माता-पिता दोनों IAS अधिकारी तो बच्चों को आरक्षण क्यों? SC के ताजा निर्णय ने छेड़ी सामाजिक न्याय पर नई संवैधानिक बहस
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माता-पिता दोनों IAS अधिकारी तो बच्चों को आरक्षण क्यों? SC के ताजा निर्णय ने छेड़ी सामाजिक न्याय पर नई संवैधानिक बहस

क्या आरक्षण का लाभ वास्तविक लाभार्थी या अंतिम पंक्ति तक पहुंच रहा है ? या फिर जागरूकता, पहुंच, संसाधन और पीढ़ीगत लाभ उठाने वाले कुछ सीमित वर्ग ही बार-बार इस अवसर को प्राप्त कर रहे है ?

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
May 23, 2026, 07:37 pm IST
in विश्लेषण
Supreme court

सुप्रीम कोर्ट

भारत के गांव बस्तियों में आज भी ऐसे अनगिनत चेहरे हैं, जिनकी आंखों में शिक्षा का सपना है, पर संसाधन नहीं है। उनके भीतर प्रतिभा है पर अवसरों तक पहुंच नहीं है। विडंबना यह है कि आरक्षित समुदाय के भीतर आज ऐसी गहरी खाई बन गई है, जहां कुछ जातियां एवं परिवार प्रशासन, राजनीतिक, शिक्षा और आर्थिक संपन्नता की ऊंचाई तक पहुंच चुके हैं। वहीं दूसरी ओर इस समुदाय की अनेक जातियां और परिवार अब भी अंधेरे, अभाव, शिक्षा और सामाजिक उपेक्षा से जूझ रहे।

आरक्षण का उद्देश्य था सामाजिक शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग को आगे लाना, मुख्य धारा में जोड़ना , पर क्या आरक्षण का लाभ वास्तविक लाभार्थी या अंतिम पंक्ति तक पहुंच रहा है ? या फिर जागरूकता, पहुंच, संसाधन और पीढ़ीगत लाभ उठाने वाले कुछ सीमित वर्ग ही बार-बार इस अवसर को प्राप्त कर रहे है ? आज अनेक ऐसे बच्चे हैं, जिनके लिए विद्यालय अभी भी दूर है, जिनके घरों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की जानकारी नहीं पहुंचती, जिनके लिए आरक्षण केवल संविधान की पुस्तक में लिखा शब्द नजर आता है।

सर्वोच्च न्यायपालिका का निर्णय

यह पीड़ा है और साथ ही एक संवैधानिक प्रश्न है जिस पर देश की सर्वोच्च न्यायपालिका का ध्यान आकर्षित हुआ है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायलय ने आरक्षण व्यवस्था, क्रीमी लेयर तथा सामाजिक न्याय की के मुद्दे को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कई गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठाए। न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उजल भुयान की पीठ (Division Bench) ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक निर्णय पर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रश्न किया क्या सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से पर्याप्त उन्नति प्राप्त कर चुके परिवारों की अगली पीढ़ियों को भी आरक्षण का लाभ मिलता रहना चाहिए?

यह मामला कर्नाटक के कुरुबा समुदाय से जुड़े एक अभ्यर्थी का था, जिसे राज्य के पिछड़े वर्गों की श्रेणी II(A) में रखा गया है। अभ्यर्थी का चयन कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड में सहायक अभियंता (Assistant Engineer) के पद पर आरक्षित श्रेणी के अंतर्गत हुआ था। किन्तु बाद में जिला जाति एवं आय सत्यापन समिति ने क्रीमी लेयर में आने के कारण प्रमाणपत्र जारी करने से इंकार कर दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शशांक रत्नू ने सर्वोच्च न्यायालय में तर्क दिया कि सरकारी कर्मचारियों के मामले में क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल वेतन आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यह अधिक महत्वपूर्ण है कि माता-पिता ग्रुप A या ग्रुप B सेवा में हैं या नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार के 8 सितंबर 1993 के आदेश के अनुसार सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्तों को क्रीमी लेयर निर्धारण में नहीं जोड़ा जाना चाहिए। किन्तु सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक टिप्पणियाँ कीं। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि यदि माता-पिता दोनों IAS अधिकारी हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है। यदि सम्पन्न और उन्नत परिवारों के बच्चे भी लगातार आरक्षण लेते रहेंगे, तो हम कभी इस चक्र से बाहर नहीं निकल पाएंगे।

न्यायालय ने कहा कि जिन परिवारों ने आरक्षण का लाभ लेकर शिक्षा, आर्थिक सम्पन्नता और उच्च सामाजिक स्थिति प्राप्त कर ली है, उन्हें यह भी विचार करना चाहिए कि आरक्षण का उद्देश्य वास्तव में किन लोगों के लिए था।

पीठ ने तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चिंता व्यक्त की पहला जिन परिवारों ने सामाजिक और आर्थिक रूप से पर्याप्त प्रगति कर ली है, उन्हें भी लगातार आरक्षण का लाभ मिलता जा रहा है; दूसरा शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा और अवसरों तक पहुँच भी बढ़ती है; एवं तीसरा आरक्षण सामाजिक रूप से पिछड़ों के लिए आवश्यक है, किन्तु उसमें संतुलन भी होना चाहिए ताकि वास्तविक रूप से वंचित वर्ग पीछे न छूट जाएँ।

