धरती के लगातार बढ़ते तापमान और मौसम के बदलते चक्र के बीच दुनिया अब एक ऐसे अदृश्य और विनाशकारी संकट के मुहाने पर खड़ी है, जिसकी आहट मात्र से मौसम वैज्ञानिक और वैश्विक नीति-निर्माता सिहर उठे हैं। वर्ष 2026-27 में बनने वाला ‘सुपर अल नीनो’ भारत सहित पूरी दुनिया के मौसम तंत्र को पूरी तरह ध्वस्त करने का संकेत दे रहा है। 45 डिग्री सेल्सियस के पार पारा और हीटवेव के बीच जलवायु मॉडल लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि यह आगामी अल नीनो पिछले कई दशकों का सबसे खतरनाक संकट हो सकता है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह घटना 1950 के बाद दर्ज सबसे शक्तिशाली घटनाओं में से एक बन सकती है, जो न केवल वैश्विक तापमान के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी बल्कि मानव समाज, वैश्विक अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और जल प्रबंधन पर भी गहरा आघात करेगी। ऐसे में यह समझना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि आखिर अल नीनो और सुपर अल नीनो क्या हैं, इनका वैश्विक व भारतीय परिप्रेक्ष्य में क्या प्रभाव पड़ता है और क्या 150 साल पहले आई ऐतिहासिक तबाही का मंजर फिर लौट सकता है?
क्या है अल नीनो और सुपर अल नीनो?
‘अल नीनो’ मूल रूप से स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘छोटा बच्चा’ या ‘बालक’। प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय परिसंचरण में होने वाले आवधिक बदलाव को यह नाम दिया गया है। सामान्य तौर पर यह प्रक्रिया हर 2 से 7 साल में दोहराई जाती है, लेकिन जब समुद्र का तापमान सामान्य से अत्यधिक ऊपर चला जाता है, तो यह ‘सुपर अल नीनो’ का रूप ले लेता है। प्रशांत महासागर का उष्णकटिबंधीय क्षेत्र, जो भूमध्य रेखा के दोनों ओर लगभग 23.5 डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश तक फैला हुआ है, पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का सबसे संवेदनशील और प्रभावशाली समुद्री क्षेत्र माना जाता है। सामान्य परिस्थितियों में यहां पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली व्यापारिक पवनें समुद्र की ऊपरी सतह के गर्म जल को इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और एशियाई तटों की ओर धकेलती रहती हैं। इसके परिणामस्वरूप दक्षिण अमेरिका के पेरू और इक्वाडोर तट के समीप समुद्र की गहराइयों से ठंडा जल ऊपर आता है, जिसे ‘अपवेलिंग’ कहा जाता है।
यही संतुलन एशिया में बादलों के निर्माण, भारतीय मानसून की सक्रियता और वैश्विक मौसम चक्र को स्थिर बनाए रखता है। किन्तु जब ये व्यापारिक पवनें कमजोर पड़ने लगती हैं या अपनी दिशा बदल देती हैं, तब प्रकृति का यह संतुलन डगमगाने लगता है। गर्म समुद्री जल वापस मध्य और पूर्वी प्रशांत की ओर फैलने लगता है और समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ऊपर पहुंच जाता है। यही स्थिति ‘अल नीनो’ कहलाती है। जब यह तापमान वृद्धि भयावह स्तर तक पहुंच जाए और केंद्रीय एवं पूर्वी प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाए, तब उसे ‘सुपर अल नीनो’ माना जाता है। वर्तमान संकेत वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रहे हैं। उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह और उसके नीचे गर्म पानी का विशाल भंडार तेजी से विकसित हो रहा है। यूएस नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन और यूके मेट ऑफिस के नवीनतम मॉडल संकेत दे रहे हैं कि इस वर्ष के अंत तक तापमान विसंगति 2.5 से 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकती है। यदि ऐसा हुआ तो यह केवल एक मौसमीय घटना नहीं बल्कि 21वीं सदी की सबसे बड़ी वैश्विक जलवायु चेतावनी साबित हो सकती है।
महासागर की हलचल से बदलता मानसून का भाग्य
