ओडिशा : संबलपुर में संघ शिक्षा वर्ग का समापन, डॉ. गोपाल महापात्र ने बताएं RSS की सफलता के 7 आधार
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ओडिशा : संबलपुर में संघ शिक्षा वर्ग का समापन, डॉ. गोपाल महापात्र ने बताएं RSS की सफलता के 7 आधार

ओडिशा के संबलपुर में संघ शिक्षा वर्ग में कुल 614 प्रतिभागियों ने भाग लिया। जिनमें 368 स्थानों से आए 479 शिक्षार्थी शामिल रहे।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Shivam Dixit
Jun 7, 2026, 07:02 pm IST
in भारत, संघ @100, ओडिशा
Sangh Shiksha Varg concludes in Sambalpur Odisha

भुवनेश्वर । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) हिंदू समाज को संगठित कर एक समृद्ध, सशक्त और परम वैभवशाली भारत के निर्माण के लक्ष्य को लेकर निरंतर कार्य कर रहा  है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित यह संगठन अब अपने 100 वर्षों की उल्लेखनीय यात्रा पूरी कर चुका है। संघ की दैनिक शाखाओं के माध्यम से चल रहा यह अभियान हिंदू समाज को संगठित करने के प्रयासों का व्यापक स्वरूप बन चुका है, जिसे संघ राष्ट्र का “पुत्र रूपी समाज” मानता है।

यह विचार संघ के अखिल भारतीय सद्भावना प्रमुख डॉ. गोपाल प्रसाद महापात्र ने संबलपुर स्थित वैदिक इंटरनेशनल स्कूल परिसर में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग एवं कार्यकर्ता विकास वर्ग–प्रथम के समापन समारोह (समारोह) को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

डॉ. महापात्र ने कहा कि यदि राष्ट्रीय कर्तव्यों का पालन जनशक्ति के जागरण के माध्यम से सुनिश्चित किया जाए, तो समाज में व्यापक और दूरगामी परिवर्तन संभव है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का सामाजिक परिवर्तन भारत को ‘स्वतंत्रता’ के आदर्श को साकार करने की दिशा में आगे ले जा सकता है और एक ऐसे समृद्ध राष्ट्र के रूप में स्थापित कर सकता है, जो विश्वगुरु की भूमिका निभाने में सक्षम हो।

Sangh Shiksha Varg concludes in Sambalpur Odisha

स्वतंत्रता: स्वाधीनता व राजनीतिक आज़ादी से आगे

डॉ. महापात्र ने कहा कि ‘स्वतंत्रता’ केवल ‘स्वाधीनता’ या राजनीतिक आज़ादी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका अर्थ अपने स्वयं के ‘तंत्र’ की स्थापना से है।

उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक राष्ट्र की एक आत्मा, एक नियति और एक विशिष्ट चरित्र होता है, तथा हर राष्ट्र का विश्व के लिए एक संदेश होता है। इस संदर्भ में उन्होंने प्रश्न उठाया कि भारत की आत्मा क्या है, उसकी नियति और राष्ट्रीय चरित्र क्या हैं, तथा भारत मानवता को क्या संदेश देता है। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद के अनुसार भारत मूलतः एक आध्यात्मिक राष्ट्र है, और उसकी जीवन-शक्ति आध्यात्मिकता में निहित है। उनका मानना था कि भारत का अस्तित्व उसकी आध्यात्मिकता से अविभाज्य रूप से जुड़ा है; यदि आध्यात्मिकता समाप्त हो जाए, तो भारत अपने वास्तविक स्वरूप में नहीं रह सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि विश्व की कई समकालीन सभ्यताएँ समय के साथ लुप्त हो गईं, जबकि भारत आज भी अपनी निरंतरता और अस्तित्व को बनाए हुए है।

Sangh Shiksha Varg concludes in Sambalpur Odisha

सदियों के आक्रमणों के बीच भारतीय सभ्यता की दृढ़ता

डॉ. महापात्र ने कहा कि सदियों से विभिन्न आक्रांता शक्तियों ने भारत पर बार-बार आक्रमण कर उसकी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया, लेकिन इसके बावजूद भारत अपनी मूल सभ्यतागत चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ आज भी मजबूती से खड़ा है।

उन्होंने इकबाल के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि यूनान, मिस्र, रोम और बेबीलोन जैसी प्राचीन सभ्यताएँ समय के साथ समाप्त हो गईं, जबकि भारत ने अपनी विशिष्ट पहचान और अस्तित्व को आज तक बनाए रखा है।

