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सरकारी मंदिरों के पुजारियों को न्यूनतम वेतन और आर्थिक सुरक्षा मिले: सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई करेगा सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के पुजारियों, सेवादारों और कर्मचारियों के वेतन, सुविधाओं और आर्थिक सुरक्षा पर। अश्विनी उपाध्याय की PIL में केंद्र-राज्यों को न्यायिक आयोग बनाने की मांग।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
May 18, 2026, 06:53 am IST
inभारत
supreme court

सुप्रीम कोर्ट

सदियों से मंदिरों में भगवान की सेवा करने वाले पुजारी, सेवादार और कर्मचारी आज खुद आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं। सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में काम करने वालों की दयनीय स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई करने वाला है। वकील अश्विनी उपाध्याय ने इस मामले में जनहित याचिका दायर की है।

याचिका क्या मांग करती है?

याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की अपील की गई है कि वे एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति बना दें। यह समिति सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के पुजारियों, सेवादारों और अन्य कर्मचारियों के वेतन, सुविधाओं और आर्थिक सुरक्षा की पूरी समीक्षा करे।

याचिकाकर्ता का कहना है कि जब कोई राज्य सरकार मंदिर का प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण ले लेती है, तो वहां काम करने वाले लोग नियोक्ता-कर्मचारी का रिश्ता बन जाते हैं। ऐसे में उन्हें सम्मानजनक वेतन और आजीविका का अधिकार मिलना चाहिए, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है।

इसे भी पढ़ें: प्रधानमंत्री मोदी को 31वां अंतरराष्ट्रीय सम्मान, स्वीडन ने ‘रॉयल ऑर्डर ऑफ पोलर स्टार’ से किया सम्मानित

कई राज्यों में हालत खराब

याचिका में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु के उदाहरण दिए गए हैं। इन राज्यों के सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों और सेवादारों को अकुशल मजदूरों के बराबर भी न्यूनतम वेतन नहीं मिल पा रहा है। महंगाई के इस समय में यह स्थिति उन्हें बहुत मुश्किल में डाल रही है।

तमिलनाडु में फरवरी 2025 में एक मंदिर में पुजारियों को आरती की थाली में दक्षिणा लेने पर रोक लगा दी गई। कई पुजारियों का पूरा परिवार इसी दक्षिणा पर निर्भर रहता है। ऐसी रोक उनके लिए रोजी-रोटी का संकट बन गई।

पुजारियों की स्थिति

पुजारी परिवारों की जिंदगी मंदिर से जुड़ी होती है। वे पूजा-पाठ, आरती, उत्सव और मंदिर की दिन-रात की देखभाल करते हैं। लेकिन जब सरकार मंदिर संभालती है तो अक्सर इन लोगों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। उन्हें न तो नियमित वेतन मिलता है और न ही कोई अन्य लाभ जैसे पेंशन, बीमा या छुट्टी।

अश्विनी उपाध्याय की याचिका में इस दोहरे मापदंड की बात की गई है। एक तरफ सरकार मंदिर की संपत्ति और आय का नियंत्रण रखती है, दूसरी तरफ सेवा करने वालों को उचित पारिश्रमिक नहीं देती।

सुनवाई की डिटेल

सोमवार यानी आज जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ इस याचिका पर सुनवाई करेगी। यह मामला सिर्फ वेतन का नहीं है, बल्कि उन लोगों की गरिमा और सम्मान का भी है जो समाज को आध्यात्मिक दिशा देते आए हैं। याचिका में जोर दिया गया है कि पुजारियों को भी कर्मचारी के रूप में देखा जाए और उन्हें न्यूनतम वेतन व अन्य जरूरी सुविधाएं मिलनी चाहिए, ताकि वे अपनी सेवा बिना किसी चिंता के जारी रख सकें।

Topics: सरकारी मंदिर पुजारी स्थितिसुप्रीम कोर्ट मंदिर नियंत्रणमंदिर पुजारीसुप्रीम कोर्ट पुजारी वेतन याचिकापुजारी न्यूनतम वेतन
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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