प्रशांत महासागर में उठने वाली यह जलवायु हलचल केवल समुद्री घटना नहीं बल्कि पूरी पृथ्वी के मौसम तंत्र को प्रभावित करने वाली वैश्विक प्रक्रिया है। वैज्ञानिक इसे ‘टेलीकनेक्शन’ कहते हैं, अर्थात दुनिया के एक हिस्से में होने वाला परिवर्तन हजारों किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्रों के मौसम को नियंत्रित करने लगता है। जब अल नीनो के दौरान गर्म समुद्री जल दक्षिण अमेरिका के तटों की ओर फैलता है, तब वहां वायुमंडलीय दबाव तेजी से घटने लगता है। परिणामस्वरूप पेरू, इक्वाडोर और दक्षिणी अमेरिका के तटीय क्षेत्रों में घने बादल, मूसलाधार वर्षा, विनाशकारी बाढ़ और चक्रवाती तूफानों का खतरा बढ़ जाता है। इसके विपरीत, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के ऊपर उच्च वायुदाब का क्षेत्र विकसित होने लगता है। हवाओं और दबाव का यही असंतुलन हिंद महासागर तक फैल जाता है। भारत की ओर नमी लेकर आने वाली मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ने लगती हैं क्योंकि प्रशांत क्षेत्र से उठने वाली गर्म और शुष्क हवाएं अरब सागर और हिंद महासागर की नमीयुक्त हवाओं के प्रवाह को बाधित कर देती हैं। परिणामस्वरूप, मानसून की गति टूटने लगती है और भारत सहित पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में सूखा, जल संकट और भीषण गर्मी का दौर गहराने लगता है।
1877-78 के सुपर अल नीनो का काला अध्याय
आज जब वैज्ञानिक ‘सुपर अल नीनो’ की आशंका जता रहे हैं, तब मौसम विज्ञान की दुनिया बार-बार इतिहास के उस भयावह अध्याय की ओर लौट रही है, जिसे ‘ग्रेट फेमिन’ अर्थात महान अकाल के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1877-78 में पृथ्वी ने एक ऐसे विनाशकारी सुपर अल नीनो का सामना किया था, जिसने वैश्विक मौसम संतुलन को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया था। उस समय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था। यह केवल समुद्र के गर्म होने की घटना नहीं थी बल्कि पूरी मानव सभ्यता के लिए एक महाविनाशक चेतावनी बन गई थी। प्रशांत महासागर की इस असामान्य गर्मी ने दुनियाभर के वर्षा चक्र को तोड़ दिया। भारत में मानसून लगभग पूरी तरह विफल हो गया था। खेत सूख गए थे, नदियां सिकुड़ गई और करोड़ों लोग भुखमरी के मुहाने पर पहुंच गए। भूख, कुपोषण और महामारी के कारण अकेले भारत में एक करोड़ से अधिक लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। उत्तरी चीन में सूखे ने कृषि व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया जबकि ब्राजील में नदियां सूखने से जीवन ठहर गया। अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के जंगल धधक उठे थे और खाद्य संकट ने भयावह रूप ले लिया। भूख से कमजोर आबादी पर मलेरिया, हैजा, चेचक और पेचिश जैसी महामारियों ने कहर बरपाया। अनुमान है कि उस वैश्विक जलवायु आपदा में लगभग पांच करोड़ लोगों की जान गई, जो उस समय की विश्व जनसंख्या का लगभग चार प्रतिशत थी। कई इतिहासकार मानते हैं कि इस त्रासदी ने न केवल समाज और अर्थव्यवस्था को झकझोरा बल्कि औपनिवेशिक शासन की अमानवीय नीतियों को भी उजागर किया, जो इस मानवीय संकट के सामने पूरी तरह असफल साबित हुई थी।
सुपर अल नीनो से भारत के समक्ष चुनौतियां
भारत की आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संरचना का सबसे मजबूत आधार दक्षिण-पश्चिम मानसून है। देश की करोड़ों आबादी की आजीविका, कृषि उत्पादन, जल संसाधन और ऊर्जा व्यवस्था सीधे तौर पर मानसून पर निर्भर करती है। ऐसे में यदि 2026-27 के दौरान सुपर अल नीनो विकसित होता है तो उसका प्रभाव केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह भारत की खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता तक को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे भारत के लिए एक गंभीर जलवायु चेतावनी मान रहे हैं। सुपर अल नीनो का सबसे पहला और सबसे गहरा असर कृषि क्षेत्र पर दिखाई देगा। यदि मानसून कमजोर पड़ता है तो जून में सामान्य शुरुआत के बाद जुलाई, अगस्त और सितंबर में वर्षा में भारी गिरावट आ सकती है। इसका सीधा प्रभाव खरीफ फसलों पर पड़ेगा। धान, मक्का, दलहन, तिलहन और गन्ने जैसी फसलें पर्याप्त पानी के अभाव में बर्बाद हो सकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की आय घटेगी और खाद्यान्न उत्पादन कम होने से बाजार में अनाज, दाल और सब्जियों की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इससे महंगाई और खाद्य असुरक्षा का नया संकट पैदा होने की आशंका है।
