पश्चिम बंगाल : सीमाओं से हटा ‘ममता’ का साया
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पश्चिम बंगाल : सीमाओं से हटा ‘ममता’ का साया

भारत के लिए पश्चिम बंगाल सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर का प्रवेशद्वार है। यही वजह है कि यहां की राजनीतिक दिशा का असर सीधे देश की सामरिक ताकत पर पड़ता है

Written byमृदुल त्यागीमृदुल त्यागी
May 20, 2026, 11:10 am IST
in विश्लेषण, पश्चिम बंगाल
एसआईआर के विरोध में तृणमूल के गुंडों ने एनएच-12 पर सेना का काफिला भी रोक दिया था। (फाइल फोटो )

एसआईआर के विरोध में तृणमूल के गुंडों ने एनएच-12 पर सेना का काफिला भी रोक दिया था। (फाइल फोटो )

एक गलत चुनाव, एक राष्ट्रविरोधी पार्टी यदि चुनाव जीत जाए, तो देश की सुरक्षा को किस तरह का खतरा हो सकता है, पश्चिम बंगाल इसकी मिसाल है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हर वह काम किया, जो राष्ट्र की एकता और अखंडता को प्रभावित कर सकता था। सिर्फ राजनीतिक नहीं, सामरिक फ्रंट पर भी। बांग्लादेश सीमा पर तारबंदी नहीं होने दी। पूर्वोत्तर को भारत से जोड़ने वाले महज 28 किलोमीटर चौड़े सिलीगुड़ी कॉरिडोर में भारतीय सेना की स्थिति मजबूत न हो, इसका हर इंतजाम ममता बनर्जी ने करने का प्रयास किया। ममता एक राज्य की मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक दुश्मन देश के तानाशाह की तरह बर्ताव कर रही थीं।

पश्चिम बंगाल में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार के शपथग्रहण के बाद पहली ही कैबिनेट बैठक में शुभेंदु अधिकारी सरकार ने जो पहला निर्णय लिया, वह यह था कि बांग्लादेश सीमा पर बॉर्डर फेंसिंग के लिए 45 दिन के अंदर जमीन सीमा सुरक्षा बल को हस्तांतरित कर दी जाएगी। पिछले 15 साल से पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार सीमा पर बाड़बंदी के काम में ही बाड़ बनी हुई थी।

बात सिर्फ बांग्लादेश की सीमा पर तारबंदी की नहीं है। पूर्ववर्ती सरकार ने हर वह काम किया, जो शायद किसी दुश्मन मुल्क की सरकार करेगी। इससे बड़ा अपराध क्या होगा कि किसी राज्य की सरकार देश की सुरक्षा को खतरे में डालने की हर संभव कोशिश करे। सिर्फ मुस्लिम, खासतौर पर बांग्लादेशी वोटबैंक को खुश करने के लिए ममता बनर्जी ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर (दिल्ली दंगे के आरोपी शरजील इमाम की भाषा में कहें, तो चिकन नेक) पर भारतीय फौज की तैयारियों और आधारभूत ढांचा तैयार करने में हर संभव विघ्न डाला। शरजील इमाम के जो इरादे थे, वह ममता बनर्जी की हकीकत थी।गत 11 मई को शुभेंदु सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में फैसला किया गया कि बांग्लादेश सीमा पर तारबंदी के लिए 45 दिन के अंदर जमीन बीएसएफ को सौंप दी जाएगी। इस मसले पर जो भी कानूनी बाधाएं हैं, उन्हें तुरंत दूर किया जाएगा। बांग्लादेश सीमा पर तारबंदी की योजना बहुत पुरानी है। लेकिन 2011 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार बनने के बाद इस पर ब्रेक लग गया। 2026 की शुरुआत तक बांग्लादेश सीमा का 378 किलोमीटर इलाका बिना बाड़बंदी का है। इसमें से 149 किलोमीटर पर तो काम ही शुरू नहीं हो सका था।

इस बाबत केंद्र सरकार के हलफनामों के अनुसार ममता बनर्जी ने रोड़ा अटकाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान के बावजूद भूमि अधिग्रहण के बजाय सीधे जमीन खरीदने की नीति अपनाई। अपने वोटबैंक को मजबूत करने के लिए यह एक तरीके से बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए देश का दरवाजा खुला छोड़ देने जैसा था। ममता सरकार ने बहाना बनाया कि वह किसानों की जमीन जबरन अधिग्रहण नहीं करेगी। कोलकाता हाईकोर्ट ने भी टिप्पणी की थी कि केंद्र सरकार ने जमीन के मुआवजे के पैसे राज्य सरकार को दे दिए हैं। इसके बावजूद बीएसएफ को जमीन नहीं दी गई।

