जनजाति सांस्कृतिक समागम का आयोजन मुख्य रूप से जनजाति सुरक्षा मंच ने किया। इस समागम की कल्पना, तैयारी, उद्देश्य आदि को लेकर पाञ्चजन्य के समाचार संपादक अरुण कुमार सिंह ने जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा से बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके मुख्यांश-
जनजाति सांस्कृतिक समागम दिल्ली में हो, यह विचार कब, क्यों और कैसे हुआ!
दिल्ली देश की राजधानी है। यहां कुछ भी होता है, तो वह वैश्विक खबर बन जाती है। इसलिए जनजाति सुरक्षा मंच ने विचार किया कि दिल्ली में एक ऐसा कार्यक्रम हो, जिसकी चर्चा दूर-दूर तक हो। पहले इस कार्यक्रम का नाम था-जनजाति डिलिस्टिंग महागर्जना महारैली। बाद में कुछ कारणवश इसका नाम बदल कर ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ कर दिया गया। इसकी कल्पना कुछ वर्ष पहले उस समय की गई थी, जब पूरे देश में डिलिस्टिंग के समर्थन में 221 रैलियां संपन्न हुईं। उन रैलियों में 12,00,000 से अधिक लोगों ने भाग लेकर डिलिस्टिंग करने की मांग की।

आम लोग डिलिस्टिंग को समझ नहीं पा रहे हैं। इसके बारे में बताएं!
डिलिस्टिंग का अर्थ थोड़ा व्यापक है। इसका साधारण अर्थ है जो लोग जनजाति के नाम या अल्पसंख्यक के नाम पर दोहरा लाभ ले रहे हैं, उनके नाम आरक्षण की सूची से हटाना, उन्हें जनजाति के नाम पर मिलने वाली सुविधाओं से वंचित करना। सबको पता है कि जनजाति समाज में कन्वर्जन काफी हुआ है। लोभ-लालच से कहीं ईसाइयों ने और कहीं मुसलमानों ने जनजातियों को अपनी परंपरा और पूजा-पद्धति से दूर कर दिया है। ऐसे लोग अभी भी जनजाति के नाम पर सरकारी आरक्षण ले रहे हैं और वक्त पर ये लोग अल्पसंख्यक के नाते मिलने वाली सुविधाओं का भी लाभ उठा रहे हैं। इसे ही दोहरा लाभ कहा जाता है। इसलिए जनजाति सुरक्षा मंच मांग कर रहा है कि ऐसे लोगों को दोहरा लाभ न दिया जाए और यह तब होगा, जब डिलिस्टिंग होगी।
जनजाति सुरक्षा मंच का गठन कैसे हुआ और कब से मंच डिलिस्टिंग की मांग कर रहा है!
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 30 अप्रैल और 1 मार्च, 2006 को एक बैठक हुई थी। उसमें 14 राज्य से 85 प्रतिनधि आए थे। उनमें अधिकतर जनजाति समाज के थे। उसमें मुख्य रूप से डॉ. कार्तिक उरांव की उस मांग पर विचार हुआ, जिसमें वे कहा करते थे कि जो लोग जनजातियों के अधिकारों पर डाका डाल रहे हैं, उन्हें रोका जाए। डॉ. कार्तिक उरांव कांग्रेस के सांसद थे। इसके बावजूद उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी तक इस मांग को पहुंचाया, लेकिन वे अपनी मांग मनवाने में सफल नहीं रहे। रायपुर की बैठक में इस मामले को बहुत ही गंभीर माना गया और तय हुआ कि डॉ. कार्तिक उरांव का जो अधूरा काम है, उसे पूरा किया जाएगा। इसी के लिए जनजाति सुरक्षा मंच का गठन हुआ। अपने गठन के बाद से ही मंच इस काम में लगा है।
अपनी मांग मनवाने के लिए मंच ने अब तक किस तरह के आंदोलन किए हैं या कदम उठाए हैं!
