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दोमुंहे दर्दमंद!

जनजातीय हितैषी राजनीति का मुखौटा अब साफ दिखता है। जो धड़ा खुद को सेकुलर और आदिवासी हितों का रक्षक बताता है, वह अक्सर कन्वर्जन के सवाल पर चुप रहता है। यही राजनीति हर बार जनजातीय पहचान, आस्था और संवैधानिक संरक्षण पर चोट करने वालों के साथ खड़ी नजर आती है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jun 7, 2026, 06:30 pm IST
inभारत, सम्पादकीय, दिल्ली
लाल किले में आयोजित जनजाति सांस्कृतिक समागम में देशभर से आए लोग

लाल किले में आयोजित जनजाति सांस्कृतिक समागम में देशभर से आए लोग

भारतीय राजनीति में जनजातीय समाज को लेकर सबसे बड़ा छल यह है कि जो दल और विचारधाराएं स्वयं को उनका सबसे बड़ा हितरक्षक, पैरोकार और संवैधानिक प्रहरी बताती हैं, वही अक्सर उनके वास्तविक प्रश्नों से बचने के लिए मुद्दा बदलने की सबसे धूर्त और बचकानी तरकीबें अपनाती हैं। जब जनजातीय समाज अपने सांस्कृतिक अस्तित्व, आस्था, परंपरा और संवैधानिक संरक्षण पर हो रहे प्रहारों की बात करता है, तब अचानक कुछ राजनीतिक स्वर जल, जंगल और जमीन का झंडा उठा लेते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या जल, जंगल और जमीन की चिंता और सांस्कृतिक अस्तित्व की चिंता एक-दूसरे के विरोधी हैं। क्या जनजातीय समाज केवल जमीन का मालिक है, संस्कृति का नहीं। क्या उसे जंगल चाहिए, पर अपनी आस्था बचाने का अधिकार नहीं।

हाल में दिल्ली के लालकिला मैदान में हुआ जनजातीय जुटान इसी असुविधाजनक प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ले आया। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए जनजातीय समूहों ने यह मांग रखी कि कन्वर्जन के बाद भी अनुसूचित जनजाति आरक्षण और जनजातीय संवैधानिक लाभ लेने की व्यवस्था की समीक्षा होनी चाहिए। इस मांग से असहमत कैसे हुआ जा सकता है! कैसे इसे अनसुना किया जा सकता है!

यह जनजातीय समाज के भीतर लंबे समय से चल रही बेचैनी का उबाल है। सवाल सिर्फ आरक्षण का नहीं है। सवाल यह है कि जिन संवैधानिक प्रावधानों का उद्देश्य जनजातीय समाज की विशिष्ट संस्कृति, जीवन-पद्धति और ऐतिहासिक वंचना की रक्षा था, क्या उन्हीं प्रावधानों को उस सांस्कृतिक ढांचे को कमजोर करने वाली प्रक्रियाओं के लिए खुला छोड़ दिया जाए?

यहीं से कुछ राजनीतिक दलों की बेचैनी शुरू होती है। वे जनजातीय समाज के जल, जंगल और जमीन की बात तो करेंगे, लेकिन उसके देवस्थल, ग्राम देवता, परंपरा, उत्सव, विवाह रीति, मृत्यु संस्कार और सामुदायिक स्मृति पर होने वाले दबावों की चर्चा से बचेंगे। वे वनाधिकार की भाषा बोलेंगे, पर आस्था अधिकार की भाषा से घबराएंगे। वे संविधान की दुहाई देंगे, पर यह प्रश्न नहीं पूछेंगे कि संवैधानिक संरक्षण का लाभ किसे और किस उद्देश्य से मिला था। यही वह राजनीति है जो जनजातीय समाज को पूर्ण मनुष्य नहीं, बल्कि सुविधाजनक राजनीतिक प्रतीक और पुतला बनाकर देखती है।