न्यायालय ने इस बात पर भी नाराजगी जताई थी कि 127 किलोमीटर जमीन देने के आदेश के बावजूद सिर्फ 8 किलोमीटर जमीन ही दी गई है। लेकिन आप ममता को जानते हैं। वह खुद को देश, संविधान, कानून और अदालतों से ऊपर समझती थीं। हालत यह थी कि सरकार की शह पर जिलाधिकारी सीमांकन की फाइलें सालों से दबाए बैठे थे। खुद सोचिए, आखिर सीमा पर तारबंदी से ममता बनर्जी का क्या नुकसान था, खासतौर पर बांग्लादेशियों को सीमावर्ती इलाकों में बसाने के आरोपों के बीच। यह इलाका जाली नोटों, नशीले पदार्थों की तस्करी के साथ ही राष्ट्रविरोधी तत्वों की घुसपैठ का जरिया बना हुआ था।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर का खतरा

इससे भी अहम मसला पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी के आस-पास का संकरा भू-भाग है। यह भारत को उत्तर-पूर्व के आठ राज्यों — असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम — से जोड़ता है। इस इकलौते स्थलीय मार्ग की चौड़ाई कुछ जगहों पर सिर्फ 20 से 22 किलोमीटर ही है। मायने यह कि 20 किलोमीटर चौड़ाई वाला यह 60 किलोमीटर लंबा गलियारा नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की सीमाओं से घिरा हुआ है। इसके उत्तर-पूर्व में चीन की चुंबी घाटी है। यह कॉरिडोर पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, उत्तर दिनाजपुर आदि जिलों से गुजरता है। इसका सामरिक महत्व आप समझ ही सकते हैं। उत्तर-पूर्व भारत के साढ़े करोड़ नागरिकों की लाइफलाइन होने के साथ ही यह सैन्य रूप से अति संवेदनशील इलाका है।

पहले यह समूचा क्षेत्र हिंदू बहुल था। लेकिन इसे सिर्फ संयोग तो नहीं कह सकते कि पिछले दो दशक में बांग्लादेशी मुसलमानों और रोहिंग्याओं की घुसपैठ से इस इलाके का आबादी संतुलन बदल चुका है। उत्तर दिनाजपुर जिले में मुस्लिम आबादी 50 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। मालदा जिले में भी 52 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के साथ हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं। दार्जिलिंग में मुस्लिम आबादी 7 प्रतिशत के आस-पास है, लेकिन यह भी सिर्फ संयोग नहीं है कि फांसीदेवा, पानीटंकी जैसे गलियारे के सबसे संकरे क्षेत्र में मुस्लिम बहुल बस्तियां उग आई हैं।

बंगाल से सटे बिहार के किशनगंज में मुस्लिम आबादी 70 प्रतिशत हो गई है। इसके अलावा कटिहार, पूर्णिया और अररिया में भी आबादी संतुलन बदल चुका है। अररिया में तो देश के गृह मंत्री अमित शाह ने डेमोग्राफिक मिशन की घोषणा हाल ही में की है। यहां आबादी संतुलन का केंद्र सरकार अध्ययन कराने जा रही है। साथ ही इस साल इन जिलों में ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति लागू की गई है। मायने यह कि घुसपैठियों को ढूंढा जाए, उनकी सारी सुविधाएं छीनी जाएं और उन्हें वापस बांग्लादेश भेजा जाए। तो भी कुल मिलाकर यह सिर्फ संयोग तो हो नहीं सकता कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर का पूरा इलाका आबादी असंतुलन का शिकार हो गया है। ममता बनर्जी सरकार में हालात यह हो चुके थे कि मालदा और कई इलाकों से सैन्य काफिले रोकने के समाचार आते रहे। ये सैन्य काफिले इसी कॉरिडोर से होकर पूर्वोत्तर के राज्यों की ओर जा रहे थे।

सैन्य परियोजनाओं में बाधा

राजनीतिक विरोध एक तरफ, ममता बनर्जी का व्यवहार किसी दुश्मन मुल्क जैसा हो गया था। शायद मन में कहीं अलगाववाद का बीज रहा होगा, नहीं तो क्या कारण हो सकता है कि ममता बनर्जी ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सैन्य तैयारियों को नुकसान पहुंचाने की हर संभव कोशिश की।

भूमि अधिग्रहण की आड़ में ममता बनर्जी ने इस कॉरिडोर में भी अड़ंगे लगाए। भारतमाला परियोजना के तहत बनने वाले गोरखपुर-सिलीगुड़ी एक्सप्रेसवे और सिलीगुड़ी-गुवाहाटी कॉरिडोर के लिए बंगाल के हिस्से में भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया वर्षों तक लटकी रही। इतना ही नहीं, न जाने किन ताकतों के दबाव में एयर लिंक में भी ममता बनर्जी अड़ंगे लगाती रहीं।

बागडोगरा एयरपोर्ट का विस्तार इस कॉरिडोर की सुरक्षा के लिए बहुत अहम है। इससे न सिर्फ भारतीय वायुसेना को चीन व बांग्लादेश के ऊपर सामरिक बढ़त मिलती, बल्कि नागरिक उड्डयन लिंक भी मजबूत होता। यह एक तरह से एयर लाइफलाइन का काम करता। राज्य सरकार ने इसके विस्तार के लिए जमीन देने में सालों की देरी की। एक समय तो ऐसा आ गया था कि इसे पूर्णिया स्थांतरित करने की योजना बनने लगी थी।