कमजोर मानसून का दूसरा बड़ा खतरा जल संकट के रूप में सामने आएगा। भारत के अधिकांश बांध, झीलें और नदियां मानसूनी बारिश से ही भरती हैं। लगातार कम वर्षा होने पर जलाशयों का स्तर तेजी से गिर सकता है। इसका असर पीने के पानी और सिंचाई दोनों पर पड़ेगा। सतही जल की कमी के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन बढ़ेगा, जिससे पहले से संकटग्रस्त भूजल स्तर और नीचे चला जाएगा। कई शहरों और गांवों में पानी के लिए संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। ऊर्जा क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं रहेगा। कम बारिश के कारण जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होगा जबकि दूसरी ओर भीषण गर्मी के चलते बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएगी। जब तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाता है, तब एयर कंडीशनर, कूलर और पंपों के उपयोग में भारी वृद्धि होती है। उत्पादन और मांग के इस असंतुलन से बिजली ग्रिड पर दबाव बढ़ता है और व्यापक बिजली कटौती की स्थिति उत्पन्न होती है।
सुपर अल नीनो का सबसे खतरनाक प्रभाव हीटवेव और स्वास्थ्य संकट के रूप में सामने आ सकता है। अल नीनो वाले वर्षों में लंबी अवधि की लू अधिक तीव्र और जानलेवा हो जाती है। उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत के शहर कंक्रीट और डामर की वजह से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ में बदल सकते हैं, जहां रात में भी तापमान सामान्य से काफी अधिक बना रहता है। इससे बच्चों, बुजुर्गों, मजदूरों और गरीब तबकों पर सबसे अधिक खतरा मंडराएगा। हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय रोग और श्वसन संबंधी बीमारियों के मामलों में तेज वृद्धि हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुपर अल नीनो केवल एक मौसमी घटना नहीं बल्कि भारत के लिए बहुआयामी राष्ट्रीय चुनौती बन सकता है। इसलिए समय रहते जल संरक्षण, सूखा-रोधी कृषि, ऊर्जा प्रबंधन और स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करना अब अत्यंत आवश्यक हो गया है।
ग्लोबल वॉर्मिंग और सुपर अल नीनो का घातक कॉकटेल
वर्ष 1877 के विनाशकारी सुपर अल नीनो और आज की परिस्थितियों में सबसे बड़ा अंतर ग्लोबल वॉर्मिंग और अनियंत्रित कार्बन उत्सर्जन है। 19वीं सदी में औद्योगिक क्रांति अपने प्रारंभिक चरण में थी और पृथ्वी का औसत तापमान आज की तुलना में काफी कम था लेकिन वर्तमान समय में मानवीय गतिविधियों, जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग और वनों की कटाई ने धरती को पहले ही 1.1 से 1.2 डिग्री सेल्सियस तक गर्म कर दिया है। ऐसी स्थिति में यदि एक शक्तिशाली सुपर अल नीनो विकसित होता है, तो वह एक पहले से तपती हुई पृथ्वी और गर्म वायुमंडल पर असर डालेगा। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे अत्यंत खतरनाक ‘क्लाइमेट कॉकटेल’ मान रहे हैं। एडम स्केफ और जलवायु वैज्ञानिक फेलिसिटी गैंबल जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते जलवायु तंत्र ने मौसम पूर्वानुमानों को पहले से कहीं अधिक जटिल और अप्रत्याशित बना दिया है। अब इतिहास पूरी तरह भविष्य का मार्गदर्शक नहीं रह गया है क्योंकि जो अल नीनो कभी सामान्य प्रभाव छोड़ता था, वही आज कई गुना अधिक विनाशकारी रूप ले सकता है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि 2026 में एक अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो सक्रिय हुआ तो 2027 मानव इतिहास का अब तक का सबसे गर्म वर्ष बन सकता है।
क्या संभव है इतिहास का दोबारा महाविनाश?
