भारत के दो बार के उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी ने देश पर हमला करने वाले, मंदिरों को तोड़ने वाले, सनातनियों के खून से नदियां बहाने वाले महमूद गजनवी और लोदी जैसे इस्लामिक जिहादी आक्रमणकारियों को हिंदुस्तानी बताया है। हामिद अंसारी ने एक साक्षात्कार में कहा कि लोदी और गजनी भारतीय लुटेरे थे और वह बाहर से नहीं आए थे. इस पर भाजपा ने हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि कांग्रेस का इकोसिस्टम हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार करने वालों का महिमामंडन करता है.
वहीं सोशल मीडिया पर भी हामिद अंसारी के आधे अधूरे ज्ञान पर सवाल उठाए जा रहे हैं. अंसारी एक तरह से मुस्लिम आक्रमणकारियों को क्लीन चिट देने का काम कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर आमजन सवाल उठा रहे हैं कि जिस गजनी ने सोमनाथ मंदिर को नष्ट किया, अपवित्र किया उसका आखिर अंसारी कैसे बचाव कर सकते हैं ? लोगों का कहना है कि हिंदुओं के मंदिर तोड़ने वालों के पाप छुपाने के लिए इस तरह का बयान हामिद अंसारी ने दिया है.
दरअसल अंसारी जैसे लोग इतिहास को नए राजनीतिक नजरिए से पेश कर रहे हैं और हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर हुए हमलों को कमतर करके दिखाने की कोशिश कर रहे हैं.
हामिद अंसारी पहले भी इसी तरह के विवादित बयान देते रहे हैं और उनका गैर जिम्मेदारी से भरा बयान उस समय भी आया था जब सोमनाथ मंदिर पर गजनी के बर्बर हमले के 1000 साल हुए थे. दरअसल हामिद अंसारी जैसे लोगों को यह समझना होगा कि सोमनाथ का इतिहास सिर्फ एक मंदिर का इतिहास नहीं है बल्कि यह हजारों साल के संघर्ष, बलिदान और आस्था की जीत की कहानी है.
हामिद अंसारी के बयान पर भाजपा प्रक्वता सुधांशु त्रिवेदी ने जोरदार पलटवार करते हुए कहा कि लुटेरों को अपने से जोड़ते जोड़ते समाज का कुछ वर्ग अब पूरे भारत को लुटेरों से जोड़ने लगा है.त्रिवेदी के अनुसार इस लुटी पिटी मानसिकता से बचने का प्रयास करना चाहिए . त्रिवेदी ने आगे कहा कि यह वही मानसिकता है जिसके लिए माननीय प्रधानमंत्री जी ने कहा कि मैकाले की मानसिकता को अगले 10 साल के अंदर हमें उद्ध्वस्त करना है.
महमूद गजनी का पूरा नाम अबू अल-कासिम महमूद इब्न सबुक तिगिन था जो किसी हिंदुस्तानी का नहीं होता है. उसके के पिता का नाम सुबुक्तगीन था जो एक तुर्किक था. तुर्किक लोग पश्चिम, मध्य पूर्व और उत्तर एशिया के साथ-साथ यूरोप के कुछ हिस्सों में कबीलों के रूप में निवास करते थे. महमूद गजनी की मां जाबुलिस्तान क्षेत्र के एक जमींदार परिवार से थी और वो ईरानी मूल की थी.
महमूद गजनवी दरअसल एक विदेशी इस्लामिक कट्टर जिहादी था जिसने हिंदू आस्था के प्रतीक सोमनाथ मंदिर पर सबसे बर्बर हमला किया था. गजनी के अंदर मजहबी कट्टरता कूट-कूट के भरी हुई थी और जब उसने सोमनाथ मंदिर की प्रसिद्धि सुनी तो उसने भारत पर आक्रमण करने का फैसला किया और अपनी सेना के साथ सिंध और रेगिस्तान को पार करता हुआ सौराष्ट्र पहुंचा. स्थानीय हिंदू राजाओं ने प्रतिरोध तो किया किंतु गजनवी की सेना के संगठन शक्ति और युद्ध अनुभव के सामने यह हिंदू राजा बहुत समय तक प्रतिरोध नहीं सके.
