3 साल के सर्वे में खुलासा: बेटियों के प्रति माता-पिता में आया पॉजिटिव बदलाव
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अब बेटियों का नाम, अंतिम, काफी, तौबा नहीं : समाज की सोच में आया बड़ा बदलाव

हरियाणा में अब  बेटियों के माता- पिता घर में बेटी के जन्म पर और बेटी से तौबा करने वाले माफी, काफी, अंतिम जैसे नामों से तौबा करने लगे हैं। बेटों की तरह ही अब बेटी का नाम भी पॉजिटिव सोच के साथ रखने का ट्रेंड चल निकला है।

Written byMahak SinghMahak Singh
May 7, 2026, 04:22 pm IST
in भारत
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

चंडीगढ़: अब  बेटियों के माता- पिता घर में बेटी के जन्म पर और बेटी से तौबा करने वाले माफी, काफी, अंतिम जैसे नामों से तौबा करने लगे हैं। बेटों की तरह ही अब बेटी का नाम भी पॉजिटिव सोच के साथ रखने का ट्रेंड चल निकला है। यह समाज में बेटियों के प्रति माता- पिता और परिवार की बदलती सोच को साफ दर्शाता है। बेटियों के प्रति माता- पिता की इस बदलती पॉजिटिव सोच का खुलासा  सुनील जागलान के नेतृत्व में सेल्फी विद डॉटर फाउंडेशन द्वारा देश में किए गए तीन वर्षीय विस्तृत सर्वे में हुआ है।

बेटियों के पुराने नाम और बदलती सोच

भारत में एक दौर था, जब बेटियों को लेकर समाज में नकारात्मक धारणा फैलाई गई। कन्या की भ्रूण हत्या की जाने लगी थी। हरियाणा में बेटियों के नाम कुछ इस तरह से रखे जाते माफी, काफी, अंतिम, भतेरी आदि । इनमें माफी का मतलब आगे और बेटी से माफी था, तो काफी का मतलब बेटी काफी, अब और नहीं चाहिए। भतेरी का मतलब हरियाणवी में बहुत होता है। अब ये नाम लगभग गायब हो चुके हैं। नए माता-पिता अपनी बेटियों के लिए अब पौराणिक और आधुनिक नाम चुन रहे हैं।

बेटियों के नामकरण की नकारात्मक परंपराएं समाप्त

सेल्फी विद डॉटर फाउंडेशन के देशव्यापी सर्वे में कश्मीर को लेकर खुलासा हुआ है कि कश्मीर में बेटियों के नाम तथिया, नाकाबा आदि रखे जाते थे। इनका मतलब भी अब और बेटी नहीं चाहिए था। कश्मीर में अब इनकी जगह आकर्षक नए नाम आ रहे हैं। असम में अखेरी, खंतो, इति जैसे नाम अब विरले ही सुनाई देते हैं। उत्तर प्रदेश में ओक, बची, खत्मन, तीजा जैसे नाम पहले आम थे, लेकिन पिछले दस वर्षों में इनका प्रयोग नहीं के बराबर रह गया है। राजस्थान में रामघानी, धापू जैसे नाम अब इतिहास बन चुके हैं। इस प्रांत में भी परिवार अब आधुनिक और पौराणिक नामों की ओर बढ़ रहे हैं। मध्य प्रदेश में पूरा, काफी, बची, समाप्ति जैसे नाम अब लगभग नहीं रखे जा रहे।

तमिलनाडु, केरल, बंगाल तक बड़े बदलाव की दस्तक तमिलनाडु, केरल और बंगाल तक बेटियों के प्रति माता-पिता की बदलती सकारात्मक सोच ने दस्तक दी है। अब तमिलनाडु में बेटियों के नाम पोथुम्पु, पोथूंपोल, सुरथूंपल जैसे नाम रखने से माता- पिता परहेज करने लगे हैं। केरल में ओडुविल, ओडुविल्थे, पेन्नाम्मा, पदिना, कणककम, इति जैसे नाम पहले प्रचलित थे। अब इनकी जगह खुशी भरे नाम आ रहे हैं।

पंजाब में भी बेटियों के मामलों में बड़ा बदलाव

हरियाणा के पड़ोसी राज्य पंजाब में भी बेटियों के नामों में पिछले एक दशक में बड़ा पॉजिटिव बदलाव आया है। पंजाब में पहले अंत्नि, बख्शी, करतारों जैसे नाम प्रचलन में थे। अब इनसे परहेज किया जा रहा है।

गुजरात और हिमाचल तक महसूस किया जा रहा बदलाव

गुजरात में अब छेली, भूरी जैसे नाम दुर्लभ हो गए हैं, जबकि पहले बेटियों के सबसे ज्यादा नाम इसी तरह के रखे जाते थे। हिमाचल प्रदेश में सन्तो, मँझली, काफो जैसे नाम अब नहीं दिख रहे। महाराष्ट्र में नकुशा जैसे नाम पहले दिए जाते थे, लेकिन एआई डॉटर अभियान के बाद ये नाम गायब हो गए हैं।

