कोलकाता। कोलकाता हाई कोर्ट ने बकरीद से पहले बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायालय ने कहा कि वह राज्य सरकार गोवंशों (गाय, बछड़ा, बैल) और भैंस पर लगाए गए प्रतिबंधों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने सरकारी अधिसूचना के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
इससे पहले हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरा याचिकाकर्ता रामकृष्ण पाल ने अदालत से मांग की कि गायों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। उन्होंने कहा कि बकरीद के नाम पर निरीह पशुओं की हत्या की जाती है। उनके अनुसार हिंदू धार्मिक परंपरा में ‘बलिदान’ का अर्थ पशु हत्या नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की पशु प्रवृत्तियों का दमन है।
दूसरे याचिकाओं में मोहम्मद जफर यासनी की ओर से दलील दी गई कि ईद-उल-अजहा के दौरान कुर्बानी को लेकर सरकार को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए और अधिकृत बूचड़खानों की सूची सार्वजनिक की जानी चाहिए। कहा कि बड़ी संख्या में अशिक्षित और अल्पशिक्षित लोग इस कार्य से जुड़े हैं, जिन्हें कानून की जानकारी नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि बकरीद 28 मई को है, तो इतने कम समय में नई व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करना कैसे संभव होगा। अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार को सभी पक्षों से चर्चा के बाद ही इस तरह का निर्णय लेना चाहिए था।
उल्लेखनीय है कि, राज्य में सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने 1950 के पशुधन कानून के कुछ प्रावधानों को सख्ती से लागू किया है। नए निर्देशों के अनुसार प्रशासनिक अनुमति के बिना मवेशियों का वध नहीं किया जा सकता और 14 वर्ष से कम आयु के पशुओं को काटने पर रोक है। इसके अलावा मांस विक्रय के लिए स्थानीय निकाय अथवा पशुपालन विभाग की लिखित अनुमति आवश्यक की गई है। विपक्षी पक्षों का दावा है कि इन नियमों के कारण बकरीद के दौरान कुर्बानी को लेकर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है।

