अपनी जीत के बाद गजनवी ने फैसला किया कि वो इस्लामिक आदेश के मुताबिक कुफ्र और काफिरों की सारी निशानियां मिटा देगा और इसी इरादे से उसने 1000 साल पहले 8 जनवरी 1026 को सोमनाथ मंदिर पर धावा बोल दिया. उस समय सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए हजारों सनातनी बिना हथियार के गजनवी की सेना के सामने ढाल बनकर खड़े हो गए. लेकिन लुटेरे गजनी के हज़ारो सैनिकों ने किसी पर भी रहम नहीं किया और मंदिर के पुजारियों का सामूहिक नरसंहार किया गया. मंदिर के अंदर पवित्र गायों को कटवाया गया, मंदिर में स्थापित शिवलिंग और मूर्तियां तोड़ दी गई.
उसके समकालीन इतिहासकार ज़कारिया अल-क़ज़विनी को पढ़ना चाहिए जिसके अनुसार इस लड़ाई में 5000 से अधिक हिंदू मारे गए. महमूद गजनवी ने जब मंदिर में प्रवेश किया तो वह इसे हैरानी से देखता रह गया. पूरा मंदिर लकड़ी के महज 56 खंभों पर टिका हुआ था लेकिन सबसे बड़ा आश्चर्य था कि मंदिर की मुख्य मूर्ति बिना किसी सहारे के हवा में लटकी हुई थी. जब महमूद ने मूर्ति तोड़ी तो उसे उसके अंदर खाली स्थान मिला जो बेशकीमती रत्नों से भरा हुआ था.
गजनी एक गरीब इस्लामिक मुल्क से आया था जहाँ ना ऐसी इमारतें थी और ना ही ऐसी दौलत थी. उसने अपने जीवन में इतना सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात, मोती नहीं देखे थे. सोमनाथ मंदिर की संपदा देखकर वो पागल सा हो गया। दहशत में आकर उसने मंदिर में लगी 40 मन वजन की सोने की उस जंजीर को तोड़ दिया, जिस पर घंटियां लगी हुई थी. यहां तक कि उसने मंदिर के दरवाजे तक उखाड़ दिए क्योंकि वो ठोस चांदी के बने हुए थे. उसने मंदिर की दीवारों पर लगी सोने की चादरें उखाड़ ली.
उसने छुपे हुए खजाने के लालच में मंदिर के पूरे गर्भ गृह को खुदवा दिया. इतिहासकार बताते हैं कि सोमनाथ मंदिर से गजनी को 10 टन सोने के बराबर लूट हाथ लगी थी. इस हमले के दौरान उसने सोमनाथ में 15 दिन बिताए और हजारों हजार हिंदू युवकों, महिलाओं और बच्चों को अपना गुलाम बना लिया। इसके बाद वो लूटे हुए धन और हिंदू गुलामों को लेकर अपने शहर जो अफगानिस्तान में था वहां गजनी के लिए रवाना हो गया.
गजनी के भारत के हमले के सिर्फ दो ही लक्ष्य थे पहला मंदिरों की तोड़फोड़ ,हिंदुओं का कत्ल करके इस्लाम की परचम को फहराना और दूसरा लूट का माल अपने देश गजनी ले जाना. लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश के वामपंथी इतिहासकारों और हामिद अंसारी जैसे सोच वालों ने हमेशा गजनी को सिर्फ एक लुटेरा साबित करने की कोशिश की है. इतिहास को दूसरे चश्मे से देखने वाले ये वामपंथी इतिहासकार और हामिद अंसारी जैसे लोग यह बात छुपा लेते हैं कि महमूद गजनी एक इस्लामिक आक्रमणकारी था और उसका मकसद इस्लाम की परचम को लहराना था. इसी कारण उसने सोमनाथ मंदिर से लूटी गई मूर्तियों को मस्जिद की सीढ़ियों पर लगा दिया.
