जनजातीय सांस्कृतिक समागम : अस्मिता, अधिकार का आधुनिक उलगुलान
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जनजातीय सांस्कृतिक समागम : अस्मिता, अधिकार का आधुनिक उलगुलान

दिल्ली के लालकिले पर संपन्न विशाल जनजातीय सम्मेलन केवल पारंपरिक वेशभूषा, मांदल, खजरी आदि की थाप पर नृत्य और सांस्कृतिक वैभव का प्रदर्शन मात्र नहीं था, बल्कि यह भारत के मूल समाज द्वारा अपनी पहचान, संस्कृति और अधिकारों की शंखध्वनि थी। 

Written byडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानीडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
May 27, 2026, 07:50 pm IST
in भारत, मत अभिमत
जनजातीय सांस्कृतिक समागम में शामिल होतीं जनजातियां

जनजातीय सांस्कृतिक समागम में शामिल होतीं जनजातियां

भील और भारिया की दो कहावतें हैं – भील कहते हैं, “होने नी रेत, ने खोने नो डर” और भारिया कहते हैं “डोकरी मरिगे त कए घलो, बाकी राकस घर नई देखे।” इन दो जनजातीय कहावतों में लालकिले से जनजातीय संदेश का सार छिपा है। भील कहावत का अर्थ है – “जिसके पास सोने की रेत नहीं, उसे खोने का डर क्या?” जनजातीय समाज के लिए अब ये एक भूला-बिसरा चिंतन है। अब केवल भील नहीं अपितु देश के प्रत्येक जनजातीय, वनवासी, गिरिवासी समाज को पता है कि उसके पास खोने को एक स्वर्ण खदान से भी अधिक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है।

इस जनजातीय सांस्कृतिक संपदा, उनकी वन संपदा, उनकी श्रम संपदा का अनैतिक दोहन बहुत हुआ! और भारिया कहावत का अर्थ है – “बुढ़िया मर गई तो कोई बात नहीं, लेकिन राक्षस को घर का रास्ता नहीं देखना चाहिए”। जनजातीय समाज ने संसद के समक्ष सीना ठोककर कहा – “हमारे समाज को तोड़ने के लिए विदेशी शक्तियों, ईसाईयत, इस्लाम और वामपंथी विचारकों रूपी ‘राक्षस’ ने जो लाल जाल बुना है, उसे अब हमने पहचान लिया गया है। अब हम उसे अपने घर की राह नहीं दिखायेंगे।
लालकिले से यह जनजातीय उद्घोष है – “अब दोहन, शोषण और नहीं, अब मतांतरण और नहीं, अब सनातन की आलोचना सहन नहीं, अब हमारी भाषा, नृत्य, संगीत, पूजा पद्धति, का विरूपण सहन नहीं”।

पहचान और अधिकारों की शंखध्वनि

रविवार को दिल्ली के लालकिले पर संपन्न विशाल जनजातीय सम्मेलन केवल पारंपरिक वेशभूषा, मांदल, खजरी आदि की थाप पर नृत्य और सांस्कृतिक वैभव का प्रदर्शन मात्र नहीं था, बल्कि यह भारत के मूल समाज द्वारा अपनी पहचान, संस्कृति और अधिकारों की शंखध्वनि थी।  यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है सुदूर वनांचलों में रहने वाला हमारा जनजातीय समाज अपनी जल, जंगल और जमीन के साथ-साथ अपनी सनातन संस्कृति को बचाने के लिए चतुर्दिक संघर्ष कर रहा है।

राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं मुद्दे

वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा कई दशकों से उठाए जा रहे मुद्दे अब राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं। सम्मेलन की गठी हुई भाषा और प्रखर स्वर ने यह साफ कर दिया कि जनजातीय समाज अब मूक दर्शक नहीं, बल्कि अपने भाग्य का विधाता स्वयं बनने को आतुर है। लालकिले से वनवासी समाज ने प्रखरता, प्रचण्डता, प्रगल्भता और प्रबलता से ‘डीलिस्टिंग’ की अपनी पुरानी माँग का पुनरुद्घोष किया। आरएसएस सदा-सदा से यह कहता रहा है कि स्वधर्म छोड़कर ईसाइयत और इस्लाम को स्वीकारने वाले लोगों को अनुसूचित जाति, जनजाति से बाहर किया जाना चाहिए।

ईसाई मिशनरियों की साजिश

ईसाई मिशनरियों ने व्यापक स्तर पर भोले-भाले जनजातीय समाज को बहला-फुसलाकर, आर्थिक लालच देकर, दबावपूर्वक; जैसे भी हो वैसे भी मतांतरण कराया है। देश में सतत चल रहे इस षड्यंत्रपूर्ण मतांतरण से झारखंड, छत्तीसगढ़ पूर्वोत्तर राज्य में ऐसे अनगिनत उदाहरण हो गए हैं जहां मतांतरित लोग दोहरे लाभ उठा रहे हैं। वे एक ओर अल्पसंख्यक होने के नाते सरकारी योजनाओं और विदेशों से आने वाले भारी-भरकम फंड (FCRA) का लाभ लेते हैं, वहीं दूसरी ओर जनजातीय कोटे से आईएएस, आईपीएस और अन्य ऊंचे पदों पर आसीन होकर विदेशी एजेंडे को लागू करते रहते हैं।

यह कटु सत्य है कि अपनी मूल संस्कृति में रमे ठेठ वनवासी आज भी सुविधाओं से वंचित हैं। सम्मेलन में सीधे शब्दों में चेतावनी दी गई कि “जो अपनी संस्कृति और पुरखों के देवी-देवताओं को छोड़ चुका है, वह जनजातीय कहलाने का हकदार नहीं हो सकता।”

प्रायोजित टूलकिट गिरोह सक्रिय

कुछ वर्षों से देश में कई प्रायोजित टूलकिट गिरोह सक्रिय हैं, जो जनजातीय समाज को बहका रही है कि “तुम हिंदू नहीं हो, इसलिए जनगणना के फॉर्म में खुद को हिंदू मत लिखाना।” लालकिले से जनजातीय समाज ने इस नैरेटिव का प्रखरता से खंडन किया है। यह षड्यंत्र मूलतः भारत की जड़ों को कमजोर करने का है। जनजातीय समाज प्रकृति पूजक है, और सनातन की आत्मा भी प्रकृति पूजा ही है। हम तुलसी, पीपल, सूर्य, नदी और गोवर्धन की पूजा करते हैं; और हमारे वनवासी भाई ‘बूढ़ादेव’, ‘बड़ादेव’ और जंगलों की पूजा करते हैं। शब्दों का अन्तर है, भाव हमारे एक हैं। भगवान राम के वनवास काल में निषादराज, शबरी और वानर-भालू (जो वनों के निवासी थे) उनके सहचर बने। भगवान शिव स्वयं ‘किरात’ (वनवासी) रूप धारण करते हैं। ऐसे में जनजातीय समाज को सनातन से अलग दिखाना एक गहरा जियोपालिटिकल षड्यंत्र है। यह भारत के भीतर ‘सांस्कृतिक विभाजन’ की नींव रखने का प्रयास है।

‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ का विषैला पैटर्न उजागर

दिल्ली के इस मंच से वक्ताओं ने झारखंड के संथाल परगना और छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए ‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ के अत्यंत विषैले व घातक पैटर्न को उजागर किया।

