कभी-कभी इतिहास पत्थरों में भी लिखा होता है। शिलाओं में, खंडहरों और ध्वंस में भी। गुजरात के पश्चिमी तट पर प्रभास पाटन में जब अरब सागर की लहरें सोमनाथ के तट से टकराती हैं, तो ऐसा लगता है कि मानो वे किसी टूटे हुए वाक्य को बार-बार पूरा करने की कोशिश कर रही हों। कोई पन्ना, जिसे पलटना जरूरी है, जिसे पढ़ना जरूरी है। सोमनाथ वही पन्ना है।
हजार वर्षों तक यह पन्ना आधा खुला रहा और आधा दबा दिया गया। आजादी के बाद और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कालखंड में, उस पन्ने को इतिहास की धूल से निकालकर पूरा पढ़ने का प्रयास हुआ, क्योंकि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं है। वह भारत का स्मृति-स्थल है। ऐसी स्मृति, जो घायल करती है, झकझोरती है और उठ खड़े होने की शक्ति भी देती है। क्यों सोमनाथ भारतीय संस्कृति पर पड़े आघात का एक शिलालेख है? क्यों इस शिलालेख को एक राष्ट्र के रूप में हमें पढ़ना चाहिए? और कैसे गुजरात के इस समुद्री तट से बहुत दूर उत्तर प्रदेश के अयोध्या में खड़ी हुई एक नई संरचना, इसी ऐतिहासिक पीड़ा का एक उत्तर बनकर सामने आती है?
सोमनाथ: पहला नाम, पहला घाव
सोमनाथ द्वादश ज्योतिर्लिंग परंपरा में सबसे पहले आता है-‘सौराष्ट्रे सोमनाथं च…’। यह ‘पहला’ क्रम मात्र नहीं, यह बताता है कि आस्था, भूगोल और पहचान भारत में कैसे एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं। लेकिन इतिहास की विडंबना देखिए, जिस स्थान को परंपरा ‘पहला’ के रूप में याद रखती है, उसी स्थान को बार-बार पहले आघात के प्रतीक के रूप में भी स्मरण किया जाता है। 1026 में गजनी का महमूद सोमनाथ पहुंचा, मंदिर ध्वस्त किया गया, लूट, हिंसा हुई। इतिहासकारों के विवरण बताते हैं कि यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक संपन्न सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र भी था। इस ध्वंस की स्मृति सदियों तक समाज की चेतना में रिसती रही।
सोमनाथ पर आघात का अर्थ
आघात का अर्थ सिर्फ पत्थरों का टूटना मात्र नहीं, समाज के अर्थ, प्रतीक व निरंतरता का विखंडन है। मंदिरों पर हमले धार्मिक अपमान से आगे सांस्कृतिक आघात थे। लेकिन इतिहास की एक जिम्मेदार दृष्टि यह भी कहती है कि मध्यकालीन अभियानों में धर्म-सत्ता-धन-प्रतिष्ठा-रणनीति एक साथ थे। इसलिए एक ही कारण थोप देना इतिहास को सरलीकृत करना होगा। संतुलन यही है कि पीड़ा की स्मृति को नकारा न जाए और न ही घटनाओं को आक्रांताओं द्वारा लिखे गए संकीर्ण इतिहास में कैद कर दिया जाए। सोमनाथ इसी संतुलन का प्रतीक है। गजनवी ने सोमनाथ मंदिर तोड़ा, किंतु समाज की आस्था नहीं टूटी। सदियों तक उस आस्था ने मंदिर की पवित्रता को बनाए रखा।
आज़ादी के बाद: पुनर्निर्माण और बहस