रेल लिंक से भी न जाने क्यों ममता बनर्जी को दिक्कत थी। सिलीगुड़ी के पास 40 किलोमीटर अंडरग्राउंड रेलवे सुरंग का भी प्रस्ताव है। यह चीन और उपग्रहों की नजर से बचकर सेना के गतिविधि के लिए बहुत जरूरी है। यहां भी पश्चिम बंगाल की तत्कालीन सरकार असहयोग पर आमादा रही।

सिलीगुड़ी के पास सेवक में कोरोनेशन ब्रिज है। यह अंग्रेजों के समय का है और जर्जर हो चुका है। पिछले भूकंप के बाद इस पर बहुत भारी वाहनों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई। टैंक और तोपखाने के आवा-जाही के लिए यह पुल बेकार हो चुका है। यहां सेना को तुरंत नए पुल की जरूरत है, जिसमें ममता बनर्जी ने वन विभाग और विस्थापन का पेंच फंसा दिया।

इसके अलावा आपात परिस्थितियों में सेना के तेज आवा-जाही के लिए मेची नदी पर पुल की जरूरत थी। पुल का ढांचा तैयार हो गया, लेकिन एक किलोमीटर एप्रोच रोड पश्चिम बंगाल सरकार को देनी थी। यहां पश्चिम बंगाल सरकार ने चाय बागान का बहाना बनाकर यह जमीन देने से इंकार कर दिया।

चीन और बांग्लादेश फैक्टर

इधर ममता बनर्जी सैन्य परियोजनाओं में बाधा पैदा करती रहीं और उधर चीन अपनी स्थिति मजबूत करता रहा। चुंबी घाटी चीन का वह इलाका है, जो सिक्किम और भूटान के बीच सिलीगुड़ी कॉरिडोर के ऊपर स्थित है। यहां चीन ने हर मौसम में चलने वाली सड़कों का जाल बिछा दिया है। ये सड़कें टैंकों और भारी तोपखाने के परिवहन के हिसाब से बनाई गई हैं।

डोकलाम में 2017 के गतिरोध के बाद तो चीन ने और तेजी से काम किया। डोकलाम के पास स्थायी सैन्य चौकियां, हेलिपैड और बंकर बना लिए हैं। चीन ने तिब्बत की ओर से इस तरफ अपनी वायुसेना की ताकत को दोगुना कर दिया है। ल्हुंजे, टिंगरी और शिगात्से जैसे एयरबेसों का विस्तार किया गया है। ठीक सिलीगुड़ी कॉरिडोर को टारगेट करते हुए जे-20 स्टील्थ फाइटर एयरक्राफ्ट और ड्रोन तैनात किए गए हैं। भारतीय सेना की रसद लाइन काटने के लिए चीन ने कॉरिडोर के ऊपर एस-400 और अन्य उन्नत वायु रक्षा प्रणालियां तैनात कर दी हैं।

एलएसी के साथ-साथ चीन ने दोहरे उपयोग वाले गांव बसाए हैं। इन गांवों में दिखाने के लिए नागरिक रहते हैं, लेकिन जरूरत पड़ते ही इन्हें सैन्य छावनियों में तब्दील किया जा सकता है।

इतना ही नहीं, चीन सिर्फ उत्तर से ही नहीं, दक्षिण से भी कॉरिडोर को घेरने की कोशिश कर रहा है। बांग्लादेश के लालमुनीरहाट एयरबेस का चीन पुनर्निर्माण कर रहा है। यह सिलीगुड़ी से महज 135 किलोमीटर दूर है। बांग्लादेश की तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना में चीन की बढ़ती दिलचस्पी भी भारत के लिए चिंता का सबब बनी हुई है।

शुभेंदु अधिकारी सरकार के बंगाल में आने से पूरे सामरिक परिदृश्य में बहुत बड़ा बदलाव आया है। ममता बनर्जी सरकार का जाना कोई सामान्य राजनीतिक घटना नहीं है। इसके सामरिक और अंतरराष्ट्रीय नतीजे हैं। बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतें जिस तरीके से बौखला गई हैं, उससे भी यही संकेत मिल रहे हैं। ममता बनर्जी सरकार का जाना चीन को भी जरूर बेचैन कर रहा होगा, क्योंकि पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार के आने से इस पूरे इलाके में सैन्य परियोजनाओं को तेजी मिलेगी। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के सामरिक और अंतरराष्ट्रीय नतीजे बहुत दूरगामी होंगे। हमारी सीमाएं ज्यादा सुरक्षित होंगी, फौज ज्यादा मजबूत होगी।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषभारत बांग्लादेश सीमासीमा सुरक्षाWest Bengal Borderममता का सायाराजनीतिक प्रभावसीमाओं से नियंत्रणराजनीतिक बदलावबंगाल की राजनीतिसीमा विवाद TMCममता बनर्जी
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