पूर्व निर्णयों की श्रंखला और संविधान

यह विवाद नया नहीं है, भारतीय न्यायपालिका लंबे समय से क्रीमी लेयर सामाजिक न्याय और वास्तविक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही है। सबसे पहले केरल राज्य बनाम एन एम थॉमस 1976 में न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर ने संकेत दिया था, कि आरक्षण केवल पिछड़े वर्गों के भीतर के ऊपरी तबके तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

सबसे ऐतिहासिक निर्णय इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया 1992 में आया इस मंडल आयोग मामला भी कहा जाता है। 9 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने ओबीसी आरक्षण को संवैधानिक रूप से वैध माना, किंतु क्रिमी लेयर के भी सिद्धांत को संवैधानिक मान्यता दी। न्यायालय ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य वास्तव में वंचित वर्गों को आगे लाना न कि पहले से उन्नत समूह को निरंतर लाभ पहुंचाना।

एम् नागराज बनाम भारत संघ 2006 में भी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आरक्षण लागू करते समय राज्य को सिद्ध करना होगा कि संबंधित वर्ग वास्तव में पिछड़ा है और उसका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है। फिर अशोक कुमार ठाकुर बना भारत संघ 2008 में भी सर्वोच्च न्यायालय ने पुन दोहराया कि क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखना की संवैधानिक की समानता की भावना के लिए आवश्यक है।

जनरैल सिंह बनाम लक्ष्मीनारायण गुप्ता 2018 में न्यायालय ने कहा क्रीमी लेयर सिद्धांत वास्तव में समानता के सिद्धांत का हिस्सा है, और आरक्षण का लाभ वास्तविक रूप से वंचित लोगों तक पहुंचना चाहिए।

हाल ही में पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जातियों के भीतर उपवर्गीकरण को वैध मानते हुए कहा कि एससी वर्ग एक समान नहीं है और उनके भीतर भी अत्यंत वंचित समुदायों को विशेष संरक्षण दिया जा सकता है। इस निर्णय ने संकेत दिया कि आरक्षण के भीतर भी न्याय पूर्ण वितरण की आवश्यकता है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने भी अपने विचार में कहा था कि जो वर्ग आरक्षण का बड़ा हिस्सा पहले प्राप्त कर चुके हैं, उन्हें उन समुदायों के लिए स्थान छोड़ना चाहिए जो अभी वास्तविक रूप से वंचित है।

संविधान में भी अनुच्छेद 14 अनुच्छेद 15 (4) अनुच्छेद 16 (4) अनुच्छेद 40 और अनुच्छेद 340 की व्याख्या भी इसी पर आधारित है। न्यायालय का मूल तर्क यह है कि आरक्षण को स्थाई वंशानुगत विशेषाधिकार नहीं बनाना है, यह उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जो वाकई सामाजिक शैक्षणिक और आर्थिक रूप से वंचित है। प्रश्न यह है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में उस अंतिम, उपेक्षित और कम प्रतिनिधित्व वाले व्यक्ति तक पहुंच पा रहा है जिसके लिए संविधान निर्माता ने सामाजिक न्याय का स्वप्न देखा था ?

वास्तविक वंचित को मिले हक

भारतीय संविधान में आरक्षण को सामाजिक न्याय का माध्यम बनाया है, निसंदेह लाखों लोगों के जीवन में परिवर्तन लाया गया ,उन्हें शिक्षा प्रशासन ,राजनीतिक और सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर प्रदान किया। किन्तु यह बात भी देखने में आती है कि आज अनेक जाति समूह, परिवार आरक्षण का लाभ लेकर आर्थिक शैक्षिक और प्रशासनिक रूप से काफी आगे निकल चुके हैं और धीरे-धीरे यह वर्ग अपने ही समुदाय के गरीब अशिक्षित और वंचित परिवार से दूर होते चले गए, जिनके साथ कभी उनकी सामाजिक परिस्थितियों समान थी। इसलिए कह सकते हैं कि अब आरक्षण के भीतर एक नया आंतरिक विभाजन दिखाई देता है, यह विभाजन जाति का नहीं है, यह विभाजन सामाजिक स्थिति, आर्थिक संपन्नता शिक्षा, जागरूकता और अवसरों तक पहुंच के आधार पर निर्मित हो रहा है।

एक और ऐसे लोग हैं जिनके पास उत्कृष्ट विद्यालय, संसाधन, मार्गदर्शन ,सामाजिक संपर्क और पीढ़ीगत सुरक्षा है, वही दूसरी ओर वे लोग हैं जिन्हें जो आज भी बुनियादी शिक्षा और प्रतिनिधित्व से वंचित है। एक प्रकार का आंतरिक भेदभाव जन्म ले रहा है, अत्यंत पिछड़े और कम जागरूक समूह पीछे छूटते जा रहे हैं। यही चिंता आज सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी में दिखाई दी है , इसलिए आरक्षण का उद्देश्य वास्तव में उन तक पहुंचना है जिनके लिए सामाजिक न्याय की कल्पना की थी, अन्यथा आरक्षण का उद्देश्य निष्फल हो जायेगा, साथ ही इसकी एक समय सीमा भी तय करनी होगी।

 

Topics: पाञ्चजन्य विशेषसुप्रीम कोर्ट आरक्षण निर्देशक्रीमी लेयरआरक्षण का लाभसुप्रीम कोर्टआरक्षण
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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