सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण के 75 वर्ष: जानें इससे जुड़ी अनकही कहानी
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सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण के 75 वर्ष: जानें इससे जुड़ी अनकही कहानी

सरदार पटेल और गाडगिल द्वारा सोमनाथ मंदिर को फिर से खड़ा करने की अनकही कहानी। नेहरू जी का विरोध, मौलाना आजाद की भूमिका और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा में शामिल होना।

Written byमहावीर प्रसाद जैन, अध्येतामहावीर प्रसाद जैन, अध्येता — edited by कुलदीप सिंह
May 11, 2026, 08:49 am IST
in भारत, विश्लेषण
Somnath Temple Gujarat

सोमनाथ मंदिर

भारत सरकार की पहली कैबिनेट में मंत्री रहे नरहर विष्णु गाडगिल की जुबानी उनकी किताब (Government From Inside p. 184-186) जूनागढ के भारत में विलय (फरवरी 1948) के पश्चात में और सरदार पटेल वहां (प्रभास  पट्टन) गए और एक दिन सुबह समुद्र तट पर घूमते हुए प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष देखे। मेरे मन में इसके पुनर्निर्माण का विचार आया और मेंने यह बात वल्लभभाई से कही। उन्होंने सहमति व्यक्त की और इस पर मेंने इस मंदिर का प्राचीन गौरव पूर्ण स्वरुप को लौटाने का इरादा प्रकट किया।

मैंने एक योजना बनाई और इसे कैबिनेट की कार्यवाही में प्रस्तुत किया। मौलाना आजाद ने कहा कि इसे यथावत ही सुरक्षित रखा जाना चाहिए। मैंने कहा कि मेरा अभिप्राय इसे मूल स्वरुप में पुनर्निर्मित करके हिन्दू-मुसलमानों के बीच अविश्वास के एक कारण को समाप्त करना है। काठियावाड़ में सोमपुरा समाज के कलाविद उपलब्ध थे जो वास्तु कला के आधार पर मूल प्राचीन स्वरुप वाले मंदिर का निर्माण कर सकते थे। हमने उनके सहयोग से मंदिर के पुनर्निर्माण का निश्चय कर लिया। केन्द्रीय सरकार के माध्यम से कार्य हाथ में लेने से पहले ही मैंने और वल्लभभाई ने इस हेतु पचास लाख रुपए एकत्र कर लिये।

नेहरू जी इससे सहमत नहीं थे। गांधी जी की सलाह से इस कार्य को एक ट्रस्ट को सौंपने का निश्चय किया गया, जिसमें केंद्र सरकार का एक प्रतिनिधि रखे जाने का निर्णय हुआ। भारत सरकार ने कार्य की निगरानी के लिए दो इंजीनियरों और एक वास्तुविद की समिति नियुक्त की। 1951 तक मंदिर का संपूर्ण आधार और गर्भ गृह तैयार हो गया। हमने राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद से लिंग की प्रतिष्ठा के समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में रहने की प्रार्थना की। हमने उन्हें निर्माण की योजना और इसकी प्रगति के बारे में आलेख दिया और उन्होंने समारोह में आने के लिए स्वीकृति प्रदान की।

कन्हैयालाल माणकलाल मुन्शी अपनी आदत के अनुरूप इस समारोह का आयोजन भव्य तरीके से करना चाहते थे और उन्होंने चीन में हमारे राजदूत, पणिक्कर, से समारोह के लिए चीन की नदियों से पानी भेजने को लिखा। इन असांप्रदायिक राजदूत महोदय ने विदेश मन्त्रालय से पूछा कि इसका खर्च किस मद से किया जायगा। यह पत्र (विदेशमंत्री) नेहरू जी के सम्मुख रखा गया। इसी समय पाकिस्तानी अखबारों ने मंदिर निर्माण को लेकर गुर्राना प्रारंभ किया कि वे मंदिर को ध्वस्त करने के लिए दूसरा महमूद गजनवी पैदा करेंगे।

नेहरू जी ने राजेन्द्र प्रसाद जी से मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हेतु नहीं जाने का आग्रह किया। कैबिनेट में भी इसकी चर्चा हुई। मैंने मुन्शी से कहा कि यदि इस निर्माण कार्य के लिए कोई जिम्मेदार है तो वल्लभभाई की सहमति के साथ में स्वयं हूं इसलिए कैबिनेट में मैं स्वयं इस पर जवाब दूँगा। मैंने कैबिनेट पेपर्स को उद्धृत करते हुए बताया कि नेहरू जी का यह दोषारोपण गलत है कि यह सब कुछ कैबिनेट को बताए बिना किया गया था। मौलाना आजाद और जगजीवन राम ने कहा कि इस सम्बंध में कैबिनेट में चर्चा हुई थी।

भारत सरकार ने हज़ारों मस्जिदों और मजारों के लिए अनुदान दिया था। इसलिए यदि कुछ राशि हिन्दू मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए व्यय की जाती है तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मेरी समझ में सेक्युलरिज्म का अर्थ सभी मतों के प्रति समानता था। सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के कारण लाखों लोगों की सद्भावना अर्जित हुई थी और सौराष्ट्र राज्य का एकीकरण संभव हो पाया था। लाखों हिन्दू मूर्ति पूजक हैं और नेहरू जी की तरह प्रबुद्ध नहीं हैं। मैंने कहा, ‘हम में से कुछ दृढ़ धार्मिक विश्वास से ग्रसित हैं’। इस तरह बहस समाप्त हुई और राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने समारोह में भाग लिया। उन्होंने नेहरू जी को अपने निश्चय के बारे में अवगत कराया। वे (राजेन्द्र प्रसाद) इस हेतु अपना पद छोड़ने को भी तैयार थे।

यह सर्वज्ञात है कि इस मंदिर को महमूद गज़नवी ने 1026 इस्वी में ध्वस्त किया था। चालुक्य राजा कुमारपाल ने पुनर्निर्माण करवाया। अलाउद्दीन ने 1299 ईस्वी में इसे पुनः विखण्डित किया। सौराष्ट्र के राजा खंगार (1331-53 ईस्वी) ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। अपने मरने से कुछ समय पूर्व, 1706 ईस्वी में, औरंगजेब ने इसे अंतिम बार तुड़वाया था।

Topics: सोमनाथ मंदिरनेहरूसोमनाथ मंदिर पुननिर्माणकितनी बार तोड़ा गया सोमनाथ मंदिर
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