केरल में नई सरकार के गठन के साथ ही इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का दबदबा तेजी से बढ़ने लगा है। सबसे पहले पार्टी ने अपने पसंद के सतीशन को मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी से नियुक्त करवाया है। इसके बाद आईयूएमएल अपने मनमुताबिक मंत्रिमंडल का भी आवंटन करवा रही है। इसकी बानगी तब देखने को मिली जब कांग्रेस पार्टी के पास आईयूएमएल से लगभग तीन गुनी सीट होने के बावजूद भी मंत्रिमंडल में कांग्रेस की भागीदारी आईयूएमएल के अपेक्षा महज दो गुना ही है।
कांग्रेस पर हावी मुस्लिम लीग
आईयूएमएल के पांच, वहीं कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री सहित 11 मंत्रियों को ही मंत्रिमंडल में स्थान मिला। कांग्रेस की इस हालत के लिए खुद मुख्यमंत्री सतीशन ने दुख जताते हुए मंत्रिमंडल में कांग्रेस के लिए सीमित अवसरों पर निराशा व्यक्त की है। सतीशन कैबिनेट में आईयूएमएल की ओर से पी.के. कुन्हालीकुट्टी, एन. शमसुद्दीन, के.एम. शाजी, पी.के. बशीर और वी.ई. अब्दुल गफूर को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। मंत्रिमंडल चुनना मुख्यमंत्री का अधिकार होता है, मगर आईयूएमएल ने खुद ही मंत्रियों का नाम मुख्यमंत्री को सौंपा है।
IUML ने अपने पांच लोगों को बनाया कैबिनेट मंत्री
आईयूएमएल को पांच कैबिनेट सीटें लेने के साथ ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सैयद सादिक अली शिहाब थंगल ने कहा है कि सरकार का आधा कार्यकाल पूरा होने के बाद परक्कल अब्दुल्ला को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा। सैयद सादिक अली शिहाब थंगल का यह बयान सीधा मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र में दखलअंदाजी है। थंगल का यह कथन स्पष्ट करता है कि सतीशन नाममात्र के ही मुख्यमंत्री रहेंगे और निर्णय आईयूएमएल के हाथों में होगा। पाञ्चजन्य ने पूर्व में ही आईयूएमएल द्वारा कांग्रेस पार्टी पर अधिक दबाव और महत्वपूर्ण निर्णय लेने की भविष्यवाणी की गई थी।
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सतीशन केवल डमी सीएम बनकर रह गए
आईयूएमएल के बातो को सतीशन को मानने के अलावा कोई भी दूसरा उपाय नहीं है। 2019 में राहुल गाँधी द्वारा वायनाड लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के साथ ही आईयूएमएल की राजनीतिक ताकत एकाएक काफी बढ़ गई है और यह पार्टी न सिर्फ कांग्रेस बल्कि, गाँधी परिवार को भी निर्देशित करने लगा। 2019 और 2024 में राहुल गांधी के इस्तीफा देने के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा इस सीट से उपचुनाव जीतकर सांसद हैं। वायनाड लोकसभा सीट के अंतर्गत सात विधानभा की सीटों में थिरुवम्बाडी और एरंड विधानसभा सीटों पर आईयूएमएल का कब्ज़ा है और आईयूएमएल इस तथ्य से अवगत है कि कभी भी गाँधी परिवार अब उससे अलग होकर राजनीती नहीं कर सकती हैं। इसका कीमत आईयूएमएल गाँधी परिवार और कांग्रेस पार्टी से वसूल रही है।
















