यह माना जाता है कि बद्रीनाथ धाम की यात्रा तभी पूरी होती है, जब पांचों बद्री धामों की यात्रा की जाए। इन्हें पंचबद्री कहा जाता है। ये हैं – आदिबद्री , ध्यानबद्री , योगबद्री , विशालबद्री और भविष्यबद्री।
इनमें आदिबद्री कुमाऊं के रास्ते गैरसैंण होते हुए बद्रीनाथ जाते मार्ग पर कर्णप्रयाग से 19 किलोमीटर पहले, समुद्र सतह से लगभग 3800 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। प्रसिद्ध चांदपुर गढी से यह मंदिर समूह 3 किलोमीटर दूर है। चांदपुर गढी उतराखण्ड के 52 गढ़ों में से एक प्रसिद्ध गढ़ था। किले के अवशेष आज भी मौजूद हैं। गढ़वाल में कत्यूरी राजाओं के हटने के बाद वहां कई गढ़पतियों का उदय हुआ था। इनमें पवार वंश सबसे शक्तिशाली था, जिसने चांदपुर गढ़ी में शासन किया। कनकपाल इस वंश का संस्थापक माना जाता है। उसने चांदपुर के भानु प्रताप की पुत्री से विवाह किया और खुद वहां का गणपति बन गया।
आदिबद्री का रहस्य
स्कंद पुराण में वर्णन है कि ऋषि नारायण ने जिस स्थान पर तपस्या की थी, उसी जगह का नाम आगे चलकर आदिबद्री हुआ। ऋषि की तपस्या से घबरा कर स्वर्ग के राजा इन्द्र ने उनके तप में विघ्न डालने के लिए कुछ अप्सराएं भेजीं, किंतु इसके जवाब में ऋषि ने अपनी जांघ पर प्रहार कर एक कन्या उतपन्न की जो उर्वशी कहलायी। इस प्रकार उन्होंने इन्द्र का मान मर्दन किया। आदिबद्री के समीप भराडी गाँव को उर्वशी की क्रीड़ास्थली कहा जाता है।
आदिबद्री रानीखेत-कर्णप्रयाग मोटर मार्ग पर स्थित है। कुमाऊं के रास्ते आने वाले यात्रियों का यह पहला पड़ाव है। इस मंदिर के दर्शन करने के बाद ही यात्री आगे की यात्रा आरंभ करते हैं। मैंने चार बार आदिबद्री के दर्शन किए हैं। गौरतलब है कि भगवान विष्णु का बद्री नाम वाला क्षेत्र तीनों लोकों में परम दुर्लभ है। विष्णु पंच बद्री के इन मंदिरों में अपने विभिन्न रुपों में विराजते हैं।
आदि बद्री के मंदिरों का निर्माण कत्यूरी राजाओं ने करवाया
आदिबद्री के मंदिर सातवीं-आठवीं सदी के आसपास कत्यूरी राजाओं द्वारा निर्मित बताए जाते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य ने अपनी दिगविजय यात्रा के दौरान कुछ मंदिरों का जीर्णोद्धार किया था। मूलरुप से यह 16 मंदिरों का समूह था, अब 14 मंदिर बचे हैं। आज यह मंदिर समूह भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीन हैं।
आदिबद्री के मंदिर शिखर शैली के हैं जो विशाल शिलाओं को काटकर और एक के ऊपर एक रखकर बनाए गए हैं। नींव पर से चकोर स्थापत्य शैली से इन्हें उठाया गया है। ऊपर जाकर शिखर पर ये धीरे-धीरे तंग हो जाते हैं और शिखर पर सूर्य शिला इस शैली को पूर्ण करती है। इतिहासकारों ने इन मंदिरों की बनावट को रेखा देवल शैली, पीढ़ा देवल शैली और खाकरा देवल शैली में बाँटा है। इन मंदिरों की बनावट जागेश्वर और द्वाराहाट के मंदिरों से मिलती जुलती है। इससे यह भी प्रतीत होता है कि ये सभी मंदिर एक ही काल सदी में निर्मित हुए हैं।
