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स्क्रीन बना रही बीमार

एम्स के हालिया अध्ययन में सामने आया है कि एक साल से कम उम्र में मोबाइल की आदत ऑटिज्म को बढ़ा रही है, ऐसे बच्चे संवाद संबंधी दिक्कतों का सामना करते हैं

Written byनिशि भाटनिशि भाट
May 16, 2026, 12:40 pm IST
in भारत, स्वास्थ्य

एक साल से कम उम्र के बच्चे मोबाइल की आदत की वजह से ऑटिज्म के शिकार हो रहे हैं। हाल ही में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। इसमें यह पाया गया कि एक साल से कम उम्र के नवजात को अक्सर माता-पिता खाना खिलाते समय, सुलाते हुए या फिर किसी काम में व्यस्त होने पर मोबाइल थमा देते हैं, जिसकी वजह से तीन साल की उम्र तक ये बच्चे ऑटिज्म के शिकार हो रहे हैं।

एम्स में मोबाइल नहीं देखने वाले बच्चों और स्क्रीन देखने वाले बच्चों के बीच आनुपातिक अध्ययन किया गया, जिसके गंभीर परिणाम सामने आए। दरअसल, कम उम्र में स्क्रीन पर लंबे समय तक नजर टिकाए रखने से बच्चे का न्यूरल डेवलपमेंट (दिमाग की कोशिकाओं का विकास) बुरी तरह प्रभावित होता है।

एम्स के बाल तंत्रिका विभाग की प्रोफेसर शेफाली गुलाटी ने बताया कि बच्चों की जिद के आगे माता-पिता बहुत जल्दी हार मान लेते हैं। कम उम्र में मोबाइल स्क्रीन का लंबे समय तक संपर्क बच्चों के दिमागी विकास को बाधित करने के साथ ही व्यवहार संबंधी परेशानियां बढ़ा रहा है। अध्ययन में पाया गया कि तीन साल की उम्र में ऐसे बच्चों में ऑटिज्म पाया गया, जिन्हें एक साल की उम्र में स्क्रीन टाइम अधिक था। इसमें लड़कियों की अपेक्षा लड़कों की संख्या अधिक देखी गई। डॉ. गुलाटी ने बताया कि अध्ययन के परिणाम काफी चिंताजनक हैं।

यदि सही समय पर बच्चों से मोबाइल को दूर नहीं किया गया, तो भविष्य में बेहतर तर्कशक्ति वाले बच्चों की संख्या कम हो जाएगी। दरअसल, मोबाइल देखते समय बच्चों का दिमाग केवल रिसीव कर रहा होता है, जो भी जानकारी या रील दिखाई जा रही हैं। कम उम्र में मस्तिष्क का बेहतर विकास इस चीज पर अधिक निर्भर करता है कि बच्चा अधिक समय ऐसी गतिविधियों में बिताए, जो इंटरैक्टिव या क्रिया-प्रतिक्रिया वाली हों। रोना बंद करने के लिए माता-पिता बच्चों के साथ खुद समय बिताएं, पार्क में ले जाएं या फिर खाना खिलाते और सुलाते समय खुद बच्चों से तोतली भाषा में बात करें। इससे उनके दिमाग के बेहतर विकास की संभावना कई गुना बढ़ सकती है।

क्या है ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) बच्चों की एक व्यवहार संबंधी दिक्कत है, जिसे जन्म लेने के बाद से लेकर ढाई साल की उम्र तक पहचाना जा सकता है। अमूमन चिकित्सकों का मानना होता है कि यदि बच्चा 12 से 18 महीने के बीच बोलना नहीं सीख पाता है, तो यह ऑटिज्म का बहुत ही प्रारंभिक लक्षण हो सकता है। जबकि विशेषज्ञ ऑटिज्म की पहचान के लिए कई तरह की व्यवहार और संचार संबंधी दिक्कतों पर नजर रखने की सलाह देते हैं, जिन्हें डॉक्टर के पास पहुंचने से पहले ही जांचा जा सकता है।

