अफगानिस्तान: महिलाओं की आजादी पर तालिबानी चाबुक, छोटी बच्चियों की निकाह के समय चुप्पी का मतलब हाँ
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अफगानिस्तान: महिलाओं की आजादी पर तालिबानी चाबुक, छोटी बच्चियों की निकाह के समय चुप्पी का मतलब हाँ

तालिबान सरकार ने नया पारिवारिक कानून जारी कर बच्चियों की चुप्पी को निकाह की सहमति मानने का प्रावधान कर दिया। बाल-निकाह कानूनी, तलाक लगभग असंभव।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
May 25, 2026, 12:12 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
Afghan women

प्रतीकात्मक तस्वीर

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने एक बार फिर से लड़कियों के लिए अजीबोगरीब कानून बनाया है कि अगर कोई लड़की अपनी प्युबर्टी की उम्र होने पर निकाह पर चुप रहती है तो उसकी इस चुप्पी को ही उसकी रजामंदी माना जाएगा।

महिलाओं के लिए नरक बन चुके अफगानिस्तान मे अब बच्चियों को लेकर एक नया कानून लागू हो गया है। तालिबान सरकार ने एक नया पारिवारिक कानून जारी किया है, जिसके अनुसार अब अगर कोई भी कुंवारी नाबालिग लड़की अगर अपनी प्युबर्टी की उम्र होने पर निकाह के दौरान चुप रहती है तो उसकी इस चुप्पी को निकाह की रजामंदी मान लिया जाएगा।

बाल निकाह कानूनी तौर पर मान्य

तालिबान के शासनकाल में अब पहली बार बाल-निकाह भी कानूनी रूप से जायज बना दिए गए हैं। इसे लेकर कार्यकर्ताओं ने आगाह किया है कि यह नए कानून लड़कियों के लिए खतरनाक हैं और इन कानूनों के चलते लड़कियों और युवतियों का अपने शौहर से तलाक लेना मुश्किल हो जाएगा।

गार्डीअन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हालांकि, अफगानिस्तान में जबरन और छोटी बच्चियों के निकाह पर कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है, मगर कार्यकर्ताओं का यह कहना है कि हाल ही के सालों में, जब से लड़कियों की पढ़ाई तालिबान ने बंद कराई है, यह बहुत ही तेजी से बढ़ा है और अब 11 साल की लड़कियों की शादी भी की जा रही है। यह भी कहा जा रहा है कि बहुत ही ज्यादा गरीबी के चलते लोग अपनी बेटियों की शादी करने पर मजबूर हो गए हैं। हाल ही में बीबीसी ने भी इस पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी कि कैसे गरीबी के कहते बाप अपनी बेटियों की जल्दी शादी कर रहे हैं।

बीबीसी का चौंकाने वाला दृष्टिकोण

मगर बीबीसी ने जो रिपोर्ट का शीर्षक दिया है वह चौंकाता है। वह कुछ ऐसा है, जिसे पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता है। बीबीसी ने अपनी इस रिपोर्ट का शीर्षक दिया है “Selling children to survive: Afghan fathers forced to make impossible choices” अर्थात “जीवित रहने के लिए बच्चों को बेचना: अफ़गान पिता कर रहे हैं सबसे असंभव विकल्प”

इसे भी पढ़ें: क्यों पाकिस्तान में जला दिए गए एक गाँव के 100 घर? बर्बरता की इंतहा

इस रिपोर्ट को पढ़ने से पहले यह नहीं अनुमान लगाया जा सकता है कि यह लड़कियों को बेचने की कहानी है। यह बेटियों को बेचने की कहानी है। और यह सब इसी दुनिया में हो रहा है। रिपोर्ट आरंभ होती है कि कैसे अफगानिस्तान में गरीबी है और कैसे लोग काम की तलाश में बाहर निकले हुए हैं। मगर फिर अचानक से ही परिदृश्य बदलता है और सामने आता है कि कैसे बेबस पिता अपनी बेटियों को बेच रहे हैं। मगर शीर्षक है कि “बच्चों को बेचना” और जब बात बच्चों की आती है तो बच्चों को निस्संतान दम्पत्तियों को गोद देना समझ में आता है। मगर धीरे-धीरे इस लेख में सामने आता है कि यह लेख दरअसल बच्चों को बेचे जाने पर नहीं है, बल्कि यह बच्चियों को शादी के लिए बेचे जाने को लेकर है।

इसमें एक अब्दुल की कहानी है जो अपनी बेटियों को शादी या घर के कामों के लिए बेचना चाहता है। वह कहता है कि “अगर एक बेटी को बेच दूंगा तो मैं अपने बाकी बच्चों को कम से कम चार साल तक खिला सकूँगा!” इसमें एक अब्बा अपनी 5 साल की बेटी को उसके ही इलाज के लिए उसे बेच देता है। जब वह दस साल की हो जाएगी तो उसे जाना होगा।

जहां इस रिपोर्ट का फोकस पूरी तरह से बाल – निकाह पर होना चाहिए था, तो वहीं इसका पूरा का पूरा फोकस इस बात पर रहा कि कैसे एक बाप अपनी बेटी को बेच रहा है।

नए कानून

अब बात फिर से तालिबानी कानून की, जिसमें बच्ची की चुप्पी को ही निकाह की रजामंदी मान लिया है। गार्डीअन की रिपोर्ट के अनुसार चूंकि लड़कियों की तालीम पर तालिबान ने प्रतिबंध लगा दिया है तो 70% लड़कियां या तो जल्दी या जबरन निकाह में धकेल दी गई हैं और उनमें से 66% शादियाँ 18 साल से कम उम्र की लड़कियों की हुई हैं।

तालिबान के शासन में बाल-निकाह पर कोई रोक नहीं है। मगर अब तलाक को लेकर एक नया कानून आया है। इसमें यह प्रावधान है कि अगर कोई लड़की यह भी कहती है कि उसके निकाह में उसकी रजामंदी नहीं थी, तो भी उसे तलाक तब तक नहीं मिलेगा, जब तक उसका शौहर तैयार नहीं होता है।

अब अपने शौहर से तलाक तक नहीं ले सकेगी महिला

इस नए कानून में यह भी है कि एक महिला केवल इस आधार पर तलाक नहीं ले सकती है कि उसका शौहर मौजूद नहीं है या फिर वह उसे आर्थिक मदद नहीं दे रहा है। हालांकि, इन नए कानूनों को लेकर अफगानिस्तान में महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन किये हैं। कई महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कानून का इस आधार पर विरोध किया कि यह महिलाओं और बच्चों के खिलाफ एक सुनियोजित हिंसा का ही रूप है।

महिलाओं और बच्चियों के अधिकारों को कुचलने की कोशिश

महिलाओं का कहना है कि बच्चियों के सभी अधिकार छीन लेने के बाद अब तालिबान बच्चियों के निकाह को संस्थागत बनाना चाह रहा है। सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के बजाय महिलाविरोधी कदम उठा रहे हैं। देखना होगा कि एक समय में तालिबान का समर्थन करने वाले लोग इन महिला विरोधी कानूनों पर अपनी निष्पक्ष राय रखते हैं या नहीं?

Topics: तालिबान बाल विवाह कानूनतालिबान महिला विरोधी कानूननिकाहतालिबान नया कानून बाल निकाहचुप्पी मतलब हां
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