नई दिल्ली। वैश्विक महिला संगठन विश्वमांगल्य सभा द्वारा आयोजित उत्तर भारत की राष्ट्रीय प्रबोधन बैठक का भव्य समापन समारोह नई दिल्ली स्थित अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में संपन्न हुआ.
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने “युगानुकूल मातृत्व (Contemporary Motherhood)” विषय पर प्रबुद्ध मातृशक्ति को संबोधित किया.

सरसंघचालक जी ने अपने भाषण की शुरुआत चुटीले अंदाज में करते हुए कहा कि मातृत्व जैसे विषय पर पुरुषों का बोलना अपने आप में एक विरोधाभास जैसा है, क्योंकि इस पर प्राकृतिक एकाधिकार महिलाओं का ही है.

उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे महापुरुषों ने भारतीय परंपरा और मातृत्व के चिंतन को पूरी समग्रता से समाज के सामने रखा है.

“मातृत्व की शाश्वत बातें युग के साथ नहीं बदलतीं” : सरसंघचालक
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने मातृत्व की मूल अवधारणा और उसके महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सृष्टि के आदिकाल से ही संपूर्ण जीव-जगत का आधार मातृत्व रहा है.

“मातृत्व की शाश्वत बातें वही रहती हैं, वे युग के अनुसार नहीं बदलतीं; बल्कि उन्हीं मूल्यों के कारण युग बदलने वाले महापुरुष जन्म लेते हैं। सृष्टि का सृजन, संवर्धन, पोषण और निरंतरता बिना मातृत्व के संभव ही नहीं है। मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका विचार है, और उस विचार को सही दिशा देने का कार्य माता ही करती है।” – डॉ. मोहन भागवत, सरसंघचालक, RSS

उन्होंने आगे कहा कि माता ही बच्चे की पहली गुरु होती है और जीवनभर भावनात्मक संबल का सबसे बड़ा केंद्र बनी रहती है. आज के दौर में परिवार को समय देना और बच्चों से सतत संवाद बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि बच्चे उपदेशों से नहीं बल्कि माता-पिता के आचरण का अनुकरण करके सीखते हैं.

पश्चिमी अंधानुकरण के बजाय भारतीय परिवार व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत
अपने संबोधन में सरसंघचालक जी ने समाज में फैले भ्रमों और सांस्कृतिक चेतना पर भी विचार रखे:
सरसंघचालक जी के प्रमुख संदेश:
- संस्कृति पर अटूट विश्वास: भारतीय संस्कृति के बारे में वर्षों तक भ्रम फैलाया गया, जबकि हमारी परंपराएं अत्यंत प्रबल और प्रत्यक्ष हैं. हमें अपने इतिहास और ज्ञान पर भरोसा रखना चाहिए.
- विविधता में एकता: एकता ही सत्य है और विविधता के बीच एकात्म भाव ही भारतीय जीवनशैली का मूल संदेश है.
- अंधानुकरण से बचाव: विदेशी जीवनशैली को बिना विचार किए अपनाने के बजाय भारतीय दृष्टिकोण के आधार पर परिवार व्यवस्था को मजबूत बनाना समय की मांग है.
14 देशों और 33 प्रांतों में फैली ‘विश्वमांगल्य सभा’ की यात्रा
23–24 जुलाई को विश्व युवक केंद्र में आयोजित उत्तर भारत की इस दो दिवसीय प्रबोधन बैठक में विभिन्न राज्यों की लगभग 280 प्रमुख महिला प्रतिनिधियों ने भाग लिया.
समापन सत्र में विभिन्न क्षेत्रों से आई 900 से अधिक प्रबुद्ध महिलाएं मौजूद रहीं, जबकि संवाद कार्यक्रम के लिए 2,000 से 2,500 महिलाओं ने अग्रिम पंजीकरण कराया था.

संगठन का परिचय और प्रमुख उपलब्धियां:
- स्थापना: 19 फरवरी 2010 को नागपुर में 600 वर्ष पुरानी श्री दत्त पीठ परंपरा के 18वें पीठाधीश्वर परम पूज्य आचार्य स्वामी जीतेंद्रनाथ जी महाराज के मार्गदर्शन में हुई.
- वैश्विक विस्तार: भारत के 33 प्रांतों में सक्रिय होने के साथ-साथ अमेरिका और नीदरलैंड सहित विश्व के 14 देशों में संगठन कार्य कर रहा है.
- विशाल जनसमर्थन: वर्तमान में लगभग 6 लाख मातृशक्ति इस संगठन से जुड़कर शिक्षा, संस्कार, सामाजिक जागरण और सेवा कार्यों में योगदान दे रही हैं.
- व्यापक अभियान: वर्ष 2026 में संगठन ने देश के 23 प्रांतों में विशेष अधिवेशन आयोजित किए, जिनमें 37,000 से अधिक महिलाओं ने हिस्सा लिया.

विश्वमांगल्य सभा “संस्कार, सामर्थ्य, सदाचार और सेवा” के चतुःसूत्री सिद्धांतों पर कार्य करते हुए “मातृ निर्माण से राष्ट्र निर्माण” के संकल्प को साकार कर रही है.