इस बीमारी में मानवीय पहलू को अहम माना जाता है, क्योंकि ये बच्चे सामान्य बच्चों की तरह ही होते हैं, लेकिन अपनी बात और भावनाओं को सही तरह से व्यक्त नहीं कर पाते। कई बार विशेष तरह का व्यवहार भी रिपीटेटिव होता है, जैसे बहुत अधिक गुस्सा, चुप रहना, अकेले में रहना या फिर दोस्तों के साथ अधिक नहीं घुलना-मिलना आदि।

व्यावहारिक दिक्कत

इस तरह के बच्चों की सही परवरिश में मानवीय व सामाजिक पहलुओं पर अधिक ध्यान देने की जरूरत होती है। इसके लिए शुरुआत घर से ही होती है। परिवार में यदि किसी एक बच्चे को ऑटिज्म है, तो अन्य बच्चों में भी इसकी संभावना बढ़ सकती है। दरअसल, जन्म के बाद डेढ़ से तीन साल के बीच बच्चों में संवाद क्षमता विकसित होती है, जिसमें मस्तिष्क में सेल्स कनेक्ट या न्यूरल वायरिंग का अहम योगदान होता है। किसी कारणवश गर्भ में ही या जन्म के बाद की पारिस्थितिकी तंत्र की वजह से इसका विकास सीमित या कम होता है। एम्स में इस बात का भी अध्ययन किया जा रहा है कि क्या प्रदूषण, प्रिजर्वेटिव या फिर गर्भवती का मेटल्स के साथ अधिक एक्सपोजर इसकी वजह हो सकता है? कई बार रेडिएशन, मोबाइल या लैपटॉप पर अधिक काम, अधिक उम्र में विवाह आदि भी पुरुष के शुक्राणुओं की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। उन्हें एपिजेनेटिक प्रभाव कहा जाता है।

आसान होगी पहचान

एम्स में एक बुकलेट तैयार की गई है, जिसके जरिए बच्चों के व्यवहार को पहचान कर ऑटिज्म की पहचान की जा सकती है। आंकड़ों की अगर बात करें, तो पहले यह समस्या लड़कियों में कम और लड़कों में अधिक पाई जाती थी, लेकिन एम्स द्वारा वर्ष 2020 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार अब दोनों ही वर्गों में यह समस्या बढ़ रही है। एम्स चाइल्ड न्यूरोलॉजी विभाग ने आईआईटी दिल्ली, आईआईटी कानपुर और सी-डैक के साथ मिलकर ऐसे टूल्स तैयार किए हैं, जिनसे इन बच्चों की बौद्धिक क्षमता को पहचाना जा सकता है। इसके अलावा ऐसे भी टूल्स तैयार किए जा रहे हैं, जिससे आशा वर्कर, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता या फिर स्कूलों में अध्यापिकाएं भी इन बच्चों की देखभाल में योगदान दे सकें।

लत छुड़ाने को रखने पड़ रहे बाउंसर

स्मार्टफोन और गेमिंग का नशा बच्चों हिंसक बना रहा है, यहां तकि बच्चे फोन से मना करने पर अपने ही माता-पिता पर हमला भी कर रहे हैं। गुजरात में कुछ ऐसे ही मामले सामने आए हैं। स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि माता—पिताओ अपने बच्चों को मोबाइल देखने से रोकने के लिए ‘बाउंसर’ तक रखने पड़ रहे हैं, इसके लिए उन्हें भारी-भरकम खर्च करना पड़ रहा है।