बदलाव से बिहार भी नहीं अछूता

बिहार भी इस बदलाव से अछूता नहीं रहा। पहले बिहार में बुचिया, अंतिम जैसे नाम बेटियों को दिए जाते थे। अब इस तरह के नाम बिहार में बहुत कम इस्तेमाल हो रहे हैं। झारखंड में बसमतिया, चला, तुरी जैसे नाम अब लगभग समाप्त हो चुके हैं। ओडिशा में अन्वेषा, शेष, उपा जैसे नाम अब विरले हैं। बंगाल में बेटियों को शेषे, इति जैसे नाम पहले दिए जाते थे। अब इनकी जगह आधुनिक नाम प्राथमिकता पा रहे हैं। जम्मू में अब बेटियों के नाम काफी, तीरथ, अन्त नहीं रखे जा रहे। आंध्र प्रदेश ओर तेलंगाना में चलम्मा, अम्मालु, ईश्वरी, पोचम्मा जैसे नाम अब दुर्लभ हो गए हैं। नागालैंड में कुमुन, कुमुनला जैसे नाम अब कम हो गए हैं। मणिपुर में तोंजा, तोंजाओ जैसे नाम अब कम इस्तेमाल होते दिख रहे हैं।

मिजोरम में मपुई, लल्नुनपुई जैसे नाम अब पहले जितने प्रचलित नहीं रहे। त्रिपुरा में रोकदा, आरती जैसे नाम अब कम हो गए हैं तो अरुणाचल प्रदेश में पांगसु जैसे नाम अब कम सुनाई देते हैं। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों तक बेटियों के मामले में बदलाव ने बड़ी दस्तक दी है। इस राज्य में अब अंतिम, भगावती जैसे नाम अब बहुत कम दिए जा रहे हैं। गोवा में थांबा, बस, नावो, जैसे नाम अब गायब हो चुके हैं। कर्नाटक में पोदी, मुनियाम्मा, सकोम्मा जैसे नाम अब नहीं रखे जा रहे। लद्दाख में तशे, दोलमा, बमो, निमा, यांगचेन जैसे नाम पहले दिए जाते थे, जो अब गायब हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ में बसन्ती, मुतउरी, उरन्ता, बुधनी, फेरहा, अन्तिमा जैसे नाम अब बहुत कम हो गए हैं। सिक्किम में पछली, एली, टुंगु, रोका, बिन्दा, सन्चो जैसे नाम अब विरले ही मिलते हैं। मेघालय में यहां मातृसत्तात्मक समाज होने के कारण बेटियों का स्वागत पहले से ही उत्साह से होता था और यह प्रवृत्ति अब पूरे देश के लिए प्रेरणा बन रही है।

बेटियों के प्रति बदली समाज की सोच: सुनील जागलान

सेल्फी विद डॉटर फाउंडेशन के संस्थापक जींद के बीबीपुर गांव के पूर्व सरपंच सुनील जागलान कहते हैं कि 3 साल तक उनके एनजीओ द्वारा किए गए देशव्यापी सर्वे में यह बात सामने आई है कि बेटियों के प्रति अब माता- पिता और समाज की सोच बदली है। सर्वे में पाया गया कि पिछले 10 वर्षों में बेटियों से तौबा करने वाले नामों का प्रयोग अब नहीं के बराबर रह गया है। सेल्फी विद डॉटर अभियान ने पूरे देश में जागरूकता फैलाई। पीएम मोदी के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान ने बेटियों के प्रति परिवार और समाज की सोच बदलने में अहम भूमिका निभाई है। लाखों माता-पिता सोशल मीडिया पर बेटियों के साथ सेल्फी शेयर कर उनके जन्म का जश्न मना रहे हैं। यह अभियान अब 70 से अधिक देशों तक पहुंच चुका है। सुनील जागलान ने कहा कि आज बेटी को बोझ नहीं, बल्कि घर की शान माना जा रहा है। पीएम मोदी के नेतृत्व में चले बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान और सेल्फी विद डॉटर ने इस बदलाव को गति दी है। अब बेटियां ‘अंतिम’ नहीं, बल्कि नई शुरुआत हैं।” यह सर्वे दर्शाता है कि जागरूकता और सकारात्मक अभियानों से समाज कितनी तेजी से बदल सकता है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और सेल्फी विद डॉटर जैसे प्रयासों ने बेटियों के भविष्य को ख़ुशनुमा  बना दिया है।

 

Topics: nationwide surveynaming of Haryana daughtersWomen EmpowermentSocial ChangeSelfie with Daughter FoundationBeti BachaoBeti Padhao Abhiyannames of daughterspositive thinking
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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