP से आजादी, हमारा नारा आजादी, मोदी सुनले आजादी, BJP सुनले आजादी, तुम जेल में डालो आजादी, हम लेके रहेंगे आजादी, मैं भी बोलूँ आजादी, तू भी बोले आजादी, देश बोले आजादी, मोदी तुझसे आजादी, BJP तुझसे आजादी, RSS से आजादी।”

अब आप स्वयं सोचिए, पेपर लीक, भर्ती घोटालों, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और छात्रों के भविष्य से जुड़े आंदोलन में इन नारों का क्या संबंध था? जिस मंच को शिक्षा सुधार की मांग का केंद्र होना चाहिए था, वहाँ विमर्श आखिर किस दिशा में ले जाया जा रहा था? और यहीं मुझे Crane Brinton की वह प्रसिद्ध पंक्ति याद आई- “Moderates are soon overtaken by radicals who are more determined, more ruthless and more organized.” जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे मुझे महसूस होने लगा कि छात्रों के मूल मुद्दे पीछे छूट रहे हैं। पेपर लीक की चर्चा कम हो रही थी। मेरे लिए यही वह क्षण था जब आंदोलन का चरित्र बदलता हुआ दिखाई दिया। जिन युवाओं को अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था के प्रश्नों पर एकजुट किया गया था, उनके बीच अब विमर्श किसी दूसरी दिशा में जाता प्रतीत हो रहा था।

Thermidorian Reaction : The Failed Phase

और फिर आया वह चरण, जिसे Brinton अपनी क्रांतिकारी प्रक्रिया का अंतिम मोड़ मानते हैं। Brinton के अनुसार किसी भी सफल क्रांति या बड़े जनआंदोलन के लिए व्यापक जनसमर्थन, संगठनात्मक क्षमता और दीर्घकालिक ऊर्जा आवश्यक होती है। CJP protest इस कसौटी पर खरा उतरता दिखाई नहीं दिया। 2.2 करोड़ फॉलोअर्स का दम्भ भरने वाले CJP के स्वयंभू क्रांतिकारी जंतर-मंतर की धरती पर कुछ हजार लोगों से आगे भीड़ नहीं जुटा पाए। सोशल मीडिया पर सरकारें गिराने, चुनावी नतीजे प्रभावित करने और देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को हराने के दावे करने वाले यह लोग वास्तविक धरातल पर अपनी कथित जनशक्ति का प्रदर्शन करने में असफल रहे। दिन चढ़ने के साथ भीषण गर्मी बढ़ती गई, भीड़ छंटती गई और आंदोलन की ऊर्जा भी धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई।

धरना-प्रदर्शन के लिए पहुँचे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके सुबह लगभग 10:30 बजे जंतर-मंतर पहुँचे थे। लेकिन भीषण गर्मी के बीच दोपहर में कुछ समय के लिए वे एसी में बैठे भी दिखाई दिए। इसके बाद वे दोबारा प्रदर्शन स्थल पर लौटे, किंतु लगभग 3:15 बजे वहाँ से रवाना हो गए।शाम 4:15 बजे तक जंतर-मंतर का अधिकांश प्रदर्शन स्थल खाली हो चुका था, जबकि दिल्ली पुलिस ने धरना जारी रखने की अनुमति शाम 5 बजे तक दे रखी थी। और इस प्रकार Gen-Z की आवाज़ स्वयंभू ठेकदार दीपके और उनके सहयोगी अपने पहले ही बड़े जमीनी आंदोलन को एक दिन भी पूरी मजबूती से खड़ा नहीं रख पाए। शाम होते-होते प्रदर्शन थकान, दिशाहीनता और घटते जनसमर्थन का शिकार हो चुका था।

जिन युवाओं को पेपर लीक, भर्ती घोटालों और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के नाम पर बुलाया गया था, वे एक बार फिर निराश और हताश होकर लौटते दिखाई दिए। आंदोलन का मूल मुद्दा राष्ट्रिवरोधी नारों के शोर में कहीं खो गया और अंततः कोई ठोस परिणाम भी सामने नहीं आया।

Brinton इसे “Thermidorian Reaction” कहते हैं उनका कहना है कि यह वह अवस्था है जब जनता उग्रवाद, कट्टरता और खोखले नारों से थकने लगती है तथा आंदोलन अपनी ऊर्जा खो बैठता है। और मैंने CJP के इस प्रदर्शन को भी कुछ ही घंटों में उसी दिशा में जाता देखा एक ऐसा आंदोलन, जो बड़ी-बड़ी घोषणाओं, ऊँचे दावों और क्रांति के नारों के साथ शुरू हुआ था, लेकिन बिना कोई ठोस प्रभाव छोड़े समय से पहले ही समाप्त हो गया।

कॉकरोच, कठपुतलियां और पिटे हुए पहलवान

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