जब विपक्षी स्वर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर यह आरोप लगाते हैं कि वे जनजातीय समाज को जल, जंगल और जमीन से वंचित करना चाहते हैं, तो यह आरोप अपने आप में एक राजनीतिक खांचा या फ्रेम है। यह फ्रेम जमीन, वनाधिकार, कॉरपोरेट, खनन और विस्थापन की भाषा में बात करता है। इन विषयों की अपनी वैधता है। कोई भी गंभीर व्यक्ति जनजातीय भूमि अधिकारों, वनाधिकार कानून, पेसा (PESA) और ग्रामसभा की उपेक्षा को हल्के में नहीं ले सकता। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इसी भाषा का उपयोग जनजातीय समाज के भीतर उठ रहे कन्वर्जन और सांस्कृतिक असुरक्षा के प्रश्न को ढकने के लिए किया जाता है।

यह वही बचकाना तर्क है जिसमें कहा जाता है कि असल मुद्दा तो जल, जंगल और जमीन है। मानो जनजातीय समाज ऐसा नासमझ है कि वह एक समय में केवल एक ही मुद्दा ले सकता है। मानो वह अपनी जमीन भी नहीं बचा सकता और अपनी संस्कृति भी नहीं। असल में यह जनजातीय समाज की राजनीतिक बुद्धि का अपमान है। उसके लिए जमीन, जंगल, नदी, देवता, पर्व, भाषा, नृत्य, पूर्वज और सामुदायिक कानून अलग— अलग खांचे नहीं हैं। वे एक ही जीवन—दर्शन के हिस्से हैं। इसलिए जो राजनीति उसके सांस्कृतिक संकट को सांप्रदायिक कहकर खारिज करती है, वह दरअसल उसकी अस्मिता को आधा काटकर देखती है।

कन्वर्जन और जनजातीय अधिकार का विवाद इसी कारण इतना संवेदनशील है। अनुसूचित जनजाति की पहचान क्या सिर्फ भूगोल है! क्या उसका अपना विशिष्ट सामाजिक विज्ञान नहीं है! राजनीति का गणित सामाजिक विज्ञान के इस समीकरण को क्यों गड़बड़ा रहा है, क्यों इसकी अनदेखी की जा रही है?

यह उतना ही बड़ा सामाजिक तथ्य है कि जनजातीय पहचान सिर्फ प्रशासनिक प्रमाणपत्र नहीं होती। वह रीति, स्मृति, समुदाय, परंपरा और सामूहिक जीवन से बनती है। यदि कोई व्यक्ति या समूह कन्वर्जन के बाद अपनी जनजातीय सामुदायिक परंपरा से कट जाता है, तो क्या वह उसी आधार पर बने संरक्षण का हकदार बना रहे। यह प्रश्न पूछना न असंवैधानिक है, न असामाजिक। इसे पूछते ही किसी को विभाजनकारी बताना दरअसल वास्तविक मुद्दे से भागना है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यही राजनीति ‘आदिवासी’ शब्द को अधिकार की अंतिम भाषा बनाकर पेश करती है, लेकिन जनजातीय शब्द की संवैधानिक सटीकता से बचती है। ‘आदिवासी’ शब्द का राजनीतिक उपयोग मूलनिवासी बनाम बाहरी की धारणा को जन्म देता है। भारतीय संदर्भ में यह धारणा वैज्ञानिक रूप से खारिज हो चुकी है कि बाहर से कोई आर्य आये थे और उनका मूलनिवासियों की नस्ल से कोई संघर्ष हुआ। हां, भारत के मूलनिवासियों पर हमला करने वाले शक, हूण, कुषाण, तुर्क, मुगल आक्रांताओं का इतिहास तथ्यों की कसौटी पर अवश्य कसा जा सकता है। परंतु यहां राजनीतिक दलों के पाले इतिहासकार बौद्धिक बेईमानी का परिचय देते आए हैं।

वास्तव में गंगा—जमुनी सभ्यता की कहानी अत्यंत जटिल राजनीतिक प्रश्नों को छोड़ती और सरलीकरण के छद्म से गुजरती है। भारत के निवासियों के इतिहास की कहानी हजारों वर्षों की स्थानीय परम्पराओं व निरंतरताओं से बनी है। किसी एक समूह को शुद्ध मूलनिवासी और दूसरे को स्थायी बाहरी बताना राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो सकता है, पर वैज्ञानिक और राष्ट्रीय दृष्टि से घातक सरलीकरण है। इसी कारण जनजातीय शब्द अधिक संतुलित, संवैधानिक और राष्ट्रीय एकता के अनुकूल है। वह अधिकार देता है, पर अलगाववादी मिथक नहीं गढ़ता।

