मुरादाबाद से नया सामाजिक बदलाव : नट समाज ने भू-समाधि की प्रथा छोड़ शुरू किया दाह संस्कार
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मुरादाबाद से नया सामाजिक बदलाव : नट समाज ने भू-समाधि की प्रथा छोड़ शुरू किया दाह संस्कार

नट समाज ने अब शवों को भू समाधि (दफन) के बजाय दाह संस्कार करने का निर्णय लिया है। यह बदलाव नट समाज के हिंदू सनातन परंपराओं के साथ समाज के गहरे जुड़ाव का भी प्रतीक है।

Written byजय प्रकाश गुप्ताजय प्रकाश गुप्ता — edited by Mahak Singh
Apr 9, 2026, 10:55 am IST
in उत्तर प्रदेश
Sanatan Dharma

प्रतीकात्मक तस्वीर

उत्तर प्रदेश के सलावा गांव से सामाजिक परिवर्तन की खबर आई है। नट समाज ने अब शवों को भू समाधि (दफन) के बजाय दाह संस्कार करने का निर्णय लिया है। यह बदलाव नट समाज के हिंदू सनातन परंपराओं के साथ समाज के गहरे जुड़ाव का भी प्रतीक है।

दरअसल,  मुरादाबाद के सलावा गांव (लगभग 800 की आबादी) में रहने वाले नट समाज ने सदियों पुरानी उस परंपरा को पीछे छोड़ दिया है, जिसमें मृत्यु के बाद शवों को भू समाधि दी जाती थी। नट समाज हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करता है, देवी-देवताओं की पूजा करता है और मंदिरों में आस्था रखता है, लेकिन अंतिम संस्कार की पद्धति अब तक अलग थी।

परिवर्तन की मुख्य वजह

इस बदलाव की मुख्य वजह दफनाने की जमीन की कमी और नई सोच बनी। सलावा गांव में लगभग पांच बीघा जमीन आवंटित थी, जहां नट समाज के पूर्वजों को भू-समाधि दी जाती थी। पिछले कुछ समय से यह जमीन पूरी तरह भर चुकी थी और शवों को सम्मानजनक स्थान देने के लिए जगह कम पड़ने लगी थी। जब समाज के सामने यह संकट आया, तो उन्होंने पुरानी लीक पर चलने के बजाय नई दिशा चुनी।

पंचायत के ऐतिहासिक फैसले से टूटी रूढ़िवादिता

इस बदलाव की नींव लगभग डेढ़ साल पहले तब पड़ी, जब गांव के 70 वर्षीय रामपाल की मृत्यु हो गई। उन्हें दफनाने (भूमि समाधि) की तैयारी थी, लेकिन जगह न होने के कारण समाज के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया। नट समाज के मुखिया अशोक कुमार और अमीचंद जैसे जागरूक बुजुर्गों ने नई पीढ़ी के साथ मिलकर एक पंचायत बुलाई। चर्चा के दौरान यह बात उठी कि जब नट समाज पूर्णतः हिंदू है, तो फिर अंतिम संस्कार की पद्धति अलग क्यों?

ऐतिहासिक फैसला

जागरूक युवाओं ने तर्क दिया कि दाह संस्कार करना न केवल धार्मिक रूप से उचित है, बल्कि यह जमीन की कमी का एक स्थाई समाधान भी है। पंचायत में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि अब से नट समाज का कोई भी व्यक्ति दफनाया नहीं जाएगा। रामपाल का अंतिम संस्कार हिंदू श्मशान घाट में विधि-विधान से किया गया। इसके बाद करीब छह महीने पहले ‘लक्ष्मी’ नामक महिला का भी दाह संस्कार किया गया।

नट समाज

जिन्हें नहीं पता उन्हें बता दें कि नट समाज सदियों से घुमंतू जीवन व्यतीत करता रहा है। सलावा गांव में रहने वाले ये लोग नाच-गाकर अपना गुजारा करते हैं। भले ही उनकी अंतिम संस्कार की परंपरा भू-समाधि की थी, लेकिन उनके घरों में हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर होते हैं और वे सभी हिंदू धार्मिक पर्व मनाते हैं। सलावा गांव से शुरू हुई यह पहल अब मुरादाबाद और आसपास के अन्य क्षेत्रों में भी फैल रही है, जहां नट समाज के लोग इस व्यावहारिक और धार्मिक बदलाव को अपना रहे हैं।

नट समाज का यह निर्णय यह सिद्ध करता है कि परिवर्तन ही संसार का नियम है। जब परंपराएं  अस्तित्व के आड़े आने लगती हैं, तो जागरूक समाज उन्हें बदलने में संकोच नहीं करता। सलावा गांव के लोगों ने न केवल जमीन की समस्या को हल किया, बल्कि अपनी धार्मिक पहचान को अपनी जीवनशैली के साथ पूरी तरह से जोड़ लिया। यह पहल उन्हें हिंदू संस्कृति के और भी करीब लाने का काम कर रही है।

Topics: Salawa VillageCremation Vs BurialModern thoughtTradition breakSanatan DharmaSocial ChangeHindu ritualsNat Samaj
जय प्रकाश गुप्ता
जय प्रकाश गुप्ता
लेखक करीब एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। अभी स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहरी पकड़ है। [Read more]
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