मंच के पहले राष्ट्रीय संयोजक थे मोरेन सिंह पूर्ति। 2009 में उनके नेतृत्व में अरुणाचल प्रदेश से लेकर गुजरात तक और जम्मू-कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। 28,00,000 लोगों से हस्ताक्षर करवाकर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटिल को एक ज्ञापन सौंपा गया था। उस समय वह भी यह जानकर चकित हो हुई थीं कि कुछ लोग दोहरा लाभ ले रहे हैं। फिर 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले मंच ने सभी राजनीतिक दलों से निवेदन किया वे ऐसे लोगों को टिकट न दें, जो दोहरा लाभ ले रहे हैं।
अच्छी बात यह रही कि सभी राष्ट्रीय दलों ने मंच के निवेदन को माना। फिर 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से भी मंच का एक प्रतिनिधिमंडल मिला। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे मंच की मांग के साथ हैं और जो भी होगा अवश्य किया जाएगा। इसके बाद 29 अक्तूबर, 2020 को देश के 228 जिलों के जिलाधिकारियों और आयुक्तों के माध्यम से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम पर ज्ञापन दिया गया। अक्तूबर, 2021 में फिर से मंच ने इस आंदोलन को शुरू किया और इसके बाद 2022 तक पूरे देश में जिला स्तर पर 221 रैलियां हुईं। फिर 2022 में ही 21 से 31 मार्च तक सड़क से सदन तक 10 दिन का अभियान चलाया गया। इस दौरान मंच के कार्यकर्ताओं की देखेरख में 41 टोलियां बनीं। हर टोली में तीन कार्यकर्ता शामिल थे। इन टोलियों ने 450 सांसदों से संपर्क कर डिलिस्टिंग क्यों होना चाहिए, उसके बारे में उन्हें बताया। सांसदों से यह भी आग्रह किया गया कि वे इस मुद्दे को शून्य काल में संसद में उठाएं। ऐसा कई सांसदों ने किया भी।
2022 में 19-21 अगस्त तक उत्तर प्रदेश के चुनार में एक बैठक इुई। उसमें तय किया गया अब प्रदेश स्तर पर रैलियां की जाएंगी। पहली रैली 10 फरवरी, 2023 को भोपाल में हुई। उसमें हजारों जनजातियों ने डिलिस्टिंग के लिए हुंकार भरी। दूसरी रैली 25 मार्च को भुवनेश्वर में, तीसरी रैली 26 मार्च को गुवाहाटी में हुई। 9 मई को आंध्र प्रदेश के पाडेरू में और 16 अप्रैल को रायपुर में रैली हुई। ऐसे ही 27 मई को अमदाबाद में, 29 मई को आदिलाबाद में, 18 जून को उदयपुर में रैलियों का आयोजन हुआ। वर्षा काल को देखते हुए कुछ महीने रैलियां नहीं हुईं। फिर 29 अक्तूबर को एक ही दिन पूर्णिया, बनारस और नाशिक में तीन रैली हुई।
26 नवंबर को मुंबई में, 16 दिसंबर को दुमका में, 24 दिसंबर को रांची में, 26 दिसंबर को अगरतला और शैलम में विशाल रैलियां इुईं। 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले जनवरी-फरवरी में मंच ने पोस्टकार्ड लेखन अभियान चलाया। इसके अंतर्गत लाखों लोगों ने प्रधानमंत्री को पोस्टकार्ड भेजकर डिलिस्टिंग की मांग की। 2025 में गोवा की राजधानी पंजी में अंतिम प्रदेश स्तर की रैली हुई। इन रैलियों के बाद मंच ने पूरे देश में ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया।
समागम में अंदमान से लेकर दमन तक के लोगों की भागीदारी रही। इतनी दूरी से लोगों को कैसे लाया गया और उन तक बात कैसे पहुंचाई गई!
इसके लिए अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ताओं ने आशा से भी अधिक मेहनत की। उन कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव तक ‘दिल्ली चलो’ के अभियान को पहुंचाया और लोगों को बताया कि दिल्ली चलने से ही उनकी संस्कृति और अधिकार बचेंगे। फिर क्या था लोगों में दिल्ली आने की होड़ लग गई। लोगों ने शुल्क देकर पंजीकरण कराया, सबने रेल का किराया दिया।
पश्चिम बंगाल और ओडिशा में तो इतने लोगों ने पंजीकरण कराया कि बहुत जल्दी ही उनका कोटा भर गया। रेलवे ने भी सहयोग किया। 43 विशेष रेलगाड़ियां चलाई गईं। इस कारण लोगों को दिल्ली लाने में बहुत आसानी हुई। समाज ने भी तन, मन और धन से पूरा सहयोग किया। कह सकते हैं कि समाज, स्वयंसेवक और सरकार के सहयोग से यह विशाल और दिव्य समागम सफलापूर्वक संपन्न हुआ।

