असम और झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में बांग्लादेशी घुसपैठियों और एक विशेष समुदाय के लोगों द्वारा जनजातीय महिलाओं को बहला-फुसलाकर या जबरन निकाह करने के मामले तेजी से बढ़े हैं। यह प्रवृत्ति मप्र जैसे राज्यों में भी बड़ी तेजी से बढ़ी है।
चूंकि कानूनन कोई गैर-जनजातीय व्यक्ति जनजातीय की भूमि क्रय नहीं कर सकता, इसलिए इस कानून को धता बताने के लिए जनजातीय लड़कियों को मोहरा बनाया जाता है। निकाह के बाद जमीन उस महिला के नाम पर हस्तांतरित करा दी जाती है और परोक्ष रूप से उस भूमि पर नियंत्रण उस समुदाय का हो जाता है।

झारखंड की रुबिका पहाड़िन या अंकिता सिंह जैसी बेटियों के उदाहरण अभी ताज़ा हैं। यह केवल एक सामाजिक अपराध नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक जनसांख्यिकीय लड़ाई है जो आने वाले समय में देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।

पेसा कानून देता है अधिकार

वनवासी कल्याण आश्रम की प्रेरणा से ही मप्र में ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम’ यानी पेसा कानून (PESA Act, 1996) का कार्य भली भाँति कार्य कर रहा है। पेसा कानून जनजातीय समाज को जल, जंगल और जमीन पर संप्रभुता का अधिकार देता है। लेकिन दुखद यह है कि कई राज्यों में नियम न बनने के कारण या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह कानून केवल कागजों तक सीमित रहा। सम्मेलन में मांग की गई कि वन खनिजों की नीलामी, उद्योगों के लिए भूमि अधिग्रहण और स्थानीय विवादों के निपटारे में ग्राम सभा की अनुमति को अनिवार्य और सर्वोपरि बनाया जाए। इसके साथ ही, सरकारी नौकरियों और शिक्षा में मिल रहे आरक्षण का लाभ सुदूर अंचलों में बैठे अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुंचे, इसके लिए नीतियों के सरलीकरण पर जोर दिया गया।

आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का घोषणापत्र

दिल्ली में हुआ यह जनजातीय सम्मेलन केवल माँग, शिकायत और आवेदनों का प्रकटीकरण नहीं था, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का घोषणापत्र था। भगवान बिरसा मुंडा, टंट्या भील, रानी दुर्गावती और जतरा भगत जैसी महान विभूतियों की विरासत को याद करते हुए इस बात पर संकल्प लिया गया कि अब जनजातीय समाज अपनी पहचान के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।

अब समय आ गया है कि सरकारें, न्यायपालिका और नागरिक समाज इन चिंताओं को गंभीरता से लें। डीलिस्टिंग की मांग को ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता, और न ही लव जिहाद या मिशनरी षड्यंत्रों को ‘धर्मनिरपेक्षता’ के चश्मे से देखकर नजरअंदाज किया जा सकता है। अपनी जड़ों की ओर लौटता और सजग होता यह वनवासी समाज आज देश की मुख्यधारा को दिशा दिखाने की स्थिति में है। यदि आज हम उनके जल, जंगल, जमीन और सबसे बढ़कर उनकी ‘अस्मिता’ की रक्षा करने में विफल रहे, तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। यह सम्मेलन आधुनिक भारत में एक नए ‘उलगुलान’ (क्रांति) का शंखनाद है, जिसकी गूंज नीति-नियंताओं को लंबे समय तक सुननी होगी।

Topics: डीलिस्टिंगइस्लामिक कन्वर्जनजनजातियांजनजातीय सांस्कृति समागमईसाई मतांतरण
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
मूलतः मध्य प्रदेश के बैतूल से हैं. छह पुस्तकों का लेखन एवं दो पुस्तकों का संपादन. 'जनसंख्या असंतुलन एक चुनौती' एवं 'कांग्रेस मुक्त भारत की अवधारणा' विशेष तौर पर चर्चित. कविता संग्रह 'स्वप्न ही तो है कविता', साहित्य अकादमी से सम्मानित. विदेश मंत्रालय भारत सरकार में सलाहकार, छिंदवाड़ा यूनिवर्सिटी में कार्य परिषद् सदस्य रह चुके हैं. [Read more]
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