उन्होंने कहा कि भारत की यह दृढ़ता उसके ‘स्व’ अर्थात सभ्यतागत आत्मबोध और अंतर्निहित राष्ट्रीय पहचान में निहित है। यही ‘स्व’ भारत को सभी ऐतिहासिक चुनौतियों और परिवर्तनों के बावजूद स्थिर बनाए रखता है।  राष्ट्रीय संस्थानों और प्रणालियों का निर्माण इसी आधारभूत ‘स्व’ पर होना चाहिए।

डॉ. महापात्र ने आगे कहा कि भारत ने 1947 में स्वाधीनता प्राप्त की, लेकिन स्वाधीनता और स्वतंत्रता एक समान अवधारणा नहीं हैं। स्वाधीनता का अर्थ विदेशी शासन से मुक्ति और अपने लोगों द्वारा शासन की स्थापना है, जबकि स्वतंत्रता एक व्यापक और गहन अवधारणा है।

उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन से सत्ता के हस्तांतरण के बाद भारत ने राजनीतिक स्वाधीनता प्राप्त की, लेकिन एक पूर्णतः स्वदेशी और सभ्यतागत मूल्यों पर आधारित प्रणाली का निर्माण अभी भी एक सतत प्रक्रिया है।

उन्होंने कहा कि भारत धीरे-धीरे स्वतंत्रता की उस व्यापक अवधारणा की ओर अग्रसर है, जो उसके सांस्कृतिक मूल्यों, सभ्यतागत चेतना और राष्ट्रीय पहचान पर आधारित है।

Sangh Shiksha Varg concludes in Sambalpur Odisha

आध्यात्मिकता ही हमारा ‘स्व’ है

डॉ. महापात्र ने प्रश्न उठाया कि ‘स्वतंत्रता’ का वास्तविक अर्थ क्या है। उन्होंने कहा कि भारत के ‘स्व’ का मूल आधार आध्यात्मिकता है, जिसे उसकी सभ्यतागत आत्मा या अंतर्निहित पहचान कहा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता के मूल सिद्धांत के अनुसार संपूर्ण सृष्टि एक ही दिव्य चेतना की अभिव्यक्ति है। इस दृष्टिकोण से सभी मानव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और वे अलग-अलग इकाइयाँ नहीं, बल्कि एक साझा अस्तित्व का हिस्सा हैं।

उन्होंने श्रीकृष्ण द्वारा भगवद्गीता में अर्जुन को दिए गए उपदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी जीवों के बीच यह पारस्परिक जुड़ाव भारत की आध्यात्मिक विश्व-दृष्टि की नींव है।

डॉ. महापात्र ने आगे कहा कि यदि सभी व्यक्ति परस्पर रूप से जुड़े हुए हैं, तो मानवीय संबंधों और सामाजिक व्यवहार का आधार स्वाभाविक रूप से प्रेम, सहानुभूति और पारस्परिक सम्मान होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा वह स्वयं अपने लिए अपेक्षित करता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि जैसे कठोर शब्द या अपमानजनक व्यवहार व्यक्ति को पीड़ा पहुँचाता है, वैसे ही किसी अन्य को भी आहत करने वाले शब्दों या व्यवहार से बचना चाहिए। इसके विपरीत, जिस प्रकार के व्यवहार की हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं, वही व्यवहार हमें भी दूसरों के प्रति अपनाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सहानुभूति, गरिमा और पारस्परिक सम्मान का यही भाव दैनिक जीवन में आध्यात्मिकता का व्यावहारिक स्वरूप है।

Sangh Shiksha Varg concludes in Sambalpur Odisha

‘स्व’ आधारित व्यवस्था की आवश्यकता

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि समाज को आपसी सहयोग और त्याग पर आधारित जीवन शैली अपनानी चाहिए। उनके अनुसार यह सामूहिक जीवन पद्धति भारत के अंतर्निहित “स्व” से विकसित हुई है। इसी साझा जीवन पद्धति को धर्म कहा गया, जिसने समय के साथ स्थायी जीवन मूल्यों को जन्म दिया, जिन्हें संस्कृति के रूप में जाना गया। आगे चलकर धर्म, संस्कृति और परंपरा की यह निरंतरता एक सभ्यता के रूप में विकसित हुई। उन्होंने कहा कि यह संपूर्ण जीवन शैली ही भारत का “स्व” है।

उन्होंने इस जीवन शैली पर आधारित एक व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को इसी सभ्यतागत ढांचे के अनुरूप होना चाहिए। इसी प्रकार कृषि, स्वास्थ्य, रक्षा और समाज के अन्य सभी क्षेत्रों की प्रणालियाँ भी भारत के “स्व” पर आधारित जीवन दृष्टि के अनुसार संरचित की जानी चाहिए।

