इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 20 साल पुराने यानी 2005 के रेप के मामले में इस्लाम उर्फ पलटू को बरी कर दिया है। उस पर अपनी 16 साल की बीवी से रेप का आरोप था, लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत ये रिश्ता वैध और कानूनी है और इसलिए अपनी बीवी के साथ संबंध बनाना रेप नहीं माना जा सकता। इसी के साथ कोर्ट ने निचली अदालत के 2007 के फैसले को पलट दिया, जहां इस्लाम को अपहरण और बलात्कार के आरोप में सात साल की सजा सुनाई गई थी। जस्टिस अनिल कुमार की बेंच ने कहा, तब के कानून में पति-पत्नी के बीच ऐसा रिश्ता अपराध नहीं था।
क्या है पूरा मामला?
मामला 2005 का है, उस वक्त लड़की की उम्र करीब 16 साल थी। इस्लामिक रीति-रिवाज से कालपी में इस्लाम से उसकी निकाह हो गई। निकाह के बाद दोनों भोपाल चले गए और एक महीना पति-पत्नी की तरह साथ रहे। लेकिन लड़की के पिता को ये मंजूर न था। उन्होंने थाने में शिकायत की कि इस्लाम ने उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर भगा लिया। IPC की धारा 363 (अपहरण), 366 (अभिकर्षण) और 376 (बलात्कार) के तहत केस दर्ज हो गया। पिता का कहना था कि बेटी नाबालिग थी, और ये सब जबरदस्ती हुआ। लेकिन कोर्ट में लड़की ने खुद बताया कि वो अपनी मर्जी से गई थी। कोई जबरदस्ती नहीं हुई।
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निचली अदालत का फैसला
वर्ष 2007 में इस्लाम को ट्रायल कोर्ट ने दोषी करार दिया था। इसके बाद उसे सात साल की सजा सुनाई थी। बाद में इस्लाम ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हायर कोर्ट का रुख किया। वो पहले से जमानत पर था। लड़की ने जिरह के दौरान कबूल किया कि वो खुद से इस्लाम के साथ भागी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 1973 के ‘ठाकोरलाल डी वडगामा बनाम गुजरात राज्य’ वाले फैसले का जिक्र किया, इसमें कहा गया है कि ‘ले जाना’ और ‘साथ चलना’ में फर्क है। यहां तो लड़की ने खुद चुना था। तो अपहरण और अभिकर्षण के आरोप झूठे साबित हुए।
वहीं रेप के मामले में कोर्ट ने ऑसिफिकेशन टेस्ट से पाया कि लड़की की उम्र 16 से ज्यादा थी। मुस्लिम लॉ में 15 साल से ऊपर की लड़की को शादी के लिए बालिग माना जाता है। तो निकाह वैध था। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ में फैसला दिया कि 18 साल से कम उम्र की बीवी से रिश्ता भी रेप है। लेकिन ये फैसला आगे के मामलों के लिए था, पुराने पर नहीं। 2005 में कानून ऐसा था कि 15 साल से ज्यादा उम्र की बीवी से पति का रिश्ता अपराध नहीं।

