सुपर अल नीनो की बढ़ती आशंकाओं के बीच वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि आज की दुनिया 1877 जैसी भयावह मानवीय त्रासदी को दोहराने के लिए उतनी असुरक्षित नहीं है। आधुनिक विज्ञान, तकनीक और वैश्विक सहयोग ने मानव समाज को पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्षम और सतर्क बना दिया है। आज मौसम विज्ञान अत्यंत उन्नत हो चुका है। अत्याधुनिक उपग्रह, सुपरकंप्यूटर और संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान मॉडल महीनों पहले ही अल नीनो की गतिविधियों का संकेत देने लगते हैं। इससे सरकारों और एजेंसियों को जल प्रबंधन, खाद्य भंडारण और आपदा तैयारी के लिए समय मिल जाता है। इसके अलावा, वर्तमान समय में खाद्य आपूर्ति प्रणाली पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत है। भारत जैसे देशों के पास विशाल बफर स्टॉक, आधुनिक गोदाम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली मौजूद है, जो संकट के समय करोड़ों लोगों तक अनाज पहुंचाने में सक्षम हैं। आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में भी दुनिया ने लंबी दूरी तय की है। एनडीआरएफ जैसी संस्थाएं सूखा, बाढ़, चक्रवात और महामारी जैसी स्थितियों से निपटने के लिए लगातार तैयार रहती हैं। साथ ही, आज वैश्विक सहयोग भी पहले से अधिक मजबूत है। संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय राहत एजेंसियां किसी भी मानवीय संकट की स्थिति में तुरंत खाद्य, स्वास्थ्य और आर्थिक सहायता पहुंचाने की क्षमता रखती हैं। यही कारण है कि चुनौतियों के बावजूद आधुनिक दुनिया इतिहास से सीखकर पहले से कहीं अधिक सजग और तैयार दिखाई देती है।
केवल चेतावनी नहीं, निर्णायक कार्रवाई का समय
सुपर अल नीनो केवल एक अस्थायी मौसमी घटना नहीं बल्कि पृथ्वी के बिगड़ते जलवायु संतुलन का गंभीर संकेत है। इससे उत्पन्न होने वाले सूखे, जल संकट, भीषण गर्मी और खाद्य असुरक्षा जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए दुनिया को तत्काल और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर ठोस रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले जल संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना आवश्यक है। भारत को वर्षा जल संचयन, पारंपरिक तालाबों और झीलों के पुनर्जीवन तथा ‘कैच द रेन’ जैसे अभियानों को व्यापक स्तर पर लागू करना होगा ताकि सूखे के समय पर्याप्त जल भंडारण उपलब्ध रह सके। कृषि क्षेत्र में जलवायु-अनुकूल खेती को बढ़ावा देना समय की मांग है। किसानों को कम पानी में उगने वाली फसलों, विशेषकर मोटे अनाज और दलहन की खेती के लिए प्रोत्साहित करना होगा। साथ ही ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का विस्तार करना आवश्यक होगा। हीटवेव से बचाव के लिए सभी राज्यों और शहरों में प्रभावी ‘हीट एक्शन प्लान’ लागू करने होंगे।
शहरी क्षेत्रों में हरित पट्टियों का विस्तार, कूल रूफ तकनीक और सार्वजनिक स्थानों पर पेयजल एवं प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था अनिवार्य बनानी होगी। ऊर्जा सुरक्षा के लिए सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों की क्षमता तेजी से बढ़ानी होगी ताकि जलविद्युत और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घट सके। इस संकट का स्थायी समाधान वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती और पेरिस समझौते के लक्ष्यों को गंभीरता से लागू करने में ही छिपा है। विज्ञान और आधुनिक प्रबंधन के कारण हम 150 वर्ष पुरानी मानवीय त्रासदी को रोकने में सक्षम हैं लेकिन प्रकृति के इस बढ़ते गुस्से को शांत करने के लिए हमें उपभोग के पैटर्न को बदलना होगा और पर्यावरण संरक्षण को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखना होगा। अन्यथा, ये चरम मौसमी घटनाएं भविष्य में और अधिक बारंबारता और क्रूरता के साथ दस्तक देती रहेंगी।
















