वाराणसी: बीएचयू के सामाजिक विज्ञान संकाय की सेमेस्टर परीक्षा में पूछे गए तथाकथित “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” से संबंधित प्रश्न को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, काशी हिंदू विश्वविद्यालय इकाई ने इतिहास विभाग का घेराव कर विरोध प्रदर्शन किया। इसके उपरांत परिषद के प्रतिनिधिमंडल ने इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष से भेंट कर उन्हें ज्ञापन सौंपा तथा उक्त प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा एवं आवश्यक कार्रवाई की मांग की।
वैचारिक पूर्वाग्रहों से प्रेरित प्रश्न
परिषद का मानना है कि विश्वविद्यालयों में अकादमिक विमर्श के नाम पर वैचारिक पूर्वाग्रहों से प्रेरित प्रश्नों को बढ़ावा देना शिक्षा की मूल भावना के विपरीत है। परिषद ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और सभ्यता को एकांगी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने का प्रयास लगातार कुछ वर्गों द्वारा किया जाता रहा है। “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसी शब्दावली न केवल वैचारिक रूप से विवादित है, बल्कि इसका कोई स्पष्ट एवं सर्वमान्य अकादमिक आधार भी नहीं है। ऐसे प्रश्न विद्यार्थियों पर एक विशेष विचारधारा थोपने का प्रयास प्रतीत होते हैं।
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क्या कहा ABVP ने
इस घटना पर अभाविप बीएचयू इकाई के अध्यक्ष पल्लव सुमन ने कहा, “काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसी प्रतिष्ठित संस्था में विद्यार्थियों से वैचारिक रूप से प्रेरित प्रश्न पूछना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। विश्वविद्यालय ज्ञान, शोध और निष्पक्ष चिंतन का केंद्र होना चाहिए, न कि किसी विशेष विचारधारा के प्रचार का माध्यम। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को निरंतर अपराधबोध के दायरे में खड़ा करने का प्रयास अब छात्र समाज स्वीकार नहीं करेगा।”
वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, काशी हिंदू विश्वविद्यालय इकाई के इकाई सहमंत्री विकास कुमार ने कहा, “बीएचयू की पहचान भारतीयता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय मूल्यों से जुड़ी रही है। परीक्षा में इस प्रकार के प्रश्न पूछकर छात्रों के बीच भ्रम और वैचारिक विभाजन उत्पन्न करने का प्रयास किया गया है। परिषद मांग करती है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले की गंभीरता से समीक्षा करे तथा भविष्य में प्रश्नपत्र निर्माण में अकादमिक संतुलन और निष्पक्षता सुनिश्चित करे।”
दोषियों की जबावदेही तय करने की मांग
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि संबंधित प्रश्न की समीक्षा कर दोषी व्यक्तियों की जवाबदेही तय की जाए तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में किसी भी प्रकार के वैचारिक पूर्वाग्रह से प्रेरित प्रश्न परीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा न बनें।

