ऐसा ही एक मामला अहमदाबाद में सामने आया। जहां एक 16 वर्षीय लड़की के माता-पिता ने उसकी निगरानी के लिए बाउंसर रखे हैं। लड़की के घर पर चार बाउंसर तैनात किए गए हैं, जो दो अलग-अलग शिफ्टों में काम करते हुए 24 घंटे उस पर कड़ी नजर रखते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वह किसी भी स्थिति में मोबाइल फोन का इस्तेमाल न कर सके। यह परिवार बच्ची की लत छुड़ाने के लिए हर महीने करीब 65 हजार रुपए का भारी-भरकम खर्च उठा रहा है।

डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे मामले केवल सामान्य रूप से फोन चलाने के नहीं हैं, बल्कि एक बेहद गंभीर लत के हैं। इस लड़की पर एक फोटो-शेयरिंग एप (जैसे इंस्टाग्राम) का जुनून इस कदर सवार हो चुका था कि वह लगातार अपनी तस्वीरें पोस्ट करने और इंटरनेट पर अजनबियों के साथ बातचीत करने में ही डूबी रहती थी। स्थिति तब और भी ज्यादा चिंताजनक हो गई, जब उसने सोशल मीडिया पर बने इन अनजान दोस्तों से मिलने के लिए अपने माता-पिता की नजरों से बचकर छुप-छुपकर घर से बाहर निकलना शुरू कर दिया।

फोन छीनने पर हो जाती थी बेहद हिंसक

जब उसके माता-पिता ने बढ़ते स्क्रीन टाइम को देखते हुए उसका फोन वापस लेने की कोशिश की तो लड़की का बर्ताव बेहद हिंसक हो गया। वह गुस्से में बेकाबू हो जाती थी, यहां तक कि घर के कीमती इलेक्ट्रॉनिक सामान और उपकरण तोड़ने लगती थी। एक बार उसने गुस्से में घर का टीवी चकनाचूर कर दिया और बॉलकनी माइक्रोवेव ओवन तक नीचे फेंक दिया था। इतना ही नहीं उसने अपनी मां पर भी हमला कर दिया।

ऐसा ही एक मामला सूरत में भी पिछले दिनों सामने आया था। सूरत में मोबाइल गेमिंग के नशे ने एक 17 साल के लड़के को इस कदर हिंसक बना दिया कि उसने अपने पिता की डांट का बदला बेजुबान जानवर से लेना शुरू कर दिया। मोबाइल छीनने से वह इतना अधिक हिंसक हो गया था कि उसने अपना सारा गुस्सा परिवार के पालतू कुत्ते पर उतारना शुरू कर दिया और उसे बुरी तरह पीटने लगा। उस पर काबू पाने के लिए परिवार को मजबूरी में 9 महीनों तक दो शिफ्ट में 8 बाउंसर तैनात करने पड़े थे।

फोलिक एसिड का अहम योगदान

वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. वीना कालरा ने बताया कि ऑटिज्म के विभिन्न कारणों पर लंबे समय से शोध किया जा रहा है। मोबाइल के अधिक इस्तेमाल के साथ ही गर्भधारण के समय फोलिक एसिड की कमी को भी ऑटिज्म में अहम माना गया है। दरअसल, गर्भधारण के तुरंत बाद महिलाओं को नौ महीने तक लगातार फोलिक एसिड लेने की सलाह दी जाती है, जिसे मस्तिष्क के विकास में अहम माना गया है। कई बार कई वजहों से फोलिक एसिड की मात्रा शरीर में तो पर्याप्त होती है, लेकिन दिमागी पानी, जिसे मस्तिष्क द्रव्य कहा जाता है, उसमें फोलिक एसिड की कमी हो जाती है, जो बाद में ऑटिज्म की वजह बनती है। गर्भस्थ शिशु के दिमाग को पर्याप्त फोलिक एसिड मिल रहा है या नहीं, इसके लिए फोलिक एसिड रिसेप्टर ऑटो एंटीबॉडी टेस्ट किया जाता है, जिसे कुछ समय पहले ही भारत में शुरू किया गया है। यह टेस्ट पॉजिटिव आने पर कुछ दवाओं के माध्यम से फोलिक एसिड के स्तर को सुधारा जा सकता है।

