क्या भारतीय रुपया पर जानबूझकर हमला किया जा रहा है? क्या अब एक डॉलर के बदले 100 रुपये का मनोवैज्ञानिक आंकड़ा टूट जाएगा? क्या इससे भारत की अर्थव्यवस्था बाहरी मुद्रा बाजार की उथल-पुथल के सामने और कमजोर हो जाएगी? या फिर असली समस्या तेल और युद्ध की है?
आजकल रुपये का मूल्य कितना ऊपर-नीचे हो रहा है, इसे समझना मुश्किल हो गया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रणनीति पर देश में दो बड़े खेमे बन गए हैं।
एक तरफ सोलहवीं वित्त आयोग के चेयरमैन डॉ. अरविंद पनगढ़िया जैसे लोग कह रहे हैं कि 100 रुपये प्रति डॉलर का आंकड़ा ज्यादा गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। उन्होंने अपने कॉलम में लिखा कि “ये तो बस एक नंबर है”। वे रुपये को और गिरने देना चाहते हैं। दूसरी तरफ स्वदेशी जागरण मंच (SJM) जैसी संस्थाएं RBI से अपील कर रही हैं कि रुपये को 100 के पार न जाने दें। उनका कहना है कि अगर रुपया और कमजोर हुआ तो आयात महंगा हो जाएगा, कारखानों और व्यापारियों पर बोझ बढ़ेगा, सामान और सेवाओं की कीमतें आसमान छू लेंगी, लोगों की खरीदारी घटेगी और आखिरकार देश की विकास गति पर असर पड़ेगा। ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत का सपना भी प्रभावित होगा।
तेल की महंगाई और आयात बिल का दबाव
अप्रैल 2025 से अप्रैल 2026 के बीच कच्चे तेल की कीमतें 70% से ज्यादा बढ़ गईं। पिछले साल जहां एक बैरल तेल 67.62 डॉलर में मिल रहा था, वहीं अब यह 114.48 डॉलर पहुंच गया। हर एक डॉलर की बढ़ोतरी भारत के आयात बिल पर करीब एक अरब डॉलर का बोझ डालती है।
अगर औसतन 85 डॉलर प्रति बैरल भी रहा तो 2026-27 के बजट पर भारी दबाव पड़ेगा। राजकोषीय घाटा बढ़ेगा, ईंधन सब्सिडी का खर्चा चढ़ेगा और विकास कार्यों पर खर्चा घटाना पड़ सकता है। इसी वजह से प्रधानमंत्री ने पिछले दो हफ्तों में कसकर बेल्ट बांधने की अपील की है।
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रुपये की रक्षा कैसे करें?
कुछ लोग कहते हैं कि सरकार को डॉलर में बॉन्ड निकालने या महंगे NRI डिपॉजिट जुटाने जैसे रास्ते नहीं अपनाने चाहिए। डॉ. पनगढ़िया जैसे अर्थशास्त्री मानते हैं कि बेहतर है कि लंबे समय के निवेश आकर्षित किए जाएं, जरूरी नहीं आयातों को टाला जाए और भारत में व्यापार करना आसान बनाया जाए।
पिछले वित्त वर्ष में भारत में कुल 95 अरब डॉलर का विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) आया, लेकिन नेट (खुद का पैसा निकल जाने के बाद) सिर्फ 7.7 अरब डॉलर ही रहा। इस साल इसे 25 अरब डॉलर तक ले जाने की कोशिश करनी चाहिए।
करेंसी स्वैप और डॉलर ट्रेड
बैंकर और नीति-निर्माता अब मध्यम और लंबे समय के करेंसी स्वैप पर भी गंभीरता से सोच रहे हैं। बाजार की अस्थिरता का फायदा उठाते हुए सावधानी से पोजीशन लेना होगा। पिछले एक साल में RBI ने 53 अरब डॉलर बेचकर अच्छा मुनाफा कमाया है। अभी भारत के विदेशी मुद्रा भंडार 688.9 अरब डॉलर के आसपास हैं।
डॉलर से दूर जाने का रास्ता
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शायद विकासशील देशों खासकर भारत के ‘डॉलर मुक्त’ होने के विचार से खुश नहीं होंगे, लेकिन स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटान (ट्रेड सेटलमेंट) एक बड़ा मौका है। BRICS से आगे जाकर अन्य देशों के साथ भी अपनी-अपनी मुद्राओं में सौदे करने पर विचार किया जा सकता है।
सोना-चांदी का आयात टालना
2025-26 में सोने का आयात बिल 71.98 अरब डॉलर (702 टन) पहुंच गया था , जो कि पिछले साल से 24% ज्यादा है। परिवारों को थोड़ा इंतजार करके सोना-चांदी खरीदना चाहिए। इसमें देश की बड़ी आर्थिक लागत है।
दवाओं के लिए विदेशी मुद्रा
फार्मा सेक्टर भी विदेशी मुद्रा का बड़ा उपभोक्ता है। यहां जीवन रक्षक दवाओं और निर्यात के लिए बने उत्पादों को प्राथमिकता दी जा सकती है, बाकी को थोड़ा नियंत्रित किया जा सकता है।
‘वार चेस्ट’ बनाने का प्रस्ताव
एक बड़ी और स्मार्ट सोच यह है कि संघर्ष की स्थिति के लिए अलग से ‘वार चेस्ट’ (युद्ध कोष) बनाया जाए। जैसे हमने स्ट्रेटेजिक तेल भंडार बनाए, वैसे ही मुद्रा का अलग भंडार तैयार करें। हर साल RBI के कुछ हिस्से के सरप्लस को इस कोष में डाला जा सकता है। उदाहरण के लिए, RBI इस बार सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये का डिविडेंड दे रहा है। अगर हर साल एक लाख करोड़ रुपये इस वार चेस्ट में जाते हैं तो भविष्य के संकट में काम आएगा। मोदी सरकार को मुद्रा मोर्चे पर कई सारी चालें एक साथ चलानी पड़ सकती हैं।