कैसे पहुंचें
हल्द्वानी से सुबह सात बजे चले तो एक या दो बजे के आसपास आप यहाँ पहुँच जाएंगे। ठीक दाईं ओर यह मंदिरों का समूह है। आदिबद्री एक मंदिर न होकर कई मंदिरों का समूह है जो एक ही प्रांगण में सिमटे हुए हैं। बीच में मुख्य मंदिर है, जिसकी ऊंचाई बीस फीट है। मंदिर के गर्भगृह में चार फीट की मूर्ति स्थापित है। काले पत्थर से बनी मूर्ति चार खंडों में विभक्त है, परन्तु मूर्ति के सौन्दर्य व सजीवता को देखकर नहीं लगता कि यह चार खंडों में विभक्त है।
यह मूर्ति खड़ी मुद्रा में है तथा इसके दाएं अधोहस्त में पदम नहीं है। यह हाथ वरद मुद्रा में है, जिसे रजो मुद्रा कहते हैं। मूर्ति के वृक्ष पर लक्ष्मी जी का प्रतीक श्री वत्स अंकित है। मूर्ति के आसपास कई उप मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। पहले ठीक ऊपर नवग्रह पंक्ति है। दाई तथा बाई ओर क्रमश: विष्णु व शिव पत्नियों सहित आसीन हैं। इसके ठीक ऊपर भगवान नारायण योगासन की मुद्रा में विराजमान हैं।
प्रस्तर खंडों से बनी हैं मंदिर की मूर्तियां
यहाँ सभी मंदिर आकर्षक मूर्तियों से युक्त है। सभी मूर्तियां प्रस्तर खंडों की बनी हैं। मुख्य मंदिर के ठीक सामने गरुड़ का मंदिर है। इसमें गरुड़ की द्बिबाहु मूर्ति है, जो बाया घुटना टेके दोनों हाथों में अमृत घट लिए हुए है। लक्ष्मी नारायण तथा सत्यनारायण के मंदिर छोटे परंतु अपनी स्थापत्य के साथ आकर्षित करते हैं। इन मंदिरों के अतिरिक्त अन्नपूर्णा देवी तथा महिषासुर मर्दिनी आदि के मंदिर भी कलात्मक शैली के लिए जाने जाते हैं।
आदिबद्री के मंदिरों में स्थित मूर्तियों ने तस्करों को बार-बार ललचाया है। यहाँ 1965, 1966 और 1967 मे लगातार तीन बार मूर्तियों की चोरी हुई। 1967 में मूर्ति चुरा कर ले जा रहे तस्करों को श्रृषिकेश में पकड़ लिया गया था। विदेश पहुंचने पर इन मूर्तियों की कीमत करोड़ों में होती। कई सालों तक यह मूर्ति विभिन्न अदालतों में रही। 1986 में 14 से 21 जनवरी तक आदिबद्री धाम में हुए एक समारोह में मूर्ति की पुनः प्राण प्रतिष्ठा हुई।
यहां लगता है नोठा कोथींग मेला
यहाँ एक बहुत प्रसिद्ध मेला ‘नोठा कोथीग ‘ भी लगता है, जिसमें कई गांवों के लोग भाग लेते हैं । यह मेला बैशाख माह के पांचवे अथवा ज्येष्ठ माह के पहले सोमवार से शुरु होता है। लोग परंपरागत वेशभूषा तथा ढोल नगाडों के साथ टोलियों में मंदिर आते हैं।
आदिबद्री चमोली जिले में है। यहां से चमोली 50 किलोमीटर और बद्रीनाथ 140 किलोमीटर दूर है। आदिबद्री के ठीक सामने एक छोटी नदी बहती है, जिसका नाम उतर नारायण गंगा है। यह नदी दुधातोली से निकलती है। उतर दिशा की ओर बहते हुए यह सिमली ( कर्णप्रयाग) मे पिंडर नदी मे मिल जाती है। पिंडर नदी कर्णप्रयाग मे अलकनंदा नदी से मिल जाती है। धापली गाँव के थपलियाल लोग मंदिर मे पुजारी का काम करते हैं। मंदिर की देखरेख के लिए मंदिर समिति भी बनाई गई है।

