यूनिसेफ की डॉ. दीपा अग्रवाल ने बताया कि ऑटिज्म से प्रभावित सभी बच्चों में अलग तरह की क्षमता होती है। कोई गाने में बेहतर होता है, तो कोई अच्छा पेंटर होता है। यूनिसेफ ऐसी ही किसी सेलिब्रिटी को ऑटिज्म जागरूकता के लिए ब्रांड एंबेसडर बना सकता है, जिससे लोगों में इस व्यवहारिक दिक्कत के प्रति समझ बढ़ेगी और ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए अधिक सहयोगी वातावरण बनाने में मदद मिलेगी। टिज्म या ऐसी किसी मानसिक बीमारी, जैसे स्लो लर्नर या फिर डाउन सिंड्रोम आदि से प्रभावित बच्चों के लिए सरकारी नौकरी में चार प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है, जिसमें एक प्रतिशत सीट ऑटिस्टिक बच्चों के लिए रखी जाती है। इसके अलावा समस्या का वैध प्रमाणपत्र दिखाने पर रेलवे आरक्षण और स्कूल प्रवेश में सहायता मिलती है। ऑटिज्म होने पर कोई भी निजी स्कूल बच्चों को प्रवेश देने से मना नहीं कर सकता।

इसके साथ ही इन्हें आयकर में भी छूट मिलती है। सीडीसी (सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन) के 2025 के अनुसार प्रत्येक 31 में एक व्यक्ति का एएसडी का इलाज किया गया। इस बीमारी में कोमॉर्बिडिटीज यानी इससे जुड़ी बीमारियां, जैसे स्लो लर्नर, अटेंशन डेफिसिएंसी और बच्चों का एग्रेसिव व्यवहार आदि को भी ध्यान में रखकर पहचान की जाती है। ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों को चिकित्सक के साथ ही भाई-बहन या घर के अन्य सदस्यों के सहयोग की आवश्यकता होती है।

इसके लिए स्कूलों को भी विशेष रूप से सचेत किया जाता है कि वे ऐसी किसी भी समस्या से ग्रसित बच्चों के व्यवहार संबंधी परेशानियों को ध्यान में रखते हुए पढ़ाई में सहयोग करें।

लड़के हैं अधिक शिकार

भारत में दो से नौ साल की उम्र में प्रत्येक 65 में से एक बच्चे में ऑटिज्म की पहचान होती है। इससे पहले के आंकड़ों में प्रत्येक 68 में एक बच्चे में ऑटिज्म पाया जाता था। पहले भारत में इसे दुर्लभ बीमारी माना जाता था, लेकिन अब इसकी संख्या बढ़ रही है। नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन के अनुसार भारत में इस समय 1.8 से 2 करोड़ बच्चे ऑटिज्म से प्रभावित हैं। अधिकतर मामलों में इसकी पहचान देरी से होती है, जबकि शीघ्र जांच सही इलाज के लिए जरूरी है। लड़कियों की अपेक्षा लड़के इसके अधिक शिकार पाए जाते हैं।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषस्क्रीन टाइमऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डरन्यूरल डेवलपमेंटसंवाद संबंधी दिक्कतेंइंटरैक्टिव गतिविधियाँबौद्धिक क्षमताप्रारंभिक लक्षणफोलिक एसिडलैपटॉपसामाजिक अलगावमोबाइल
निशि भाट
निशि भाट
निशि भाट, स्वास्थ्य क्षेत्र में बीते 15 साल से काम कर रही हैं, कोविड टीकाकरण से लेकर पोलियो मुक्त भारत सहित तमाम विषयों पर आपके लेख प्रकाशित हो चुके हैं। हिंदुस्तान, अमर उजाला सहित जनसत्ता में स्वास्थ्य पत्रकार के तौर पर लंबे समय तक काम किया है। [Read more]
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