अंत्योदय से सर्वोदय की अवधारणा

उन्होंने कहा कि अंत्योदय की अवधारणा इसी दर्शन से उत्पन्न हुई है, जिसका अर्थ है कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति का उत्थान ही सर्वोदय (सभी का कल्याण) की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। चूंकि वह व्यक्ति भी समाज का अभिन्न हिस्सा है, इसलिए उसके कल्याण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अतः ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें सभी के कल्याण का ध्यान रखा जाए और समाज में सामूहिक सद्भाव एवं सह-अस्तित्व सुनिश्चित हो।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसी व्यवस्था की स्थापना के लिए क्या आवश्यक है, इस पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने स्मरण कराया कि संघ की स्थापना के प्रारंभिक काल में स्वयंसेवक यह शपथ लेते थे कि वे हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्र कराने के लिए वे संघ का हिस्सा बने हैं ।  बाद में इस संकल्प को विस्तार देते हुए हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज के सर्वांगीण विकास तथा एक समृद्ध और परम वैभवशाली भारत के निर्माण के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।

उन्होंने कहा कि गहन चिंतन के बाद डॉ. हेडगेवार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह कार्य अन्य किसी माध्यम से संभव नहीं है। धर्म और संस्कृति की रक्षा तथा एक परम वैभवशाली भारत के निर्माण के उद्देश्य से उन्होंने 1925 में विजयादशमी के पावन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। आज इस संगठन को अपनी यात्रा के 100 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं।

उन्होंने आगे कहा कि किसी भी संगठन के लिए यह अत्यंत दुर्लभ है कि वह एक शताब्दी तक अपने मूल उद्देश्यों के प्रति निरंतर प्रतिबद्ध रहे, अपने सिद्धांतों या कार्यपद्धति में किसी प्रकार का विचलन न होने दे और साथ ही मुख्यधारा में प्रासंगिक भी बना रहे। इस दृष्टि से उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निरंतरता और समर्पण का एक उल्लेखनीय उदाहरण बताया।

Sangh Shiksha Varg concludes in Sambalpur Odisha

संघ केवल संगठन नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) केवल एक संगठन नहीं है, बल्कि मूलतः एक वैचारिक आंदोलन है। उनके अनुसार भारत एक हिंदू राष्ट्र है और एक संगठित हिंदू समाज एक शक्तिशाली एवं सक्षम भारत का निर्माण कर सकता है।

उन्होंने आगे कहा कि संघ का कार्य इस विचार को एक जन-आंदोलन के रूप में परिवर्तित करना रहा है, जिसे समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाया जाए। यद्यपि इस कार्य को प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एक संगठनात्मक स्वरूप प्रदान किया गया, लेकिन इसकी मूल आत्मा एक वैचारिक आंदोलन ही है।

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संघ की सफलता के सात आधार

उन्होंने कहा कि किसी भी संगठन की सफलता के लिए सात प्रमुख तत्व आवश्यक होते हैं। इनमें सबसे पहले उद्देश्य आता है। डॉ. हेडगेवार ने संघ का उद्देश्य स्पष्ट रूप से निर्धारित किया था—हिंदू समाज का संगठन तथा एक समृद्ध एवं परम वैभवशाली भारत का निर्माण। इसी लक्ष्य के साथ संघ के स्वयंसेवक निरंतर परिश्रम कर रहे हैं।

दूसरा तत्व सिद्धांत  ) है। संघ का सिद्धांत है कि केवल संगठित हिंदू समाज के माध्यम से ही भारत एक शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बन सकता है। संघ का मार्गदर्शक सूत्र है—“संगठित हिंदू, समर्थ भारत।”

इसके बाद कार्यपद्धति  आती है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक सुव्यवस्थित और प्रभावी प्रणाली आवश्यक है, जिसके माध्यम से समाज के सभी वर्गों के लोग एक स्थान पर आकर, एक साथ बैठकर सामूहिक चिंतन कर सकें। इसी से आपसी स्नेह और भ्रातृत्व की भावना विकसित होती है।

उन्होंने भगिनी निवेदिता का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि लोग एक निश्चित स्थान पर, निश्चित समय पर, प्रतिदिन किसी निश्चित विषय पर चिंतन करें, तो वह विषय धीरे-धीरे एक “महामंत्र” का स्वरूप ले लेता है।

उन्होंने कहा कि संघ ने अपनी शाखा प्रणाली के माध्यम से एक विशिष्ट कार्यपद्धति विकसित की है, जिसके द्वारा राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रभक्ति का व्यापक जागरण हो रहा है।

चौथा तत्व कार्यकर्ता है। इस व्यवस्था के माध्यम से स्वयंसेवकों का निर्माण होता है और उन्हीं से समर्पित कार्यकर्ताओं का विकास होता है। उन्होंने कहा कि संघ में दो प्रकार के कार्यकर्ता होते हैं—प्रचारक, जो अपना संपूर्ण जीवन समाज कार्य के लिए समर्पित करते हैं, और गृहस्थ कार्यकर्ता, जो पारिवारिक जीवन में रहते हुए समाज सेवा करते हैं।

