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जनजातीय स्वाभिमान का राष्ट्रीय समागम

भारत की आत्मा केवल महानगरों में नहीं बसती। वह सरहुल, करमा, मागे पोरोब, गोटुल की परंपरा, वन-देवताओं की आस्था और मांदर की धुन में भी जीवित है। यदि ये परंपराएं कमजोर होती हैं, तो केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक संरचना भी कमजोर होती है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
May 30, 2026, 02:11 pm IST
in भारत, सम्पादकीय, दिल्ली
समागम में उपस्थित विशाल जनसमूह

समागम में उपस्थित विशाल जनसमूह

दिल्ली में गत 24 मई को आयोजित जनजाति सांस्कृतिक समागम केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भारत की सभ्यतागत चेतना, सांस्कृतिक विविधता और पहचान के प्रश्न का एक गंभीर राष्ट्रीय उद्घोष था। देशभर से आए डेढ़ लाख से अधिक जनजातीय समाज के लोगों की उपस्थिति ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि भारत का जनजातीय समुदाय अब केवल ‘हाशिए का समाज’ कहे जाने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह अपनी संस्कृति, आस्था और परंपराओं के साथ राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में अपनी जगह चाहता है।

राजधानी दिल्ली में पारंपरिक वेशभूषा, लोक-नृत्य, मांदर और ढोल की थाप, जनजातीय वाद्ययंत्रों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच एक संदेश बार-बार उभरकर सामने आया, ‘जड़ों को बचाइए, संस्कृति को बचाइए।’ यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि उस चिंता का सार्वजनिक स्वर था, जिसे जनजातीय समाज लंबे समय से महसूस करता रहा है। विकास और आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच उनकी भाषाएं, लोक-परंपराएं, आस्थाएं और सामुदायिक जीवन पद्धतियां धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं।

यह प्रश्न केवल किसी एक समुदाय का नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक आत्मा और उसकी विविधता से जुड़ा प्रश्न है। भारत की जनजातियां केवल जनसंख्या का एक हिस्सा नहीं, बल्कि इस देश की प्राचीन स्मृतियों, प्रकृति-केंद्रित जीवन-दृष्टि और सांस्कृतिक निरंतरता की जीवंत प्रतिनिधि हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी देश की कुल आबादी में लगभग 8.6 प्रतिशत है। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं, बल्कि भारत की बहुरंगी सभ्यता का प्रमाण है।

जनजातीय समाज की सबसे बड़ी मांग दया या अलगाव नहीं, बल्कि सम्मानजनक सहभागिता है। वह विकास का विरोध नहीं करता। वह सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधुनिक सुविधाएं चाहता है, लेकिन ऐसे विकास के साथ जो उसकी सांस्कृतिक पहचान को न मिटाए। वह नहीं चाहता कि उसके पर्व, गीत, देव-स्थल, मातृभाषाएं और सामुदायिक परंपराएं विकास की कीमत बन जाएं।

यही कारण है कि इस समागम में सांस्कृतिक संरक्षण, मातृभाषाओं की रक्षा, ग्रामसभा आधारित जीवन-पद्धति, पारंपरिक आस्था और ‘डीलिस्टिंग’ जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठे। मंच से वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि जनजातीय समाज विकास और आधुनिकता के साथ आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों को खोकर नहीं।

भारतीय संविधान भी जनजातीय पहचान को केवल प्रशासनिक श्रेणी नहीं मानता। अनुच्छेद 342 राष्ट्रपति को अनुसूचित जनजातियों को अधिसूचित करने की शक्ति देता है और इस सूची में परिवर्तन केवल संसद द्वारा ही संभव है। यह व्यवस्था इस बात का संकेत है कि जनजातीय पहचान संवैधानिक मान्यता और ऐतिहासिक वास्तविकता दोनों का विषय है।

इसके साथ ही पेसा एक्ट 1996 और फॉरेस्ट राइट्स एक्ट 2006 जैसे कानून यह स्वीकार करते हैं कि जनजातीय समाज का जीवन जल, जंगल, जमीन और ग्रामसभा की सामुदायिक संरचना से जुड़ा हुआ है। वन उनके लिए केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि आस्था, स्मृति और जीवन का आधार हैं। इसलिए विकास की कोई भी नीति तब तक अधूरी रहेगी, जब तक वह जनजातीय समाज की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना को समझने का प्रयास नहीं करती।

लंबे समय तक जनजातीय समाज को या तो पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया या फिर उसे केवल लोक-नृत्य और उत्सव तक सीमित कर दिया गया। जबकि वास्तविकता यह है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम, सांस्कृतिक प्रतिरोध और सामाजिक चेतना में जनजातीय समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। बिरसा मुंडा इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जिन्हें आज भी प्रतिरोध, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मान्यता दी गई।

