यदि संघ शक्तिशाली होता तो देश का विभाजन नहीं होता! सुनील आम्‍बेकर के कथन का निहितार्थ
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यदि संघ शक्तिशाली होता तो देश का विभाजन नहीं होता! सुनील आम्‍बेकर के कथन का निहितार्थ

डॉ हेडगेवार चाहते तो वह उस समय स्वतंत्र राजनीतिक मंच तैयार कर सकते थे, पर उन्होंने संगठन और चरित्र निर्माण को प्राथमिकता दी।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
May 23, 2026, 10:46 am IST
in संघ @100
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर और दिल्ली प्रांत संघचालक डॉ अनिल अग्रवाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर और दिल्ली प्रांत संघचालक डॉ अनिल अग्रवाल

भारत का विभाजन सिर्फ एक राजनीतिक निर्णय नहीं था, अपने समय में वह भारतीय समाज की सामूहिक चेतना को झकझोर देने वाली ऐसी त्रासदी थी, जिसने करोड़ों लोगों को विस्थापन, हिंसा और असुरक्षा की आग में झोंक दिया। वर्ष 1947 का वह दौर भारतीय इतिहास का सबसे पीड़ादायक अध्याय माना जाता है और जिसके संस्‍मरण आज भी हमें दुख के सागर में डुबो देते हैं। वस्‍तुत: इसी विभाजन की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर का यह कथन अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि “देश के विभाजन के समय संघ की शक्ति उतनी नहीं थी, अन्यथा विभाजन नहीं होता।”

देखा जाए तो यह कहना आरएसएस के संदर्भ तक सीमित न होकर उस व्यापक सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता की ओर संकेत करता है, जिसकी कमी उस समय देश ने महसूस की। दिल्ली में इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र द्वारा प्रस्तुत डॉक्यूमेंट्री ‘दिल्ली में संघ यात्रा’ के प्रदर्शन के अवसर पर सुनील आंबेकर ने जिस ऐतिहासिक संदर्भ को सामने रखा, वह स्वतंत्र भारत के निर्माण और विभाजन की त्रासदी के बीच समाज की भूमिका को समझने का अवसर था। उन्होंने बताया कि 1942 से 1947 के बीच दिल्ली और पंजाब में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तीव्र गति से विस्तार हुआ था। बड़ी संख्या में युवा और समाज के विभिन्न वर्ग संघ के साथ जुड़ रहे थे, किंतु तभी विभाजन का दंश देश के सामने आ खड़ा हुआ, उस कठिन समय में संगठन की शक्ति इतनी व्यापक नहीं बन पाई थी कि वह राष्ट्रीय स्तर पर उस निर्णय को प्रभावित कर सके।

समाज को संगठित करना था लक्ष्य

संघ की स्थापना वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने इस उद्देश्य से की थी कि भारतीय समाज को संगठित और आत्मविश्वासी बनाया जाए। डॉ. हेडगेवार स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे थे। उन्होंने कांग्रेस के आंदोलनों में भाग लिया और अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष भी किया। उन्होंने यह अनुभव किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं होगी, जब तक समाज संगठित और सांस्कृतिक रूप से जागृत नहीं होगा। इसी सोच के साथ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।

संगठन और चरित्र निर्माण पर जोर

यदि वे चाहते, तो उस समय वे स्वतंत्र राजनीतिक मंच तैयार कर सकते थे, पर उन्होंने संगठन और चरित्र निर्माण को प्राथमिकता दी। यही कारण है कि संघ ने प्रारंभ से ही शाखाओं के माध्यम से अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक समरसता का कार्य प्रारंभ किया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान संघ के स्वयंसेवकों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अनेक योगदान दिए। वर्ष 1930 के जंगल सत्याग्रह में डॉ. हेडगेवार स्वयं जेल गए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी अनेक स्वयंसेवकों ने भूमिगत रहकर आंदोलनकारियों की सहायता की। इतिहासकार और लेखक सी.पी. भिषीकर ने अपनी पुस्तक ‘केशव : संघ निर्माता’ में उल्लेख किया है कि डॉ. हेडगेवार स्वतंत्रता को सर्वोच्च राष्ट्रीय ध्येय मानते थे। (सुरुचि प्रकाशन;पृ 178-184)।

स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों की रक्षा की

यही वो कारण भी है जब संघ का वास्तविक योगदान विभाजन के समय सबसे अधिक दिखाई देता है। जब पंजाब, सिंध और बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा भड़क रही थी, लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर थे, उस समय संघ के स्वयंसेवक राहत और सुरक्षा कार्यों में सक्रिय दिखाई दिए। ट्रेनें लाशों से भरकर आ रही थीं, महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार हो रहे थे, पूरा उत्तर भारत भय और अराजकता के दौर से गुजर रहा था। ऐसे समय में स्वयंसेवकों ने शरणार्थी शिविर लगाए, भोजन की व्यवस्था की, महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास में सहायता की।

संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने स्वयंसेवकों को निर्देश दिया था कि पाकिस्तान में रह गए हिंदुओं की अंतिम व्यक्ति तक रक्षा सुनिश्चित की जाए। यही कारण था कि अगस्त 1947 के उथल-पुथल भरे दिनों में गुरुजी स्वयं कराची में उपस्थित थे और वहां स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन कर रहे थे। हजारों स्वयंसेवक सीमावर्ती क्षेत्रों में डटे रहे और अनेक ने अपने प्राणों की आहुति भी दी। संघ के सेवा कार्यों का उल्लेख एच.वी. शेषाद्रि की पुस्तक ‘कृतिरूप संघ दर्शन’ में विस्तार से मिलता है। पुस्तक में तथ्‍यों, एतिहासिक प्रमाणों के साथ वर्णित है कि विभाजन के दौरान स्वयंसेवकों ने पंजाब और दिल्ली में राहत शिविरों के संचालन में केंद्रीय भूमिका निभाई।(सुरुचि प्रकाशन;पृ 214-220)।

समाजिक कार्यों में भी योगदान

इसी प्रकार समीर चौगांवकर की पुस्तक ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : अहम् से वयम् की यात्रा’ में भी विभाजन के दौरान संघ की भूमिका का विस्तृत उल्लेख है। पुस्तक के अनुसार उस समय संघ के स्वयंसेवकों ने सिर्फ सुरक्षा कार्य ही नहीं किए, बल्कि विस्थापितों के पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापना में भी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई।(प्रभात प्रकाशन;पृ 132-145) ।

ऐसे में सुनील आंबेकर का कहना यह बताता है कि समाज जितना संगठित और जागरूक होगा, राष्ट्र उतना ही सुरक्षित रहेगा। विभाजन की त्रासदी राजनीतिक नेतृत्व की विफलता से अधिक समाज की असंगठित स्थिति का होना भी उसके पीछे एक कारण थी। यदि उस समय समाज में व्यापक स्तर पर सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता की शक्ति खड़ी हो चुकी होती, तो परिस्थितियां शायद अलग हो सकती थीं! पर यह संघ ही ही है, जिसने स्वतंत्रता के बाद भी स्वयं को शाखाओं के माध्‍यम से प्राकृतिक आपदाओं, युद्धों और सामाजिक संकटों के समय अपने स्वयंसेवकों को लगातार सेवा कार्य में लगे रहने के लिए प्रेरित किया और सतत कर रहा है।

भारत-चीन युद्ध के समय भारतीय सेना की मदद की

1962 के भारत-चीन युद्ध के समय स्वयंसेवकों ने सीमा क्षेत्रों में सेना की सहायता की। 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान भी राहत और व्यवस्था कार्यों में उनकी सक्रिय भूमिका रही। 1975 के आपातकाल में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघ के हजारों स्वयंसेवक जेल गए। इसके अतिरिक्त भूकंप, बाढ़, महामारी और अन्य प्राकृतिक आपदाओं में भी संघ की सेवा गतिविधियां लगातार दिखाई देती रही हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान भोजन वितरण, दवाइयों की व्यवस्था और अंतिम संस्कार तक में स्वयंसेवकों ने सक्रिय भूमिका निभाई और आज भी अनेक सेवा कार्य सीधे संघ स्‍वयंसेवकों के माध्‍यम से चल रहे हैं, यही कारण है कि संघ स्वयं को वैचारिक संगठन से अधिक भारतीयों के लिए समर्प‍ित सेवा और समाज संगठन का आंदोलन मानता है।

वस्‍तुत: दिल्ली में प्रस्तुत डॉक्यूमेंट्री ‘दिल्ली में संघ यात्रा’ इसी ऐतिहासिक यात्रा को प्रमाणों, संस्मरणों और दस्तावेजों के माध्यम से सामने लाती है। दिल्ली की पहली शाखा से लेकर विभाजन की विभीषिका और आज तक के विस्तार को इसमें दर्शाया गया है। इसके लिए 85 से अधिक पुस्तकों का अध्ययन, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार और अभिलेखागारों की सामग्री का उपयोग किया गया।

नई पीढ़ी के लिए महत्‍वपूर्ण संदेश

आज जब संघ अपने 100 वर्ष पूर्ण करने के उपलक्ष्‍य में शताब्‍दी वर्ष मना रहा है, तब राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर का यह कथन नई पीढ़ी के लिए भी महत्‍वपूर्ण संदेश देता है। संगठित समाज ही मजबूत राष्ट्र की आधारशिला बन सकता है। विभाजन की पीड़ा, स्वयंसेवकों का सेवा भाव और राष्ट्र निर्माण की भावना भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है, जोकि अतीत के उस पल के बारे में बताता है, जब प्रत्‍येक स्‍वयंसेवक के मन में एक ही भाव था, काश; (संघ) हम इतने ताकतवर होते कि देश का विभाजन नहीं होने देते! भविष्य के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। निश्‍चित ही संघ जितना अधिक सामर्थ्‍यवान होगा, यह तय है कि भारत भी उतना ही समय के साथ समर्थ रूप में हमें दिखाई देता रहेगा, क्‍योंकि संघ के स्‍वयंसेवक के लिए अपने राष्‍ट्र देवता के लिए सर्वस्‍व समर्पण ही उसका ध्‍येय है!

 

Topics: सुनील आम्बेकरभारत का विभाजनकेशव कुंजविभाजन की विभीषकासंघ डाक्यूमेंट्री
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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