जब भारत स्वतंत्र हुआ तो प्रश्न उठा- क्या टूटे मंदिर फिर खड़े होंगे? 1951 में सोमनाथ का पुनर्निर्माण साकार हुआ, जिसमें सरदार पटेल, के.एम. मुंशी व कुछ अन्य नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन यह केवल मंदिर निर्माण नहीं था, बहस थी-राज्य व धर्म की दूरी की, संस्कृति व आधुनिकता और वैश्विक छवि की। यहीं, जवाहर लाल नेहरू का पत्राचार सामने आया, जिसमें उन्होंने लिखा, “मुझे इस बात की चिंता है कि देश-विदेश में धारणा न बने कि सोमनाथ समारोह सरकारी मामला है। संसद में प्रश्न उठेंगे और सरकारी खर्च उचित नहीं लगेगा।”
नेहरू का मानना था कि राज्य को धार्मिक प्रतीकों से दूर रहना चाहिए। इसके विपरीत, राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के लिए सोमनाथ सांस्कृतिक-सामाजिक अवसर था। वे समाज व आस्था से जुड़े थे और अन्य उपासना स्थलों पर भी जाते थे। इसे वे नैतिक रूप से उचित मानते थे। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने उन्हें सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम से दूर रहने को कहा। यहां दो विचार, या कहें दो भाषाएं टकराईं-एक राज्य व सेकुलर छवि की और दूसरी समाज व सांस्कृतिक आत्मविश्वास की। जब एक ही घटना दो भाषाओं में पढ़ी जाती है तो इतिहास केवल घटना नहीं रहता, बहस बन जाता है।
नेहरू और कांग्रेस की विडंबना
यह कहना जरूरी है कि उस समय कांग्रेस एक स्वर में नहीं बोलती थी। गांधी, पटेल, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद की दृष्टियां भिन्न थीं। नेहरू की प्राथमिकताओं में आधुनिकता की उनकी व्याख्या, संस्कृति से ऊपर सेकुलरिज्म रखने की जिद और अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि की चिंता केंद्र में थी। यहीं व्यक्ति-संगठन की विडंबना उजागर होती है।
सोमनाथ: एक शिलालेख
सभ्यता की दृष्टि से, भारत के मंदिर पूजा-स्थल मात्र नहीं, शिक्षा, कला, अर्थव्यवस्था व सामाजिक संगठन के केंद्र थे। राजनीतिक रणनीति में प्रतीकों पर आघात विजित समाज का आत्मविश्वास तोड़ता है। आधुनिक भारत में हम 1026 (आक्रमण) और 1951 (पुनर्निर्माण) दोनों देखते हैं-घाव भी, जिजीविषा भी।
अयोध्या और राम मंदिर
अब अयोध्या। राम मंदिर लंबी ऐतिहासिक पीड़ा, सामाजिक संघर्ष और न्यायिक प्रक्रिया के बाद परिमार्जन का प्रतीक है। लेकिन संतुलन आवश्यक है। परिमार्जन संवैधानिक प्रक्रिया, सामाजिक शांति, नागरिक समानता और घाव-उपचार से हो, नए घाव न पैदा करे। यही कारण है कि कुछ के लिए यह सांस्कृतिक पुनर्स्थापना है और कुछ के लिए असुरक्षा की स्मृति भी। यहीं सोमनाथ बहस फिर प्रासंगिक हो जाती है।
दो पत्र, एक राष्ट्र
कल्पना कीजिए 1951 की दिल्ली। एक ओर तत्कालीन प्रधानमंत्री अपनी वैश्विक छवि को लेकर चिंतित थे, दूसरी ओर राष्ट्रपति को समाज की आंतरिक शक्ति पर विश्वास था और बीच में समाज लहरों-सा टूटता-लौटता। सोमनाथ सिखाता है कि स्मृति को संभालकर रखना जरूरी है, क्योंकि अगर स्मृति बदले की भाषा बन जाए तो फिर से इतिहास घाव बन जाता है और अगर स्मृति को दबा दिया जाए तो यह घाव अंदर रिसता रहता है। भारत को दोनों से बचना है। सोमनाथ को पढ़ना है। अयोध्या को निभाना है। एक ऐसे भारत के लिए जो अपने अतीत को जानता है और अपने भविष्य को साझा बनाता है।