लेकिन केवल प्रतीकों का सम्मान पर्याप्त नहीं है। वर्तमान की चुनौतियों को भी समझना होगा। जनजातीय समाज के सामने आज सबसे बड़ा संकट सांस्कृतिक क्षरण का है। हर जनजातीय समुदाय की अपनी भाषा, अपनी आस्था-प्रणाली, अपने पर्व, अपना लोक-साहित्य और अपनी सामाजिक संरचना है। इन्हें पिछड़ेपन के रूप में नहीं, बल्कि भारत की ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक विविधता के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी मातृभाषा आधारित शिक्षा और संकटग्रस्त जनजातीय भाषाओं के संरक्षण की आवश्यकता को स्वीकार करती है। यह केवल भाषाई प्रश्न नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सशक्तिकरण का विषय है। जब कोई भाषा समाप्त होती है, तो उसके साथ एक पूरी स्मृति, जीवन-दृष्टि और सांस्कृतिक संसार भी समाप्त हो जाता है।

समागम में ‘डीलिस्टिंग’ का प्रश्न भी प्रमुखता से उठा। जनजाति सुरक्षा मंच और विभिन्न सामाजिक संगठनों का तर्क है कि जो लोग पूरी तरह जनजातीय आस्था, परंपरा और सामुदायिक जीवन से अलग हो चुके हैं, उनके संदर्भ में संवैधानिक और सामाजिक स्तर पर पुनर्विचार होना चाहिए। हालांकि इस विषय को केवल भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया, न्यायिक दृष्टिकोण और जनजातीय समाज की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर समझने की आवश्यकता है। सर्वोच्च न्यायालय भी यह स्पष्ट कर चुका है कि केवल कन्वर्जन किसी व्यक्ति की जनजातीय स्थिति तय करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। यह भी देखा जाएगा कि उसका संबंध अपनी पारंपरिक सामाजिक संरचना और सामुदायिक जीवन से कितना बना हुआ है।

इस आयोजन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि यह केवल विरोध का मंच बनकर नहीं उभरा। यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास और पहचान के सार्वजनिक प्रदर्शन का मंच बना। लोक-नृत्य, पारंपरिक वेशभूषा, मांदर और बांसुरी की धुन, सामूहिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और शोभायात्राओं के माध्यम से जनजातीय समाज ने यह स्पष्ट किया कि वह कोई संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि जीवंत और गतिशील समाज है, जो भारत के वर्तमान और भविष्य दोनों में अपनी सम्मानजनक भागीदारी चाहता है।

आज दुनिया भर में ‘इंडीजीनियस कम्युनिटीज’ के अधिकारों पर चर्चा हो रही है। संयुक्त राष्ट्र की घोषणाएं भी यह स्वीकार करती हैं कि ऐसे समुदायों को अपनी विशिष्ट राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को बनाए रखने का अधिकार है। भारत जैसे बहुस्तरीय और बहुसांस्कृतिक देश के लिए यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

दिल्ली में आयोजित यह समागम केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं था। यह गांवों और जंगलों से राजधानी तक पहुंची उस आवाज का प्रतीक था, जो कह रही है कि विकास आवश्यक है, लेकिन विस्मृति स्वीकार नहीं। आधुनिकता चाहिए, लेकिन आत्मत्याग नहीं। शिक्षा चाहिए, लेकिन मातृभाषा की कीमत पर नहीं। राष्ट्रीय सहभागिता चाहिए, लेकिन सांस्कृतिक मिटाव के साथ नहीं।

भारत की आत्मा केवल महानगरों में नहीं बसती। वह सरहुल, करमा, मागे पोरोब, गोटुल की परंपरा, वन-देवताओं की आस्था और मांदर की धुन में भी जीवित है। यदि ये परंपराएं कमजोर होती हैं, तो केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक संरचना भी कमजोर होती है।

इसलिए आवश्यकता केवल प्रतीकात्मक सम्मान की नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत और सामाजिक प्रतिबद्धता की है। जनजातीय समाज की मातृभाषाओं को शिक्षा में स्थान मिले, ग्रामसभाओं को वास्तविक अधिकार मिलें, पेसा और फॉरेस्ट राइट्स एक्ट का प्रभावी क्रियान्वयन हो, जनजातीय युवाओं को रोजगार और नेतृत्व के अवसर मिलें और उनके बारे में निर्णय उनकी भागीदारी के बिना न लिए जाएं। हमारे देश की शक्ति केवल अर्थव्यवस्था या महानगरों से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक विविधता और जड़ों से भी निर्मित होती है। जनजाति सांस्कृतिक समागम इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है
X@hiteshshankar

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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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