गजनी की इस कट्टरपंथी सोच का सबूत मिलता है अफगानिस्तान के समकालीन इतिहासकार मिन्हाज-ए सिराज जुज जानी की किताब तबकात-ए-नासिरी’ में जो साल 1260 में लिखी गई थी. इस पुस्तक के अनुसार महमूद सोमनाथ की मूर्तियों को अपने साथ गजनी लेकर गया जहां उन मूर्तियों को तोड़कर चार हिस्सों में बांटा गया. मूर्तियों का एक हिस्सा जुम्मे को होने वाली नमाज की जगह पर लगाया गया, दूसरा हिस्सा शाही महल महल के प्रवेश द्वार की सीढ़ियों पर लगाया गया, तीसरा हिस्सा उसने मक्का और चौथे हिस्से को मदीना भिजवा दिया. इससे साफ साबित होता है कि महमूद गजनी कोई हिंदुस्तानी लुटेरा नहीं बल्कि मजहबी कट्टर इस्लामिक आक्रमणकारी था.
अंसारी जैसे लोगो को महमूद गजनी के उन विचारों को भी पढ़ना चाहिए जो उसने खुद अपने बारे में उद्धत किये हैं. गजनी के इन विचारों को खुद उसके दरबारी इतिहासकार और करीबी साथी अल उतबी ने अपनी किताब-उल-यामिनी में दर्ज किया है. जब गजनी ने भारत पर आक्रमण किया था तो सोमनाथ मंदिर को जब उसने लूटा था तब उस समय अल उतबी भी उसके साथ था जो लिखता है कि मैं खुद को मजहब की जिम्मेदारी से अलग नहीं कर सकता क्योंकि अपने पूरे जीवन में मैंने जिहाद के लिए तलवार उठाई है और काफिरों के देशों में इसी रास्ते पर शोहरत हासिल की है. मैं इस्लाम के लिए तलवार उठाता हूं क्योंकि इससे मुझे जन्नत में जगह हासिल होगी.
हामिद अंसारी जैसे लोग हमेशा कहते हैं कि हिंदू मंदिरों पर हमले धार्मिक कारणों से नहीं होते थे बल्कि हिंदू मंदिर अकूत संपत्ति के भंडार थे इसलिए इस्लामिक हमलावर उस संपत्ति को लूटने के लिए हिंदू मंदिरों पर हमला करते थे. इन सबो के मुताबिक मंदिरों पर हमले के पीछे कारण धार्मिक नहीं बल्कि आर्थिक था. लेकिन इन फ़र्ज़ी तथ्यों को खुद उन इस्लामिक आक्रांताओं ने खुद अपने समय में ही गलत साबित कर दिया था. जैसे इस कट्टर महमूद गजनी ने जब सोमनाथ मंदिर पर हमला किया तो वहां के लोगों ने इसके सामने हाथ जोड़कर विनती की और कहा कि हमारे मंदिर को मत तोड़ो बदले में मंदिर का सारा खजाना ले जाओ.
सोमनाथ के हिंदुओं ने यह प्रस्ताव भी महमूद गजनवी को दिया कि इसके अलावा वो करोड़ों सोने की मोहरे भी देंगे लेकिन शिवलिंग को खंडित मत करो. महमूद गजनी ने जवाब दिया था कि मैं यह चाहता हूं कि कयामत के दिन मुझे इन शब्दों के साथ पुकारा जाए कि वो महमूद जिसने काफिरों की सबसे बड़ी मूर्ति को तोड़ा था ना कि इन शब्दों के साथ कि वो महमूद जिसने मूर्ति को सोने के बदले काफिरों को बेच दिया था.
इस्लाम के नाम पर महमूद गजनी ने जो जुल्म किए उसकी सजा भी उसे मिली और उसका अंतिम समय संघर्ष, बीमारी और चिंताओं में ही गुजरा. सोमनाथ मंदिर पर हमला करने के महज 4 साल बाद वो 1030 में मर गया और उसकी निशानियां अफगानिस्तान के शहर गजनी में मौजूद हैं. सोमनाथ मंदिर से लूटा गया खजाना उसके किसी काम नहीं आया. वर्तमान में उसका किला खंडहर बन चुका है वहीं सोमनाथ मंदिर पर सनातन धर्म की विजय पताका पूरी आन बान और शान से लहरा रही है

