इसी पैंतरेबाज राजनीति का दूसरा चेहरा ग्रेट निकोबार जैसे मुद्दों पर दिखाई देता है। जब देश की तटीय सीमाओं, अछूते द्वीपीय क्षेत्रों और समुद्री सामरिक हितों की दृष्टि से कोई विकासात्मक हलचल होती है, तब अचानक वही राजनीति पर्यावरण—प्रेमी बनकर सामने आती है। पर्यावरण की चिंता महत्वपूर्ण है, शोंपेन और निकोबारी समुदायों की सुरक्षा अनिवार्य है, जैव विविधता की रक्षा भी राष्ट्रीय कर्तव्य है। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या पर्यावरण का लबादा केवल उन्हीं परियोजनाओं के विरुद्ध ओढ़ा जाएगा जिनसे भारत की सामरिक स्थिति मजबूत होती हो। क्या खनन, वन भूमि हस्तांतरण और औद्योगिक परियोजनाओं पर वही कठोरता कांग्रेस शासित या विपक्ष शासित राज्यों में भी दिखाई देती है!

ग्रेट निकोबार परियोजना पर आपत्ति रखना लोकतांत्रिक अधिकार है। पर यदि हर रणनीतिक परियोजना को विकास बनाम पर्यावरण के ऐसे द्वंद्व में फंसा दिया जाए जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा को संदिग्ध और विकास को अपराध घोषित कर दिया जाए, तो यह भारत जैसे सुदीर्घ तटरेखा वाले राष्ट्र के हित में नहीं है। अंदमान निकोबार सिर्फ नक्शे का दूरस्थ हिस्सा नहीं, हिंद प्रशांत की सामरिक धुरी है। वहां बंदरगाह, एयरपोर्ट और लॉजिस्टिक क्षमता का प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। इसलिए आलोचना हो, पर पारदर्शी और तथ्यात्मक हो। पर्यावरणीय शर्तें कड़ी हों, पर भारतीय सामरिक हितों के प्रति उदासीनता न हों।

यही इस पूरे विमर्श का केंद्रीय विरोधाभास है। जनजातीय समाज के नाम पर राजनीति करने वाले कई स्वर उसके सांस्कृतिक संकट पर चुप हैं, लेकिन उसके नाम से सत्ता विरोधी विमर्श बनाने को तत्पर हैं। वे कन्वर्जन के प्रश्न को टालते हैं, डीलिस्टिंग की मांग को चरमपंथ कह देते हैं, जनजातीय की संवैधानिक भाषा के बजाय ‘आदिवासी’ के राजनीतिक मुहावरे में भावनात्मक ध्रुवीकरण करते हैं, और जब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विकास सामने आता है तो पर्यावरण के नाम पर भारत की दीर्घकालिक समुद्री चिंताओं से मुंह मोड़ लेते हैं।

सच्ची जनजातीय हितैषी राजनीति वह होगी जो जल, जंगल और जमीन की रक्षा भी करे, जनजातीय आस्था की रक्षा भी करे, वनाधिकार भी लागू करे, कन्वर्जन से उपजे सांस्कृतिक असंतुलन पर भी डटकर बहस करे, पर्यावरण को भी महत्व दे और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी। पर इसके लिए मुखौटे नहीं, नैतिक साहस चाहिए। दुर्भाग्य से आज जनजातीय समाज पर सबसे अधिक बोलने वाली राजनीति अक्सर उसी की जटिलता से सबसे अधिक डरती है। वह उसे वोट बैंक के रूप में चाहती है, स्वतंत्र सांस्कृतिक आवाज के रूप में नहीं। यही इस विमर्श की सबसे बड़ी विडंबना है।

X@hiteshshankar

 

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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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