पाँचवाँ तत्व नेतृत्व है। संघ ने एक सुदृढ़ नेतृत्व परंपरा विकसित की है, जिसके कारण इसका समाज में निरंतर विस्तार संभव हुआ है।

छठा तत्व युगानुकूल परिवर्तन  है। चूंकि संगठन समाज के लिए कार्य करता है, इसलिए आवश्यकतानुसार समय के साथ परिवर्तन अनिवार्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ ने अपने उद्देश्य, सिद्धांत या कार्यपद्धति में परिवर्तन नहीं किया है, लेकिन समय के अनुसार कार्यक्रमों के स्वरूप में आवश्यक बदलाव किए हैं। यहाँ तक कि गणवेश में भी परिवर्तन हुआ है, जो इसकी प्रासंगिकता को दर्शाता है।

सातवाँ और अंतिम तत्व लोकशक्ति का जागरण है। उन्होंने कहा कि यदि संघ केवल अपने तक सीमित रहता, तो इसका वर्तमान स्वरूप संभव नहीं होता। इसकी स्थापना का उद्देश्य स्वयं का विस्तार नहीं, बल्कि पूरे समाज का संगठन था। इसी प्रक्रिया के माध्यम से लोकशक्ति का जागरण हुआ है। उन्होंने कहा कि संगठित चेतना से समाज में सामूहिक शक्ति का स्वाभाविक रूप से निर्माण होता है।

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पंच परिवर्तन को सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान

डॉ. महापात्र ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक पंच परिवर्तन के पाँच विषयों को समाज के दैनिक जीवन में समाहित करने के लिए कार्य कर रहे हैं, ताकि व्यापक सामाजिक परिवर्तन सुनिश्चित किया जा सके। ये पाँच आयाम हैं—नागरिक कर्तव्य, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्व-आधारित जीवन शैली तथा कुटुंब प्रबोधन।

उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान समय में ये पाँच तत्व राष्ट्रधर्म के प्रमुख आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं और इनके अंगीकरण से समाज में सकारात्मक एवं रचनात्मक परिवर्तन संभव है।

अनुशासन और संस्कारों को घर-घर पहुँचाने की आवश्यकता: तुलाराम कलेत

वीर सुरेंद्र साई प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वित्त नियंत्रक एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि तुलाराम कलेत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुशासन, संगठनात्मक संस्कृति और संस्कारों को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाने की आवश्यकता है। उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया कि वे जाति-आधारित विभाजन और सामाजिक वैमनस्य फैलाने वाली शक्तियों के विरुद्ध सतर्क रहकर सक्रिय भूमिका निभाएँ।

उन्होंने युवाओं से राष्ट्र निर्माण और सामाजिक विकास में आगे आने का आग्रह किया। साथ ही उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों को अधिक उत्तरदायित्व के साथ सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन में योगदान देना चाहिए तथा राष्ट्रहित, सामाजिक समरसता और चरित्र निर्माण के कार्यों में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।

Sangh Shiksha Varg concludes in Sambalpur Odisha

मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री सहित अनेक गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति

कार्यक्रम में ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, उपमुख्यमंत्री कनक वर्धन सिंह देव, ओडिशा विधानसभा के उपसभापति भवानी शंकर भोई, मंत्री सुरेश पुजारी एवं रविनारायण नायक, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल, तथा विधायक जयनारायण मिश्र, गौरीशंकर माझी, अश्विनी षडंगी, निहार महानंद , सनत गड़तिया, जय ढोलकिया, पूर्व विधायक नाउरी नायक सहित अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे।

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614 प्रतिभागियों ने लिया भाग

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रतिवर्ष ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान संघ शिक्षा वर्ग का आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य स्वयंसेवकों की गुणवत्ता एवं दक्षता में वृद्धि करना, संगठनात्मक कार्य का विस्तार करना तथा भावी कार्यकर्ताओं का निर्माण करना है। इस वर्ष संबलपुर स्थित वैदिक इंटरनेशनल स्कूल परिसर में दो प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए गए।

इन दोनों शिविरों में कुल 614 प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें 368 स्थानों से आए 479 शिक्षार्थी शामिल थे। सभी प्रतिभागियों ने अपने यात्रा व्यय एवं अन्य खर्च स्वयं वहन किए। प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रतिदिन प्रातः 4 बजे से रात्रि 10 बजे तक संचालित हुआ, जिसका समापन दीप विसर्जन के साथ किया गया।

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